राजस्थान के जालोर जिले में कृषि क्षेत्र की तस्वीर तेजी से बदल रही है और यहां के अन्नदाता अब लीक से हटकर नए तौर-तरीकों पर जोर दे रहे हैं। पारंपरिक फसलों से मिलने वाले सीमित मुनाफे से आगे बढ़कर किसान अब ऐसे विकल्पों की तलाश में हैं जो कम पानी की खपत के साथ बेहतर आर्थिक लाभ दे सकें। इसी कड़ी में खजूर की खेती यहां के किसानों के बीच एक मजबूत और आकर्षक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है। इस शुष्क इलाके की गर्म और सूखी आबोहवा विदेशी किस्मों के पौधों के लिए बेहद मुफीद साबित हो रही है, जिससे खेती के नए द्वार खुले हैं।
भीनमाल उपखंड में विदेशी खजूर का विस्तार
जिले के भीनमाल उपखंड के अंतर्गत आने वाले भालणी और दाता गांव के किसानों ने इस दिशा में साहसिक कदम उठाते हुए खजूर की बागवानी को अपनाया है। इन खेतों में मुख्य रूप से सऊदी अरब और साउथ अफ्रीका से लाई गई उन्नत किस्मों के पौधे रोपे गए हैं। इन खास किस्मों में बरही, खलासा और मेजूल शामिल हैं। कृषि जानकारों के मुताबिक, इन विदेशी किस्मों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यदि इन्हें सही देखरेख और मुनासिब पर्यावरणीय परिस्थितियां मिल जाएं, तो इनसे बेहद उच्च गुणवत्ता वाले खजूर का उत्पादन किया जा सकता है, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाते हैं।
कम पानी और बेहतर कमाई का नया समीकरण
स्थानीय स्तर पर खेती से जुड़े हनीफ मेहर ने बताया कि वे पहले पारंपरिक फसलों की ही बुवाई करते थे, लेकिन जब उन्हें खजूर की बागवानी की बारीकियों की जानकारी मिली तो उन्होंने जोखिम उठाकर इसे आजमाने का फैसला किया। उनका कहना है कि जालोर का मौजूदा मौसम खजूर की पैदावार के लिए काफी अनुकूल है। इसके अलावा, अन्य कई प्रमुख फसलों की तुलना में इसमें पानी की आवश्यकता भी काफी कम होती है। यदि पौधों के रोपण से लेकर उनके बड़े होने तक उचित प्रबंधन और देखभाल की जाए, तो किसानों को इससे शानदार आमदनी मिलने की पूरी उम्मीद रहती है।
उचित पौधे का चयन और प्रबंधन
खजूर की सफल बागवानी के लिए कुछ तकनीकी बातों का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है, जिसमें सबसे अहम काम सही और स्वस्थ पौधों का चयन करना है। इसके साथ ही खेतों में पौधों को एक तय और उचित दूरी पर लगाना भी जरूरी होता है ताकि प्रत्येक पौधे को पर्याप्त धूप और हवा मिल सके। समय के साथ जैसे-जैसे पेड़ विकसित होते हैं, तो उचित दूरी होने के कारण उन पर लगने वाले फलों के गुच्छों की सुरक्षा और रखरखाव का काम भी आसान हो जाता है। इसके अलावा, खेत में जलभराव की स्थिति न बने और जरूरत के हिसाब से ही सिंचाई की जाए, इन बातों पर भी विशेष रूप से गौर करना पड़ता है।
नर्मदा नहर के पानी से बदली तस्वीर
जालोर की धरती पर खजूर की खेती को गति मिलने के पीछे यहां की आबोहवा के अलावा सिंचाई के साधनों का भी बड़ा योगदान है। नर्मदा नहर प्रणाली से जुड़े जिन इलाकों तक पानी पहुंच रहा है, वहां बागवानी फसलों के लिए अपार संभावनाएं पैदा हुई हैं। यही वजह है कि अब क्षेत्र के अन्य किसान भी पारंपरिक खेती के दायरे से बाहर निकलकर खजूर को अपनी आय बढ़ाने का एक नया साधन मान रहे हैं। बरही, खलासा और मेजूल जैसी विदेशी किस्मों की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यहां का कृषि परिदृश्य बदल रहा है। यदि आने वाले दिनों में खजूर की खेती के तहत रकबे में और विस्तार होता है, तो इससे न केवल किसानों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी बल्कि जालोर की कृषि पहचान को भी एक नया आयाम मिलेगा।





















