सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले जरूरतमंद बच्चों को कुपोषण से बचाने के मकसद से शुरू की गई पोषण योजनाओं में भारी सेंधमारी उजागर हुई है। प्राथमिक कक्षाओं में आने वाले मासूमों की सेहत संवारने के लिए सरकार हर माह टनों दूध पाउडर का आवंटन करती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह निकली कि यह पौष्टिक आहार कक्षाओं में पहुंचने के बजाय मिठाई निर्माण की निजी भट्टियों तक खपाया जा रहा था। जयपुर जिले की सामोद थाना पुलिस ने चीथवाड़ी क्षेत्र में चल रहे इस अवैध खेल का पर्दाफाश करते हुए सरकारी शिक्षकों और व्यापारियों की सांठगांठ को उजागर किया है।
मावा भट्टियों पर बरामदगी और हजारों किलो की धांधली
चीथवाड़ी में संचालित होने वाली खोया अथवा मावा भट्टियों की तलाशी के दौरान पुलिस को भारी तादाद में सरकारी योजना से जुड़े दूध पाउडर की खेप मिली। सामोद पुलिस थाना अधिकारी हेमराज सिंह के अनुसार, जांच के दौरान करीब 5,000 किलो दूध पाउडर बेचे जाने की जानकारी सामने आई है। इस धरपकड़ के तहत पुलिस ने मौके से लगभग 3,000 किलो दूध पाउडर जब्त भी कर लिया है। यह पूरा स्टॉक उन बच्चों की खुराक का हिस्सा था, जो रोजाना पढ़ाई के साथ-साथ इस पौष्टिक पेय के मिलने की उम्मीद में विद्यालय पहुंचते हैं। इतनी बड़ी तादाद में सरकारी स्टॉक का खुले बाजार की व्यावसायिक भट्टियों में पहुंचना आपूर्ति श्रृंखला की गंभीर कमियों को उजागर करता है।
चार सरकारी शिक्षक और दो कारोबारी सलाखों के पीछे
इस गोरखधंधे की पड़ताल करते हुए पुलिस ने अब तक कुल छह लोगों को हिरासत में लेकर जेल भेजा है। पकड़े गए आरोपियों में चार सरकारी अध्यापक कन्हैया लाल, सुरेश कुमार, सुरेंद्र कुमार और जगदीश प्रसाद शामिल हैं। इनके साथ ही मावा तैयार करने वाले दो व्यावसायिक साझेदारों रामस्वरूप और मनोज को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अधिकारियों की पूछताछ में यह बात सामने आई कि आपूर्ति किए गए ये तमाम पैकेट भीलवाड़ा स्थित एसबीजी प्राइवेट लिमिटेड के वेयरहाउस से निकाले गए थे। पुलिस अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ रही है ताकि यह साफ हो सके कि गोदाम से लेकर अंतिम खरीददार तक किन-किन बिचौलियों ने कमीशन कमाया।
जांच के दायरे में 116 अन्य अध्यापकों की भूमिका
पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि छह आरोपियों की धरपकड़ के बाद यह मामला यहीं थमने वाला नहीं है। राज्य के विभिन्न राजकीय विद्यालयों में तैनात करीब 116 अन्य शिक्षक भी अब पुलिसिया पड़ताल के घेरे में आ चुके हैं। जांच दल इस बात का सूक्ष्म परीक्षण कर रहा है कि क्या इन 116 शिक्षकों ने जानबूझकर स्टॉक में हेराफेरी की अथवा वे किसी बड़े नेटवर्क के दबाव या लालच में शामिल हुए। हालांकि जांच के दायरे में आने का सीधा अर्थ यह नहीं है कि सभी शिक्षक दोषी पाए गए हैं, उनकी वास्तविक जवाबदेही और भूमिका का निर्धारण विस्तृत विभागीय और कानूनी छानबीन पूरी होने के बाद ही संभव हो सकेगा।
प्रति छात्र तय मात्रा और बड़े पैमाने पर गड़बड़ी का गणित
राजकीय पोषण नियमावली के अनुसार पहली कक्षा से लेकर पांचवीं कक्षा तक के प्रत्येक नन्हे छात्र के लिए हर दिन 15 ग्राम मिल्क पाउडर का आवंटन तय किया गया है। वहीं छठी से आठवीं कक्षा में अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिए प्रतिदिन 20 ग्राम पाउडर का पैमाना निर्धारित है। प्रति छात्र ग्रामों में दिखने वाली यह मामूली मात्रा जब हजारों विद्यार्थियों के सामूहिक नामांकन से जुड़ती है, तब यह क्विंटल और टन के विशाल भंडार का रूप ले लेती है। यदि कागजों में छात्रों की उपस्थिति दर्ज करके उनके हिस्से की पोषण सामग्री बाजार के दलालों को बेची जाती है, तो यह न केवल आपराधिक विश्वासघात है बल्कि गरीब परिवारों के बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार भी है।
निगरानी तंत्र की नाकामी और अभिभावकों का टूटा भरोसा
ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में रहने वाले अभिभावक अपने बच्चों को इस उम्मीद से सरकारी शालाओं में भेजते हैं कि वहां उन्हें बेहतर तालीम के साथ बुनियादी पोषण भी सुलभ होगा। जब स्कूल के ही शिक्षक बच्चों के हक का आहार अवैध मंडियों में डायवर्ट करने के आरोप में पकड़े जाते हैं, तो पूरा सामाजिक विश्वास हिल जाता है। अब यह सवाल प्रशासनिक महकमे के सामने खड़ा है कि जिला और ब्लॉक स्तर पर बैठाई गई इंस्पेक्शन टीमें इतने लंबे समय तक इस भारी लीकेज को पकड़ने में नाकाम क्यों रहीं। भीलवाड़ा के निजी गोदाम से चीथवाड़ी की भट्टियों तक माल पहुंचाने के पूरे रूट को खंगालकर ही इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचा जा सकता है।




















