सनातन परंपरा के तहत किसी व्यक्ति के देहावसान के उपरांत अंतिम संस्कार से जुड़ी कई महत्वपूर्ण रीतियों का पालन किया जाता है। पार्थिव शरीर को अंतिम विदाई देने से पहले विधि-विधान से स्नान कराने और अंतिम यात्रा हेतु तैयार करने के दौरान आपने अक्सर देखा होगा कि मृतक के कान और नाक में रुई लगाई जाती है। देखने में यह केवल एक सामान्य पारंपरिक नियम प्रतीत हो सकता है, लेकिन इस प्रथा के पीछे गहरे धार्मिक विश्वास और ठोस व्यावहारिक कारण दोनों ही निहित हैं। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में भले ही अंतिम संस्कार के तौर-तरीकों में सूक्ष्म भिन्नताएं पाई जाती हों, परंतु नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित है।
गरुड़ पुराण का दृष्टिकोण और आध्यात्मिक मान्यताएं
धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से गरुड़ पुराण में मृत्यु के पश्चात जीवात्मा की आगे की यात्रा तथा भौतिक देह की स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है। सनातन मान्यताओं के अनुसार, जब प्राण देह छोड़ते हैं, तब भी जीवात्मा का अपने पूर्व शरीर के प्रति सूक्ष्म लगाव एकदम से समाप्त नहीं होता है। इसी कारणवश शरीर के खुले द्वारों को अवरुद्ध करने की प्रथा को आत्मा के भौतिक बंधनों से मुक्त होकर आगे बढ़ने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है। इसके अतिरिक्त, लोक मान्यताओं में यह भी माना जाता है कि देह के खाली और खुले मार्गों को ढक देने से पार्थिव शरीर किसी भी प्रकार के नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रहता है, जिससे अंतिम यात्रा की शुचिता बनी रहती है।
शारीरिक बदलाव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
यदि इस परंपरा को आधुनिक विज्ञान और शरीर क्रिया विज्ञान की दृष्टि से समझा जाए, तो इसके पीछे पूरी तरह जैविक कारण सामने आते हैं। मृत्यु घटित होने के तुरंत बाद शरीर की समस्त प्राकृतिक जैविक गतिविधियां और प्रतिरक्षा तंत्र पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। इसके कुछ समय बाद मांसपेशियों में कठोरता और आंतरिक बदलाव आने लगते हैं, जिसके साथ ही देह में प्राकृतिक अपघटन की प्रक्रिया का आरंभ हो जाता है। शरीर के भीतर पहले से उपस्थित सूक्ष्मजीव तेजी से सक्रिय होने लगते हैं, जो विघटन की गति को बढ़ाते हैं। इस जैविक स्थिति में देह के प्राकृतिक छिद्रों से विभिन्न प्रकार के तरल पदार्थों और स्राव के बाहर रिसने की प्रबल संभावना बन जाती है।
स्वच्छता और सुरक्षा से जुड़े व्यावहारिक कारण
पार्थिव देह के नाक और कान में रुई लगाने का मुख्य व्यावहारिक उद्देश्य इसी स्वाभाविक रिसाव को रोकना और नियंत्रित करना होता है। यदि समय रहते इन संवेदनशील द्वारों को रुई से सुरक्षित न किया जाए, तो आंतरिक तरल पदार्थ रिसकर बाहर आ सकते हैं, जिससे अंतिम दर्शन के समय असहज स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसके साथ ही, यह उपाय पार्थिव शरीर को बाहरी धूल, पर्यावरणीय गंदगी और सूक्ष्म कीटों के सीधे संपर्क में आने से बचाने में भी अत्यंत सहायक सिद्ध होता है। अंतिम यात्रा और मुखाग्नि से पहले तक शव को स्वच्छ, गरिमापूर्ण और सुरक्षित बनाए रखने के लिए यह तरीका बेहद कारगर है। यही कारण है कि यह सदियों पुरानी परंपरा आस्था के साथ-साथ व्यावहारिक उपयोगिता के चलते आज भी निभाई जा रही है।



















