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धनतेरस से पहले मनाया जाएगा वसु बारस, जानिए पूजन का सही समय और परंपराधर्म
2 नव॰ 2026, 7:23 am (1 घंटे पहले)· 0

धनतेरस से पहले मनाया जाएगा वसु बारस, जानिए पूजन का सही समय और परंपरा

गोवत्स द्वादशी का पर्व 5 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा, जिसकी पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:33 से रात 08:10 बजे तक रहेगा। संतान की लंबी आयु और खुशहाली के लिए इस दिन गाय और बछड़े की विशेष पूजा की जाती है।

दीपावली के महापर्व की औपचारिक शुरुआत धनतेरस से मानी जाती है, लेकिन धार्मिक परंपराओं में उससे ठीक एक दिन पहले गोवत्स द्वादशी का पावन व्रत रखने का विधान है। इस विशेष दिन को देश के अलग-अलग हिस्सों में वसु बारस, बछ बारस और नन्दिनी व्रत के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। मूल रूप से यह पर्व गौ माता और उनके बछड़ों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी विधिपूर्वक सेवा-अर्चना करने का अवसर होता है। भारतीय संस्कृति के कई क्षेत्रों में गोवत्स द्वादशी के समान ही एक अन्य त्योहार बछ बारस नाम से मनाया जाता है, जो इस तिथि से लगभग दो महीने पहले पड़ता है। दोनों ही अवसरों पर गायों और बछड़ों की पूजा का विधान है, लेकिन कार्तिक मास की यह द्वादशी विशेष फलदायी मानी जाती है।

गोवत्स द्वादशी 2026 की सही तिथि और समय

पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष गोवत्स द्वादशी अथवा वसु बारस का पर्व 5 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा। तिथि की शुरुआत 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से होगी और यह अगले दिन 6 नवंबर 2026 की सुबह 10:30 बजे तक प्रभावी रहेगी। ऐसे में उदयातिथि और प्रदोष काल के संयोग के आधार पर व्रत और पूजा की समस्त विधियां 5 नवंबर को ही संपन्न की जाएंगी। जो श्रद्धालु इस पावन अवसर पर उपवास रखते हैं, उन्हें तिथि की इसी समय-सारणी का ध्यान रखना चाहिए ताकि पूजन पूरी निष्ठा और शास्त्रसम्मत नियमों के तहत संपन्न हो सके।

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शाम के समय पूजा का शुभ मुहूर्त

गोवत्स द्वादशी पर विशेष पूजन सायंकाल यानी प्रदोष काल में करने की परंपरा है। इस वर्ष 5 नवंबर 2026 को पूजा का अत्यंत शुभ मुहूर्त शाम 05:33 बजे से आरंभ होगा और रात 08:10 बजे तक बना रहेगा। श्रद्धालुओं को कुल 2 घंटे 37 मिनट की अवधि इस अनुष्ठान के लिए प्राप्त होगी। इस निर्धारित समय के दौरान गौ माता और उनके बछड़े की पूजा-अर्चना करना सबसे फलदायी और कल्याणकारी माना गया है।

घर पर कैसे करें गोवत्स द्वादशी की पूजा विधि

गोवत्स द्वादशी के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद गौ माता और उनके बछड़े का पूजन विधि-विधान से शुरू किया जाता है। पूजा की व्यवस्थित प्रक्रिया इस प्रकार अपनाई जाती है

  • यदि घर में गाय और बछड़ा उपलब्ध हैं, तो उन्हें स्वच्छ जल से नहलाकर उनका सुंदर शृंगार करना चाहिए।
  • जिन घरों में वास्तविक गाय और बछड़ा उपलब्ध नहीं हैं, वे मिट्टी अथवा धातु की मूर्ति स्थापित कर सकते हैं या उनका सुंदर चित्र बनाकर पूजन कर सकते हैं।
  • गौ माता और बछड़े के मस्तक पर हल्दी और कुमकुम का तिलक लगाना चाहिए। इसके साथ ही अक्षत, रोली, सुगंधित धूप, दीप, फल, मिष्टान्न और नैवेद्य अर्पित कर विधिवत अर्चना करनी चाहिए।
  • पूजन संपन्न होने के पश्चात गाय और बछड़े को श्रद्धापूर्वक मीठा चारा, गुड़ और भीगे हुए चने खिलाने चाहिए।
  • व्रती को पूरे दिन उपवास का पालन करते हुए यथासंभव गाय की सेवा और ध्यान में समय बिताना चाहिए।
  • शाम के समय शुभ मुहूर्त में पुनः एकत्रित होकर विधिवत पूजा करनी चाहिए और इस दौरान गोवत्स द्वादशी की पावन व्रत कथा का श्रवण अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
  • सायंकालीन पूजन और कथा श्रवण के उपरांत ही व्रती महिलाएं अपना भोजन ग्रहण करती हैं।

पर्व का धार्मिक महत्व और विशेष नियम

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गोवत्स द्वादशी का व्रत रखने से व्रती की संतान को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की प्राप्ति होती है। संतान की उन्नति और सुरक्षा की कामना के लिए माताएं इस दिन निर्जल अथवा फलाहार व्रत रखती हैं। इस उत्सव में धन के अधिपति देवता वसु की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसके कारण इसे लोक परंपरा में वसु बारस कहा जाता है। इस दिन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़ा नियम भी है। धार्मिक दृष्टिकोण से यह दिन गौ माता के विश्राम का समय माना जाता है, इसलिए गोवत्स द्वादशी के पूरे दिन गाय के दूध और उससे निर्मित किसी भी खाद्य पदार्थ का सेवन पूरी तरह वर्जित रहता है। श्रद्धालु दही, मक्खन, घी या गाय के दूध की मिठाइयों का प्रयोग इस दिन अपने भोजन में बिल्कुल नहीं करते हैं।

सवाल-जवाब

वर्ष 2026 में गोवत्स द्वादशी किस तारीख को है?
गोवत्स द्वादशी का पर्व इस साल 5 नवंबर 2026 को मनाया जाएगा।
द्वादशी तिथि कब से कब तक रहेगी?
यह तिथि 5 नवंबर की सुबह 10:35 बजे से शुरू होकर 6 नवंबर 2026 की सुबह 10:30 बजे तक रहेगी।
गोवत्स द्वादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05:33 बजे से शुरू होकर रात 08:10 बजे तक रहेगा।
इस पर्व को अन्य किन नामों से जाना जाता है?
इसे वसु बारस, बछ बारस और नन्दिनी व्रत के नाम से भी जाना जाता है।
गोवत्स द्वादशी के दिन किस चीज का सेवन वर्जित होता है?
इस दिन गाय का दूध और उससे निर्मित किसी भी पदार्थ का सेवन करना पूरी तरह वर्जित माना गया है।
यह व्रत मुख्य रूप से किस उद्देश्य से रखा जाता है?
यह व्रत संतान की उन्नति, खुशहाली और दीर्घायु की कामना के लिए रखा जाता है।
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