उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित शिवालिक की प्राचीन पर्वतमालाओं के बीच मां शाकुंभरी देवी का पवित्र धाम विद्यमान है. यह पावन तीर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठानों का केंद्र नहीं है, बल्कि सदियों से शक्ति, करुणा और प्रकृति के अटूट रिश्ते का जीवंत प्रमाण माना जाता है. पौराणिक गाथाओं के अनुसार, एक समय ऐसा आया था जब धरती पर भयंकर अकाल पड़ा और समस्त जीव जगत दाने-दाने तथा पानी की एक-एक बूंद के लिए तड़प उठा था. उस संकटकाल में जगत जननी ने प्रकृति और वनस्पतियों का सृजन करके इंसानों, पशुओं, पक्षियों तथा संपूर्ण सृष्टि को विनाश के कगार से बाहर निकाला था.
दुर्गमासुर का छल और वेदों का रसातल गमन
इस सिद्धपीठ की स्थापना और महत्व के पीछे एक अत्यंत मार्मिक और चेतावनी भरी पौराणिक कथा जुड़ी है. प्राचीन काल में दुर्गम नामक एक दैत्य ने सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की. तप के प्रभाव से जब ब्रह्मा जी प्रकट हुए, तो उस दैत्य ने छलपूर्वक वरदान स्वरूप चारों वेदों की मांग कर ली. वचनों में बंधे होने के कारण ब्रह्मा जी को चारों वेद उस दैत्य को सौंपने पड़े. वेद प्राप्त करते ही दुर्गमासुर उन्हें लेकर पाताल यानी रसातल में समा गया.
वेदों के विलुप्त होते ही पृथ्वी पर चलने वाले सभी पुण्य कार्य अचानक रुक गए. नित्य होने वाले हवन, यज्ञ, पूजन और वैदिक अनुष्ठान पूरी तरह समाप्त हो गए. इसके परिणामस्वरूप प्रकृति का चक्र बिगड़ गया और चारों ओर भीषण दुर्भिक्ष फैल गया. लंबे समय तक वर्षा नहीं हुई, धरती जलविहीन हो गई और नदियां-तालाब सूख गए. भूख और प्यास से व्याकुल होकर पशु-पक्षी दम तोड़ने लगे. स्थिति इतनी भयावह हो गई कि आहार के अभाव में इंसान जीवित रहने के लिए एक-दूसरे पर झपटने लगे. धरती पर चारों तरफ हाहाकार मच गया और जीवन का अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर पहुंच गया.
शताक्षी रूप और सौ नेत्रों से बही जलधारा
सृष्टि के इस असहनीय संताप को देखकर सभी देवताओं और तपस्वी ऋषि-मुनियों ने आदि शक्ति भगवती की कठोर स्तुति शुरू की. पुकार सुनकर माता पार्वती ने साताक्षी अर्थात शताक्षी स्वरूप धारण किया. उन्होंने अपने दिव्य शरीर पर सौ नेत्र प्रकट किए. धरती का ऐसा विनाशकारी मंजर और प्राणियों का क्रंदन देखकर माता का हृदय करुणा से भर गया. उनके सौ नेत्रों से अविरल आंसुओं की धारा बह निकली. मान्यता है कि उनके इन अश्रुओं ने धरती के सूखे को समाप्त किया और चारों ओर जल ही जल प्रवाहित कर दिया.
हालांकि, जल की उपलब्धता के बाद भी क्षुधा शांत करने के लिए अन्न और भोजन की अत्यंत आवश्यकता थी, क्योंकि केवल पानी के सहारे प्राणी जगत लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता था. तब ऋषि-मुनियों ने एक बार फिर करुणा की देवी मां शताक्षी की विनम्र आराधना की.
शाकुंभरी अवतार और वनस्पति सृजन
ऋषियों की प्रार्थना पर माता ने अपना शाकुंभरी स्वरूप प्रकट किया. उन्होंने अपने अलौकिक प्रभाव से सूखी बंजर धरती पर विभिन्न प्रकार की शाक-सब्जियां, फल, औषधियां और जीवनदायी वनस्पतियां उत्पन्न कर दीं. माता के इस स्वरूप से उपजी वनस्पतियों और आहार ने संपूर्ण जीव जगत की भूख मिटाई. इस तरह मनुष्य, पशु, पक्षी और हर जीवित प्राणी को नवजीवन प्राप्त हुआ. चूंकि माता ने शाक और सब्जियों से संपूर्ण संसार का पोषण किया, इसलिए वे शाकुंभरी कहलाईं और उन्हें प्रकृति, अन्न तथा पोषण की अधिष्ठात्री माना गया.
चार दिव्य स्वरूप और बाबा भूरादेव की परंपरा
सहारनपुर के इस पावन धाम में मां भगवती के चार अलग-अलग स्वरूपों की आराधना का विशेष विधान है. पहला मां शाकुंभरी का स्वरूप है जो प्रकृति, अन्न और जीवन के भरण-पोषण का प्रतीक है. दूसरा स्वरूप मां शताक्षी का है, जो अपार करुणा, जल और जीवनदायिनी दया का प्रतिनिधित्व करता है. तीसरा स्वरूप मां भीमा का है, जो अदम्य शक्ति, साहस और दुष्ट शक्तियों के विनाश को दर्शाता है. चौथा स्वरूप मां भ्रामरी का है, जो आसुरी प्रवृत्तियों के दमन और परम शक्ति की रक्षात्मक शक्ति का द्योतक है. ये चारों स्वरूप मिलकर सृष्टि की रक्षा और धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश देते हैं.
इस सिद्धपीठ की यात्रा में बाबा भूरादेव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. मान्यता के अनुसार, बाबा भूरादेव भगवान भैरव के स्वरूप हैं और वे इस संपूर्ण धाम तथा पर्वत क्षेत्र के रक्षक हैं. प्रचलित धार्मिक परंपरा के तहत मां शाकुंभरी देवी के दर्शन करने से पूर्व श्रद्धालु बाबा भूरादेव के मंदिर में नमन करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं. मान्यता है कि इस क्रम का पालन करने पर ही तीर्थयात्रा पूर्ण और सफल मानी जाती है. यह धाम श्रद्धालुओं को प्रकृति का आदर करने, जीवों की रक्षा करने और जरूरतमंदों के प्रति दया भाव रखने की प्रेरणा देता है.


















