बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो मेहनत और परिवार के त्याग की मिसाल बन गई है. यहां के आदित्य राज ने NEET UG 2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए नॉर्थ बिहार में टॉपर का खिताब अपने नाम किया है. इस खबर के बाद से आदित्य के घर बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ है और परिवार में मिठाइयां बांटी जा रही हैं.
परिवार में हर किसी ने निभाई अपनी भूमिका
आदित्य के पिता हरेन्द्र कुमार सहनी मुजफ्फरपुर में निजी नौकरी करते हैं और मां देवमती कुमारी गांव में श्रृंगार यानी कॉस्मेटिक की एक छोटी दुकान चलाकर घर खर्च में हाथ बंटाती हैं. परिवार में आदित्य की बड़ी बहन अर्पणा राज की शादी हो चुकी है, जबकि छोटा भाई अनिकेत राज फिलहाल 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा है. सीमित आमदनी के बावजूद परिवार ने हमेशा बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी.
सरकारी स्कूल से कोचिंग संस्थान तक का सफर
आदित्य ने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव के ही एक सरकारी विद्यालय से पूरी की. 10वीं पास करने के बाद उन्होंने इंटरमीडिएट में दाखिले के लिए मुजफ्फरपुर के आरडीएस कॉलेज को चुना. यहीं से डॉक्टर बनने का सपना संजोते हुए उन्होंने शहर के एक निजी कोचिंग संस्थान में NEET की तैयारी शुरू कर दी. खास बात यह रही कि उन्होंने इंटर की पढ़ाई और मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी, दोनों को एक साथ बखूबी संभाला और किसी को भी नजरअंदाज नहीं होने दिया.
पहली बार में मिली नाकामी, दूसरी बार में रचा इतिहास
आदित्य की राह इतनी आसान नहीं थी. साल 2025 में हुए NEET एग्जाम में उन्हें 460 अंक मिले थे, लेकिन इतने नंबरों पर किसी मेडिकल कॉलेज में सीट नहीं मिल सकी. उस दौर में उन्हें अपना डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह जाने का डर सताने लगा था. मगर आदित्य ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने अपनी कमजोरियों को पहचाना, तैयारी में जरूरी बदलाव किए और दोबारा पूरी मेहनत से जुट गए. नतीजा यह निकला कि अगले ही प्रयास में उन्होंने 659 अंक हासिल कर लिए और इसी प्रदर्शन के दम पर वह NEET UG 2026 में नॉर्थ बिहार के टॉपर बन गए.
दादी की बीमारी ने बदल दी सोच
आदित्य बताते हैं कि बचपन में वह क्रिकेटर बनना चाहते थे, लेकिन संसाधनों की कमी की वजह से यह सपना पूरा नहीं हो पाया. उनकी जिंदगी में असली मोड़ तब आया जब उनकी दादी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं. दादी लंबे समय तक कैंसर और अस्थमा जैसी बीमारियों से जूझती रहीं और आगे चलकर लकवाग्रस्त हो गईं. कोरोना के दौर में उनका निधन हो गया. दादी को असहाय हालत में देखकर आदित्य ने उसी वक्त तय कर लिया था कि वह डॉक्टर बनेंगे, ताकि आगे चलकर बीमार और जरूरतमंद लोगों की बेहतर तरीके से सेवा कर सकें. यही संकल्प आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत और प्रेरणा बना.
42 साल रिक्शा चलाकर परिवार पाला दादा ने
आदित्य की इस कामयाबी के पीछे उनके दादा सौखी सहनी का त्याग भी उतना ही बड़ा है. सौखी सहनी ने लगातार 42 वर्षों तक पटना की सड़कों पर रिक्शा चलाकर अपने परिवार का पेट पाला. संसाधन सीमित थे, फिर भी उन्होंने परिवार की पढ़ाई और भविष्य को कभी दांव पर नहीं लगने दिया. आज जब उनका पोता NEET UG 2026 में नॉर्थ बिहार का टॉपर बना है, तो परिवार के वर्षों के संघर्ष को जैसे नई पहचान मिल गई है. दादा की आंखों में इस पल खुशी के आंसू हैं और पूरा परिवार इसे अपनी सबसे बड़ी जीत मान रहा है.
सफलता का श्रेय परिवार को, दूसरों के लिए संदेश
अपनी इस कामयाबी का श्रेय आदित्य अपने माता-पिता, शिक्षकों और परिवार के हर सदस्य को देते हैं. दूसरे छात्रों के लिए उनका कहना है कि असफलता से घबराने के बजाय उससे सीखना चाहिए. आदित्य कहते हैं, "सफलता एक दिन में नहीं मिलती. इसके लिए निरंतर मेहनत, धैर्य और ईमानदारी से प्रयास करना पड़ता है. यदि आप पूरी लगन के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे, तो सफलता एक दिन जरूर आपके कदम चूमेगी."




















