मेडिकल की पढ़ाई कर डॉक्टर बनने का सपना देखना आसान है, लेकिन वर्तमान समय में लाखों रुपये की फीस और आर्थिक तंगी के कारण अक्सर ग्रामीण इलाकों के छात्रों का यह सपना बीच में ही टूट जाता है। हालांकि, पश्चिमी सीमा पर बसे बाड़मेर में एक ऐसी संस्था है, जिसने इस सोच को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। 'फिफ्टी विलेजर्स' नाम की यह संस्था उन होनहार छात्रों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है, जिनके पास प्रतिभा तो है, लेकिन संसाधनों की भारी कमी है। बाड़मेर जिला मुख्यालय पर स्थित यह संस्था पिछले पंद्रह सालों से गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों को पूरी तरह से मुफ्त में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET की तैयारी करवा रही है। भारी भरकम खर्च के बिना, यहां से पढ़ाई कर अब तक 150 से ज्यादा छात्र डॉक्टर बन चुके हैं और देश के अलग-अलग हिस्सों में एक योग्य चिकित्सक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
मई 2012 में हुई थी एक शानदार शुरुआत
इस अद्भुत पहल और बदलाव की शुरुआत 25 मई 2012 को हुई थी। बाड़मेर के राजकीय अस्पताल में चिकित्सक के पद पर अपनी सेवाएं दे रहे डॉ. भरत सारण ने 'फिफ्टी विलेजर्स' संस्था की नींव रखी थी। एक डॉक्टर होने के नाते वह मेडिकल की पढ़ाई के संघर्ष को भली-भांति समझते थे। उनके मन में यह विचार था कि कोई भी मेधावी बच्चा सिर्फ पैसे की कमी के कारण अपने सपनों से दूर न रह जाए। डॉ. भरत सारण का स्पष्ट कहना है कि इस संस्थान का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य उन होनहार छात्रों के सपनों को साकार करना है, जो पढ़-लिख कर डॉक्टर तो बनना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाते हैं। आज बाहर से देखने पर यह संस्था किसी फिल्म की कहानी की तरह लगती है, लेकिन यह बाड़मेर की एक शानदार हकीकत है, जहां रेगिस्तान की झुग्गी-झोपड़ियों और दिन-रात काम करने वाले मजदूरों के बच्चों के डॉक्टर बनने के सपने को सच में बदला जा रहा है।
हर साल सिर्फ 50 जरूरतमंद बच्चों को मिलता है मौका
इस संस्था के काम करने का तरीका बेहद अनुशासित और सीधे तौर पर लक्ष्य पर केंद्रित है। 'फिफ्टी विलेजर्स' संस्थान में हर साल ठीक 50 बच्चों को प्रवेश दिया जाता है। चुनाव की प्रक्रिया में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ये वो बच्चे हों, जो बेहद गरीब हों, अनाथ हों, या जिनके घर की माली हालत इतनी खराब हो कि 10वीं कक्षा पास करने के बाद उनकी पढ़ाई छूटने का पूरा खतरा हो। एक बार चयन हो जाने के बाद, इन छात्रों को ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में साइंस (विज्ञान) विषय के साथ दाखिला दिलवाया जाता है और साथ ही NEET प्रवेश परीक्षा की कड़ी तैयारी भी करवाई जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में संस्था का एक ही लक्ष्य होता है कि पैसों की कमी किसी भी छात्र की मंजिल का रास्ता न रोक सके। यह बोर्ड परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं का एक बेहतरीन संतुलन है, जो छात्रों को मजबूत आधार देता है।
प्रतिभा को तराशने का मिलता है समान अवसर
राजस्थान के रेगिस्तान की तपती धरती से निकलकर देश के बड़े मेडिकल कॉलेजों तक पहुंचने वाले इन 150 से अधिक डॉक्टरों ने यह साबित कर दिया है कि गरीबी किसी की भी मंजिल नहीं रोक सकती, बशर्ते उन्हें सही मार्गदर्शन मिले। जिन माता-पिता ने अपनी पूरी जिंदगी केवल दिहाड़ी मजदूरी की, दूसरों के खेतों में पसीना बहाया या गंभीर आर्थिक तंगी के बावजूद अपने बच्चों को पढ़ाने का हौसला रखा, आज उनके बेटे सफेद कोट पहनकर अस्पताल में लोगों का इलाज कर रहे हैं। मिट्टी की झोपड़ियों से निकले ये बच्चे अब देश की स्वास्थ्य सेवा का अहम हिस्सा बन चुके हैं। संस्था में प्रवेश देते समय न तो किसी की जात-पात देखी जाती है और न ही पैसे या पारिवारिक हैसियत का कोई महत्व होता है। यहां केवल छात्र की छिपी हुई प्रतिभा को तराशा जाता है और हर कदम पर उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि "तुम पढ़ो... बाकी जिम्मेदारी हमारी।"
भामाशाहों के सहयोग से चलता है पूरा खर्च
बिना किसी सरकारी फीस या छात्रों से शुल्क लिए, हर साल 50 बच्चों के रहने, खाने और कोचिंग का पूरा खर्च उठाना कोई आसान काम नहीं है। 'फिफ्टी विलेजर्स' का यह पूरा सिस्टम समाज के दानदाताओं और भामाशाहों के आर्थिक सहयोग से संचालित होता है। ये दानदाता शिक्षा के इस पुनीत कार्य के लिए लगातार और दिल खोलकर अपनी ओर से आर्थिक मदद करते हैं। इन्हीं पैसों से संस्थान में पढ़ने वाले सभी 50 बच्चों के सुरक्षित छात्रावास, पौष्टिक भोजन, किताबों और पढ़ाई का अन्य सारा खर्च उठाया जाता है। समाज के इस सामूहिक प्रयास और डॉ. भरत सारण के व्यक्तिगत समर्पण ने मिलकर बाड़मेर में एक ऐसा मॉडल खड़ा कर दिया है, जो न केवल गरीब बच्चों का भविष्य संवार रहा है, बल्कि पूरे देश के लिए शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी मिसाल भी बन गया है।



















