पाली जिले के हेमलियावास खुर्द की निवासी और पेशे से साइकोलॉजिस्ट नेहा सोलंकी ने यह साबित कर दिया है कि जरूरत ही वास्तव में आविष्कार की जननी होती है। उनका जीवन तब पूरी तरह से बदल गया जब उन्होंने अपने ही बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने की ठानी। मूल रूप से जयपुर की रहने वाली नेहा की शादी लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व डॉ. अभिषेक भाटी के साथ हुई थी। उनका वैवाहिक जीवन सामान्य चल रहा था, लेकिन शादी के कुछ समय बाद ही उन्हें एक बेहद मुश्किल खबर मिली। जब उनका बेटा महज छह महीने का था, तब डॉक्टरों ने बताया कि वह 'सेरेब्रल पाल्सी' नामक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति से जूझ रहा है। इस बीमारी के कारण मस्तिष्क का शरीर की मांसपेशियों पर कोई नियंत्रण नहीं रहता है, जिससे बच्चे के लिए सामान्य रूप से बैठना या चलना लगभग असंभव हो जाता है। यह सच्चाई पूरे परिवार के लिए किसी बड़े सदमे से कम नहीं थी, लेकिन उन्होंने हालात के सामने घुटने टेकने से साफ इनकार कर दिया।
दाखिले के लिए स्कूलों के चक्कर और एक कड़ी शर्त
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा हुआ, उसकी शिक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ने लगीं। साल 2023 में जब बेटे की उम्र स्कूल जाने लायक हुई, तो नेहा ने उसे सामान्य बच्चों के साथ पढ़ाने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने कई नामी निजी शिक्षण संस्थानों से संपर्क किया। हालांकि, हर जगह से उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। बच्चे की शारीरिक स्थिति और बिना सहारे के बैठ पाने में उसकी अक्षमता को देखते हुए लगभग सभी स्कूलों ने उसे दाखिला देने से मना कर दिया। काफी मिन्नतों के बाद आखिरकार एक स्कूल प्रबंधन ने उन्हें दाखिला देने की बात मानी, लेकिन उन्होंने एक बेहद सख्त शर्त रख दी। स्कूल प्रशासन का स्पष्ट कहना था, "अगर बच्चा बिना सहारे सुरक्षित बैठ सके, तभी एडमिशन मिलेगा।" यह वाक्य किसी भी माता-पिता का मनोबल तोड़ने के लिए काफी था, लेकिन इस चुनौती ने एक नए और ऐतिहासिक आविष्कार की नींव रख दी।
जोधपुर में शोध और एक खास कुर्सी का निर्माण
स्कूल की उस कड़ी शर्त को पूरा करने और अपने बेटे को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए उन्होंने खुद ही समाधान तलाशने का बीड़ा उठाया। इसके बाद नेहा ने जोधपुर में रहते हुए लगातार नौ महीने तक गहन शोध किया। उन्होंने बाल मनोविज्ञान, शारीरिक संतुलन और एर्गोनॉमिक्स के हर पहलू को बारीकी से समझा। दिन-रात की इस अथक मेहनत के बाद उन्होंने एक विशेष सपोर्टिव चेयर तैयार करने में सफलता हासिल की। यह कुर्सी विशेष रूप से तीन से बारह साल तक के उन बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई गई है जो सेरेब्रल पाल्सी जैसी स्थितियों का सामना कर रहे हैं। इस अनोखे उपकरण की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह बच्चे को इस कदर संतुलन और शारीरिक सपोर्ट प्रदान करता है कि कुर्सी से नीचे गिरने का कोई खतरा ही नहीं रहता। इसी आविष्कार की बदौलत उनका दस वर्षीय बेटा आज पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करते हुए एक आम स्कूल में पढ़ाई कर रहा है।
नीति आयोग का राष्ट्रीय मंच और राष्ट्रपति के हाथों सम्मान
एक मां द्वारा स्थानीय स्तर पर किए गए इस अद्भुत प्रयास को अब राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़ी पहचान मिल चुकी है। भारत सरकार के नीति आयोग के अंतर्गत काम करने वाले अटल इनोवेशन मिशन ने उनकी इस उपलब्धि को प्रमुखता से सराहा है। उन्हें वर्ष 2026 के प्रतिष्ठित 'ग्रासरूट्स इनोवेटर रिकग्निशन' के लिए चुना गया है। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि पूरे देश से इस विशेष सम्मान के लिए केवल 26 इनोवेटर्स का ही अंतिम रूप से चयन किया गया है, जिनमें नेहा ने अपनी मजबूत जगह बनाई है। आगामी 31 जुलाई 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित ऐतिहासिक राष्ट्रपति भवन में एक भव्य समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस विशेष मौके पर देश की वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू उन्हें इस बड़े राष्ट्रीय सम्मान से पुरस्कृत करेंगी। इसके अलावा, उनके इस खास डिजाइन को भारत सरकार की ओर से आधिकारिक रूप से पेटेंट भी प्रदान किया जा चुका है।
अन्य दिव्यांग बच्चों के लिए बनीं उम्मीद की किरण
अपने खुद के बच्चे की जिंदगी को आसान बनाने के बाद उन्होंने महसूस किया कि देश भर में ऐसे लाखों माता-पिता हैं जो हर दिन इसी तरह की परेशानियों से दो-चार हो रहे हैं। इस समस्या के स्थायी समाधान के रूप में उन्होंने एक कंपनी की नींव रखी जो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सहायक उपकरणों का निर्माण करती है। यह कंपनी अब तक बाजार में दो अलग-अलग प्रकार की विशेष कुर्सियां सफलतापूर्वक उतार चुकी है। वर्तमान में वे कई अन्य ऐसे उपकरणों की रूपरेखा पर भी काम कर रही हैं, जिनकी सहायता से शारीरिक रूप से अक्षम बच्चे अपने रोजमर्रा के कामों में ज्यादा स्वतंत्र और आत्मनिर्भर महसूस कर सकें। उनके इस पूरे सफर में उनके पति डॉ. अभिषेक भाटी ढाल बनकर उनके साथ खड़े रहे हैं, जो खुद समाज सेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं और एक एनजीओ के साथ-साथ एक नशा मुक्ति केंद्र का भी संचालन करते हैं। आज यह दंपती पूरे भारत में विशेष बच्चों वाले परिवारों के लिए संघर्ष और सफलता की एक बड़ी मिसाल बन चुका है।


















