बिहार के छपरा जिले में खेती को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां पारंपरिक अनाज की जगह नगदी फसलें किसानों की आर्थिक स्थिति को पूरी तरह बदल रही हैं। इसी कड़ी में गरखा इलाके के रहने वाले सुरेंद्र राम ने रिवर्स माइग्रेशन की एक शानदार मिसाल कायम की है। ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करने के बाद जब उन्हें अच्छी नौकरी नहीं मिली, तो वे रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की तरफ निकल गए थे। लेकिन दिल्ली और पंजाब की फैक्ट्रियों में हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी जब उनके परिवार का गुजारा नहीं हो सका, तो उन्होंने वापस अपने गांव लौटकर खेतों का रुख किया और आज वह सब्जियों की खेती से शानदार मुनाफा कमा रहे हैं।
शहरों की भागदौड़ और मोहभंग
देश के लाखों युवाओं की तरह सुरेंद्र ने भी कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री इस उम्मीद में हासिल की थी कि उन्हें एक बेहतर नौकरी मिलेगी। बेरोजगारी के दौर में जब ऐसा नहीं हुआ, तो परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों ने उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर कर दिया। वे दिल्ली और पंजाब गए, जहां उन्होंने अलग-अलग फैक्ट्रियों में काम करना शुरू किया। वहां हर दिन आठ घंटे की लंबी शिफ्ट में काम करने के बावजूद उन्हें जो पैसा मिलता था, वह बहुत कम था। उस मामूली वेतन से न तो शहर में उनके खुद के रहने का खर्च ठीक से निकल पाता था और न ही बिहार में बैठे उनके परिवार की जरूरतें पूरी हो पा रही थीं।
नगदी फसलों से बदली जिंदगी की राह
शहरों में हो रहे इस आर्थिक संघर्ष से परेशान होकर सुरेंद्र ने एक दिन हमेशा के लिए छपरा वापस लौटने का फैसला किया। गांव आकर उन्होंने पुरानी और पारंपरिक खेती के तरीके को नहीं अपनाया, जिसमें साल में सिर्फ दो बार फसल कटने का इंतजार करना पड़ता है। इसके बजाय, उन्होंने अपना पूरा ध्यान नगदी फसलों यानी हरी सब्जियों के उत्पादन पर लगा दिया। सुरेंद्र ने समझ लिया था कि बाजार में ताजी सब्जियों की मांग हर दिन होती है और इसके जरिए वे अपनी दैनिक आमदनी सुनिश्चित कर सकते हैं। आज यह फैसला उनके लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है।
एक एकड़ में भिंडी और रोजाना तीन हजार की कमाई
इन दिनों सुरेंद्र ने अपनी एक एकड़ जमीन पर सेमरीज वैरायटी की भिंडी लगाई हुई है, जिसका उत्पादन बहुत ही जबरदस्त हो रहा है। खेतों से हर दिन लगभग पांच क्विंटल भिंडी टूटती है, जिसे वे तुरंत बाजार में बेच देते हैं। इस शानदार पैदावार की बदौलत उनकी हर दिन की कमाई 3,000 रुपये के आंकड़े को पार कर जाती है। दिल्ली और पंजाब में जहां उन्हें आठ घंटे की कठिन ड्यूटी करनी पड़ती थी, वहीं अब वे अपने ही खेत में रोज सिर्फ तीन से चार घंटे काम करते हैं। इससे न केवल उनके पास समय की बचत होती है, बल्कि वे अपने परिवार के बीच रहकर कहीं अधिक सुकून की जिंदगी जी रहे हैं।
विविधता से सुनिश्चित होती है पूरे साल की आमदनी
गरखा क्षेत्र के किसानों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे कभी भी किसी एक फसल के भरोसे नहीं बैठते। सुरेंद्र भी अलग-अलग खेतों में कई प्रकार की सब्जियां उगाते हैं। भिंडी के साथ-साथ उनके खेतों में बैगन, करेला, आलू, परवल, गोभी, पालक, धनिया पत्ता, लहसुन, प्याज, मिर्च, नेनुआ और लौकी की फसल भी लहलहा रही है। इस विविधता का फायदा यह होता है कि हर दिन किसी न किसी खेत से कोई सब्जी टूटने के लिए तैयार रहती है, जिससे पूरे साल भर कैश का प्रवाह बना रहता है और आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता।
खेती की कमाई से संवर रहा है परिवार का भविष्य
सब्जियों से होने वाली इस रोजाना की मोटी कमाई ने सुरेंद्र के पूरे परिवार का जीवन स्तर बदल दिया है। इसी आमदनी के जरिए अब घर का सारा खर्च आसानी से निकल जाता है, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई बेहतरीन तरीके से हो रही है और शादी-विवाह से लेकर पक्का घर बनाने तक के सारे बड़े काम पूरे हो रहे हैं। उनका यह सफर साबित करता है कि पारंपरिक खेती के मुकाबले नगदी फसलें कितनी ज्यादा फायदेमंद हैं। वह अन्य किसानों को भी यही सलाह देते हैं कि अगर वे अधिक जमीन पर भिंडी जैसी तेजी से फलने वाली सब्जियों की खेती करें, तो वे निश्चित रूप से अपनी आय में भारी इजाफा कर सकते हैं।




















