पारंपरिक हस्तशिल्प और प्राकृतिक सामग्री से बने उत्पादों का आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है, और छत्तीसगढ़ के गांवों में यह हुनर स्थानीय कारीगरों के लिए आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन चुका है। गरियाबंद जिले के डोंगरी गांव में रहने वाले महेंद्र कुमार ध्रुव बांस का उपयोग करके घरेलू सजावट और रोजमर्रा के उपयोग की विविध वस्तुएं तैयार करते हैं। यह शिल्प न केवल घरों की आंतरिक बनावट को प्राकृतिक सुंदरता प्रदान करता है, बल्कि ग्रामीण स्तर पर निरंतर आजीविका का जरिया भी बना हुआ है।
बांस से तैयार होने वाले उत्पाद और आवश्यक औजार
बांस की मदद से बैठक और अध्ययन कक्ष के लिए कई तरह के उपयोगी सामान बनाए जाते हैं। महेंद्र कुमार ध्रुव सोफा, टेबल, कुर्सी, स्टूल, बुक रैक, चप्पल स्टैंड, पेन स्टैंड, गुलदस्ता, फूलदान और लेटर बॉक्स जैसी वस्तुएं कुशलता से तैयार करते हैं। इन उत्पादों के निर्माण में मुख्य कच्चा माल बांस ही होता है। बांस को जोड़कर मजबूत संरचना देने और सही फिनिशिंग लाने के लिए कील, फेविकोल, आरी, बटासी, दाव और रेगमाल जैसे बुनियादी औजारों तथा सामग्रियों का प्रयोग किया जाता है।
निर्माण प्रक्रिया और जटिल शारीरिक श्रम
बांस से टिकाऊ और सुंदर उत्पाद तैयार करने का काम अत्यधिक धैर्य और शारीरिक श्रम की मांग करता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत कच्चे बांस को छीलने से होती है, जिसमें काफी समय और एकाग्रता लगती है। इसके बाद कारीगर बांस को आवश्यक नाप के अनुसार काटते हैं और विभिन्न पुर्जों को तय आकार में ढालते हैं। साधारण दिखने वाली कच्ची लकड़ी को उपयोगी और कलात्मक घरेलू वस्तुओं में तब्दील करने में कारीगर की शारीरिक मेहनत और तकनीकी समझ दोनों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मासिक आय और उत्पादन आधारित कमाई
इस कुटीर शिल्प में होने वाली आमदनी पूरी तरह से तैयार किए गए उत्पादों की संख्या और उनकी बिक्री पर टिकी होती है। कारीगर जितनी अधिक वस्तुएं निर्मित करते हैं, उसी अनुपात में उनकी आय निर्धारित होती है। विभिन्न प्रकार की घरेलू वस्तुएं बनाकर इस काम से प्रति माह लगभग 10 हजार से 20 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है। स्थानीय स्तर पर यह शिल्प कौशल रोजगार और नियमित आय का एक व्यावहारिक साधन साबित हो रहा है।



















