आज के आधुनिक दौर में जहां हर कोई सुख-सुविधाओं के पीछे भाग रहा है, वहीं गाजीपुर का कृषि जगत आज भी अपने एक ऐसे गुरु को याद करता है जिसने सिर्फ एक साइकिल और मिट्टी के प्रति अटूट प्रेम के दम पर हजारों छात्रों का भविष्य संवार दिया। गाजीपुर के पीजी कॉलेज के कृषि संकाय के पूर्व डीन डॉ. वशिष्ठ यति ने अपना पूरा जीवन छात्रों को पढ़ाने और किसानों को सही राह दिखाने में समर्पित कर दिया। आज उनके पढ़ाए हुए तमाम छात्र पूरे भारत में कृषि वैज्ञानिक, अधिकारी और शोधकर्ता के तौर पर महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
गांव से निकलकर डीन बनने तक का सफर
डॉ. यति की यह प्रेरणादायक यात्रा उनके गांव से शुरू हुई। गांव में अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए कानपुर कृषि विश्वविद्यालय का रुख किया, जहां से उन्होंने हॉर्टिकल्चर (उद्यान विज्ञान) में एमएससी की डिग्री हासिल की। साल 1983 में उन्होंने गाजीपुर के पीजी कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर अपने शिक्षण करियर की शुरुआत की। उनके शुरुआती दिन काफी मेहनत भरे रहे, क्योंकि उन्हें हॉर्टिकल्चर के साथ-साथ मृदा विज्ञान भी पढ़ाना पड़ता था।
साल 1988 के बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान सिर्फ हॉर्टिकल्चर विषय पर केंद्रित कर लिया और अपनी विशेषज्ञता छात्रों को बांटने लगे। उनकी इसी लगन और मेहनत को देखते हुए साल 2004 में उन्हें कृषि संकाय का विभागाध्यक्ष (HOD) बना दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में दशकों तक अपना बहुमूल्य योगदान देने के बाद, डॉ. यति साल 2021 में डीन के पद से शान के साथ सेवानिवृत्त हुए।
हॉर्टिकल्चर की नई शुरुआत और किसानों को चेतावनी
पीजी कॉलेज में डॉ. यति का सबसे बड़ा योगदान उद्यान विज्ञान की अलग से पढ़ाई शुरू करवाना रहा। पूर्व सचिव डॉ. राजेश्वर सिंह के सहयोग से कॉलेज में यह पहल की गई। इस नई शुरुआत के बाद से कॉलेज से लगातार हॉर्टिकल्चर के विशेषज्ञ छात्र निकलने लगे, जो आज देशभर के कई बड़े संस्थानों में काम कर रहे हैं।
डॉ. यति की सबसे खास बात यह थी कि वो सिर्फ क्लासरूम तक ही सीमित नहीं रहे। वे अपनी साइकिल उठाते थे और सीधे किसानों के खेतों में पहुंच जाते थे। उन्होंने उस दौर में किसानों को एक बहुत बड़ी चेतावनी दी थी। दरअसल, उस समय किसान बिना सोचे-समझे अंधाधुंध रासायनिक खाद और फर्टिलाइजर का इस्तेमाल कर रहे थे। बैंगन की फसल में ‘फ्यूराडॉन’ नामक रसायन का बहुत ज्यादा प्रयोग हो रहा था। डॉ. यति ने तब किसानों को आगाह किया था कि यह अत्यधिक रसायनों का इस्तेमाल खेती की उम्र को खत्म कर देगा। आज उनकी वह बात बिल्कुल सच साबित हुई है। अत्यधिक रसायनों के कारण गाजीपुर में बैंगन और फूलगोभी की खेती का पुराना गौरव अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
छात्रों के दिलों में बसने वाला पढ़ाने का अनूठा अंदाज
डॉ. यति के पढ़ाने का तरीका इतना अलग और प्रभावी था कि उनके छात्र आज भी उनकी क्लास को बहुत याद करते हैं। उनके एक पूर्व छात्र किशन मिश्रा का कहना है कि सर का पढ़ाने का अंदाज इतना सरल और प्रैक्टिकल हुआ करता था कि छात्रों को कभी भी हॉर्टिकल्चर रटने की जरूरत ही नहीं पड़ी। वे कहते हैं कि आज भी गुरु जी की बताई गई बातें उनके कानों में गूंजती हैं।
वर्तमान में ब्लॉक कृषि अधिकारी के पद पर तैनात अभिनव यादव बताते हैं कि छात्रों के लिए एक्स्ट्रा क्लास लेने का डॉ. यति का जज्बा आज भी उनके लिए एक बड़ी प्रेरणा है। इसी अतिरिक्त मेहनत और मार्गदर्शन की मदद से कई छात्रों ने कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल की। पंजाब यूनिवर्सिटी में पीएचडी स्कॉलर जसवंत प्रजापति ने अपने गुरु को याद करते हुए कहा, "सर की सहजता ही उनकी ताकत थी।" प्रजापति ने बताया कि साइकिल से कॉलेज आना और बच्चों को पौधों के वैज्ञानिक नाम से लेकर उनके फायदों तक सब कुछ बिल्कुल प्रैक्टिकल तरीके से समझाना ही डॉ. यति की असली पहचान थी।



















