खेती-किसानी को लेकर अक्सर लोगों के मन में एक ही छवि उभरती है, लेकिन उत्तर प्रदेश का मुरादाबाद जिला इस धारणा को पूरी तरह बदल रहा है। यहां के खेतों में अब पारंपरिक हल और बैल के साथ-साथ आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक शोध और नई व्यावसायिक सोच ने जगह ले ली है। कृषि अब कोई मजबूरी का पेशा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा लाभदायक उद्यम बन चुका है जिसने बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उच्च वेतन वाली नौकरियों और प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पदों को भी पीछे छोड़ दिया है। इस बड़े बदलाव के पीछे जिले के पांच ऐसे दूरदर्शी लोग शामिल हैं, जिन्होंने अपनी अभिनव सोच से पूरी कृषि व्यवस्था को एक नई दिशा दी है।
लाखों का पैकेज और वैज्ञानिक पद छोड़कर चुनी मिट्टी की राह
आज के समय में युवा वर्ग शहरों की तरफ भाग रहा है, वहीं डॉ. अयूब हुसैन ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी 33 लाख रुपये के भारी भरकम पैकेज वाली शानदार नौकरी को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और वापस अपनी जड़ों की ओर लौट आए। उनके इस कदम ने कई लोगों को हैरान किया, लेकिन उनका लक्ष्य बिल्कुल स्पष्ट था। डॉ. अयूब ने खेतों के बीच तालाब बनाकर मोती पालन का उद्यम शुरू किया। एक समय था जब मोती केवल समुद्र से निकाले जाते थे, लेकिन उन्होंने इस तकनीक को मीठे पानी के तालाबों में सफलतापूर्वक अपनाकर एक बहुत बड़ा उदाहरण पेश किया है। आज उनका यह व्यवसाय केवल उनके लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों के कई युवाओं के लिए रोजगार का एक सशक्त माध्यम बन गया है।
इसी तरह का एक और साहसिक कदम शुभांकर सिंह ने उठाया। एक पेशेवर वैज्ञानिक के रूप में अपना करियर बनाने वाले शुभांकर ने जब महसूस किया कि उनके वैज्ञानिक ज्ञान का असली उपयोग प्रयोगशालाओं से बाहर खेतों में हो सकता है, तो उन्होंने कृषि को अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। शुभांकर ने साबित कर दिया है कि अगर वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन, सिंचाई और उन्नत बीजों का उपयोग किया जाए, तो कृषि एक बेहद सम्मानजनक और मुनाफा देने वाला पेशा बन सकती है। वह दर्जनों प्रकार के जैविक उत्पाद तैयार कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता कम से कम लागत में मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता को बनाए रखना और एकदम शुद्ध जैविक उत्पाद आम जनता तक पहुंचाना है। वह युवाओं के लिए एक चलती-फिरती मिसाल बन चुके हैं।
मोती और जैविक सब्जियों का अनोखा संगम
कृषि में विविधीकरण यानी अलग-अलग तरह के उत्पाद एक साथ तैयार करना ही सफलता की असली कुंजी है। इस बात को ओमप्रकाश सिंह ने बहुत अच्छी तरह से समझा है। वह खेती को सिर्फ एक दिशा में नहीं चलाते। ओमप्रकाश ने अपने खेतों में एक ऐसा अनूठा मॉडल विकसित किया है जिसमें पारंपरिक फसलों के साथ-साथ सीप के जरिए तालाबों में मोती पाले जा रहे हैं। यह मोती पालन उन्हें बाजार से एक अतिरिक्त और बहुत बड़ी आमदनी देता है, जिससे खेती में होने वाले सामान्य जोखिम कम हो जाते हैं।
इसके साथ ही उनका पूरा ध्यान प्राकृतिक तरीकों पर केंद्रित है। रासायनिक उर्वरकों से होने वाले नुकसान से बचने के लिए ओमप्रकाश पूरी तरह से गोबर की खाद और जैविक खाद पर निर्भर हैं। इन्हीं प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल करके वह बेहद उच्च गुणवत्ता वाली सब्जियां, ताजे फल और अन्य फसलें उगा रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता और उत्पादित सामग्री बाजार में हाथोंहाथ बिक जाती है। उनका यह मॉडल बताता है कि किसान किस तरह अपनी आय के स्रोत बढ़ा सकते हैं।
जिले के हनी मैन और परागण का विज्ञान
मुरादाबाद के एक और किसान नैपाल सिंह ने खेतों में एक बहुत ही मीठी क्रांति ला दी है। स्थानीय लोग उन्हें अब 'हनी मैन' कहकर बुलाते हैं। नैपाल सिंह ने अपना पूरा ध्यान मधुमक्खी पालन पर केंद्रित किया हुआ है। अक्सर लोग मधुमक्खी पालन को सिर्फ शहद निकालने का जरिया मानते हैं, लेकिन नैपाल इसके वैज्ञानिक फायदों को भी समझते हैं और दूसरों को समझाते हैं।
खेतों के आसपास मधुमक्खियां पालने से फसलों में परागण की प्रक्रिया बहुत तेजी से होती है। जब मधुमक्खियां एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती हैं, तो इससे फसलों की पैदावार में भारी बढ़ोतरी होती है। नैपाल सिंह इस बात को जोर देकर कहते हैं कि शहद से होने वाली कमाई तो सिर्फ एक बोनस है, असली फायदा फसल के बढ़ते उत्पादन से होता है। वह केवल खुद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य किसानों और बेरोजगार युवाओं को मधुमक्खी पालन का सघन प्रशिक्षण भी देते हैं, ताकि वे अपना खुद का स्वरोजगार स्थापित कर सकें।
प्राकृतिक खेती और गो आधारित कृषि का विस्तार
इन सभी प्रयासों को एक बड़े स्तर पर ले जाने का काम आरेन्द्र बड़गोती कर रहे हैं। आरेन्द्र ने पूरी तरह से गो आधारित कृषि और प्राकृतिक खेती को अपना मुख्य हथियार बनाया है। उनका स्पष्ट मानना है कि आज के दौर में कृषि में रसायनों का बढ़ता उपयोग न केवल मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह खेती की लागत को भी बेतहाशा बढ़ा रहा है। वह किसानों को समझाते हैं कि गाय के गोबर से तैयार किए गए प्राकृतिक उर्वरक मिट्टी की जान लौटा सकते हैं।
आरेन्द्र केवल उत्पादन तक ही सीमित नहीं रहते। उन्होंने कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण पर भी बहुत काम किया है। फसल को सीधे बाजार में बेचने के बजाय, उसका प्रसंस्करण करके उसे एक उत्पाद के रूप में बेचना किसानों को कई गुना अधिक मुनाफा देता है। आरेन्द्र समय-समय पर ग्रामीण इलाकों में प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते हैं। पर्यावरण संरक्षण, कम लागत वाली खेती और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन के उनके इस बेहतरीन मॉडल को मुरादाबाद ही नहीं, बल्कि कई पड़ोसी जिलों के किसान भी अपना रहे हैं।
कृषि क्षेत्र में नए युग की शुरुआत
मुरादाबाद के इन पांचों किसानों की सफलता की कहानियां केवल उनके व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं हैं। यह पूरे भारत के कृषि क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन और मिट्टी की गिरती उर्वरता किसानों के लिए एक गंभीर संकट बन रही है, उस समय में इन प्राकृतिक और तकनीकी उपायों का महत्व और भी बढ़ जाता है। रासायनिक दवाओं के अंधाधुंध उपयोग से न केवल फसल जहरीली हो रही थी, बल्कि किसानों को आर्थिक रूप से भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था।
आज जब शहरी जीवन शैली से उबकर बहुत से लोग शुद्ध और जैविक खानपान की ओर लौट रहे हैं, तब ऐसे उत्पादों की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है। जैविक खेती से उगाए गए फल और सब्जियां तथा शुद्ध शहद की कीमत आम उत्पादों से कहीं अधिक मिलती है। सीधे खेत से फसल बेचने के बजाय, उसे सही तरीके से पैक करके बाजार में उतारना सीधा लाभ पहुंचाता है। मुरादाबाद का यह कृषि मॉडल अब एक खुली प्रयोगशाला बन चुका है, जहां हर दिन नए किसान आकर प्रशिक्षण ले रहे हैं और अपनी किस्मत खुद लिख रहे हैं।




















