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जहानाबाद के 27 वर्षीय सूरज कुमार ने चाय की टपरी से शुरू कर खड़ा किया देसी ढाबा, मेहनत से बनाई पहचानसक्सेस स्टोरी
2 सित॰ 2026, 9:39 pm (11 दिन पहले)· 3

जहानाबाद के 27 वर्षीय सूरज कुमार ने चाय की टपरी से शुरू कर खड़ा किया देसी ढाबा, मेहनत से बनाई पहचान

बिहार के जहानाबाद निवासी 27 वर्षीय सूरज कुमार ने 19-20 वर्षों के अनुभव और चाय की दुकान से हुई कमाई के बल पर कड़ौना के पास 'सूरज दा ढाबा' शुरू किया है।

बिहार के जहानाबाद जिले के रहने वाले 27 वर्षीय सूरज कुमार ने मेहनत और लगन की एक अनूठी मिसाल पेश की है। लगभग 20 वर्षों के लंबे संघर्ष और चाय की टपरी से हुई कमाई के बल पर उन्होंने कड़ौना के पास एक खूबसूरत देसी ढाबा खोल दिया है। श्याम नगर निवासी सूरज की यह यात्रा हर उस युवा के लिए प्रेरणादायक है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को साकार करना चाहता है।

पिता के सहयोग से शुरू हुआ चाय का सफर

सूरज कुमार ने अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2007 में पिता के काम में हाथ बंटाना शुरू किया था। उस समय उनके पिता की चाय की दुकान सुचारू रूप से नहीं चल पा रही थी। परिवार की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए सूरज आगे आए और सुबह से शाम तक दुकान पर समय देना शुरू किया। शुरुआत में उन्हें व्यापार की ज्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन पिता के मार्गदर्शन और खुद की सीखने की ललक ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।

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चाय में फ्लेवर का प्रयोग और अलग पहचान

दुकान पर समय बिताने के साथ-साथ सूरज ने पारंपरिक चाय के व्यवसाय में कुछ नया करने की सोची। उन्होंने चाय को अलग-अलग स्वाद और फ्लेवर में परोसना शुरू किया। शहर के लोगों को यह नया प्रयोग बेहद पसंद आया, जिससे ग्राहकों की संख्या तेजी से बढ़ी। लगातार 19 वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हुए सूरज ने न केवल शहर में एक खास पहचान बनाई, बल्कि अपनी कमाई में से बचत करके एक बड़ी पूंजी भी एकत्र कर ली।

कड़ौना के पास खोला सूरज दा ढाबा

चाय की टपरी से हुई कमाई और 19 साल के व्यावसायिक अनुभव के दम पर सूरज ने अपना खुद का ढाबा खोलने का निर्णय लिया। स्थान का चयन करने के बाद उन्होंने कड़ौना के पास 'सूरज दा ढाबा' की शुरुआत की। इस ढाबे को पूरी तरह से देसी अंदाज में सजाया गया है, जिसकी बाहरी सुंदरता लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है। सूरज के अनुसार, जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन चाय की कमाई से हुई बचत ने इस नई शुरुआत को संभव बनाया।

ग्राहकों को मानते हैं भगवान

अपनी सफलता पर बात करते हुए सूरज कुमार ने बताया कि जब वे वर्ष 2007 में अपने पिता के साथ चाय की टपरी पर जुड़े थे, तब उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि वे इतनी दूर तक पहुंच पाएंगे। वे अपनी इस उपलब्धि का श्रेय अपने पिता की दी हुई सीख और अपनी निरंतर मेहनत को देते हैं। सूरज का मानना है कि ग्राहक उनके लिए भगवान के समान हैं और वे हर ग्राहक को अपने परिवार के सदस्य की तरह समझते हैं। वे भविष्य में अपने इस व्यवसाय को और आगे ले जाने की योजना बना रहे हैं।

सवाल-जवाब

सूरज कुमार कौन हैं?
सूरज कुमार बिहार के जहानाबाद जिले के श्याम नगर के रहने वाले 27 वर्षीय युवा उद्यमी हैं, जिन्होंने चाय की दुकान से शुरुआत कर अपना ढाबा खोला है।
सूरज कुमार ने चाय की दुकान पर काम कब शुरू किया था?
सूरज कुमार ने अपनी इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2007 में अपने पिता की मदद के लिए चाय की दुकान संभालना शुरू किया था।
सूरज कुमार के ढाबे का क्या नाम है और यह कहाँ स्थित है?
सूरज कुमार के ढाबे का नाम 'सूरज दा ढाबा' है और यह जहानाबाद जिले में कड़ौना के पास स्थित है।
सूरज कुमार ने अपने चाय के व्यापार को कैसे अलग पहचान दी?
सूरज कुमार ने पारंपरिक चाय के बजाय अलग-अलग फ्लेवर में चाय परोसना शुरू किया, जिससे शहर में उनकी एक नई पहचान बनी।
ढाबा खोलने के लिए पूंजी कहाँ से आई?
ढाबा खोलने के लिए आवश्यक पूंजी पूरी तरह से पिछले 19 वर्षों में चाय की दुकान से हुई कमाई और बचत से जुटाई गई।
सूरज कुमार की ग्राहकों के प्रति क्या सोच है?
सूरज कुमार ग्राहकों को भगवान के समान मानते हैं और उनके साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करते हैं।
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