उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित विकासखंड इटियाथोक के गांवों में अब खेती का तरीका तेजी से बदल रहा है। यहां के किसान पारंपरिक खाद्यान्न फसलों के स्थान पर नकदी फसलों और सब्जियों की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। इसी क्षेत्र के रहने वाले प्रगतिशील किसान शत्रुघ्न ने अपनी लगभग एक बीघा जमीन पर तोरई की बुवाई की है। सही समय पर वैज्ञानिक देखभाल और बेहतर प्रबंधन के बल पर उनकी फसल में इस समय शानदार पैदावार देखने को मिल रही है। सब्जियों की इस लाभदायक खेती के जरिए वे न केवल अपना व्यवसाय चला रहे हैं, बल्कि अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण भी बहुत सम्मानजनक तरीके से कर रहे हैं।
मचान विधि और फसल की देखभाल की प्रक्रिया
किसान शत्रुघ्न ने तोरई की बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय मचान विधि का चयन किया है। इस तकनीक के तहत खेत में बांस और तारों की मदद से एक मजबूत ढांचा तैयार किया जाता है। जैसे-जैसे तोरई की बेलें बड़ी होती हैं, उन्हें इस मचान पर सहारा देकर ऊपर चढ़ा दिया जाता है। मचान पर फैलने के कारण बेलों को पर्याप्त धूप और हवा मिलती है, जिससे फल सड़ने या खराब होने से बच जाते हैं। इसके साथ ही फलों का आकार, चमक और गुणवत्ता भी बेहद आकर्षक बनी रहती है, जिससे बाजार में इनकी मांग बनी रहती है।
अपनी इस फसल की देखभाल के लिए शत्रुघ्न रोज सुबह से ही खेत में सक्रिय हो जाते हैं। बीज की बुवाई से लेकर फसल तैयार होने तक हर चरण पर विशेष ध्यान दिया जाता है। समय-समय पर पौधों की सिंचाई, नियमित निराई-गुड़ाई और आवश्यकतानुसार खाद का संतुलन बनाए रखना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा है। पौधों में किसी भी तरह के रोग या कीट का प्रकोप न हो, इसके लिए वे फसल की नियमित निगरानी करते हैं। इस व्यवस्थित देखभाल का नतीजा यह है कि बेलों में तोरई की भरमार है और पैदावार काफी अच्छी हो रही है।
दूसरे शहर की नौकरी छोड़ गांव में बनाया रोजगार
शत्रुघ्न की जीवन यात्रा संघर्षों से भरी रही है। पारिवारिक आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण वे बचपन में पढ़ाई-लिखाई पूरी नहीं कर सके थे। परिवार की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और आर्थिक तंगी दूर करने के लिए उन्हें अपना घर छोड़कर दूसरे शहर जाना पड़ा, जहां उन्होंने कुछ समय तक नौकरी की। हालांकि, शहर में काम करने के दौरान उन्हें यह अहसास हुआ कि पराए शहर में मेहनत करने से कहीं बेहतर अपने गांव में रहकर अपनी जमीन पर पसीना बहाना है। इसके बाद कुछ कारणों से उन्हें गांव वापस लौटना पड़ा, जिसके बाद उन्होंने अपनी कृषि भूमि को ही स्थायी रोजगार का साधन बनाने का संकल्प लिया।
लागत और कमाई का गणित
तोरई की खेती में लगने वाले खर्च और संभावित मुनाफे के बारे में शत्रुघ्न बताते हैं कि एक बीघा खेत में तोरई की फसल तैयार करने में कुल 15 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इस कुल लागत में उन्नत किस्म के बीज खरीदने, खेत की जुताई, खाद, समय पर सिंचाई और मचान निर्माण समेत खेत की देखरेख की पूरी राशि शामिल होती है। शुरुआती चरण में लगभग 10 हजार रुपये की लागत से भी काम शुरू किया जा सकता है।
शत्रुघ्न के अनुसार, यदि मौसम अनुकूल बना रहे, फसल में कोई बीमारी न लगे और स्थानीय मंडी में तोरई के उचित दाम मिल जाएं, तो एक बीघा जमीन से ही लाखों रुपये की शुद्ध कमाई की जा सकती है। सब्जियों की खेती में सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि इसमें तुड़ाई लगातार कई हफ्तों तक चलती है, जिससे किसान के हाथ में नियमित रूप से नकद पैसा आता रहता है।
पारंपरिक खेती छोड़कर सब्जी उगाने का संदेश
अपने अनुभव के आधार पर शत्रुघ्न का मानना है कि छोटे और सीमांत किसानों के लिए सब्जियों की खेती एक वरदान की तरह है। वे क्षेत्र के अन्य किसानों को भी सलाह देते हैं कि केवल गेहूं या धान जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने के बजाय उन्हें अपनी जमीन के कुछ हिस्से पर सब्जियों की खेती जरूर करनी चाहिए। कम जमीन वाले किसान भी यदि सही समय पर सिंचाई, खाद और निराई-गुड़ाई का ध्यान रखें और मचान तकनीक जैसी आधुनिक प्रणालियों को अपनाएं, तो वे अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं। आज तोरई की यह सफल खेती उनके परिवार की आजीविका का सबसे मजबूत आधार बन चुकी है।



















