झारखंड के पलामू जिले के नावाटोली गांव में रहने वाले पुलिन मित्र की जिंदगी की कहानी बताती है कि बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए किसी महानगर में रहना जरूरी नहीं. सिर्फ मेहनत, जुनून और लगातार कुछ नया सीखने की चाह हो तो छोटे शहर से भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं. पुलिन मित्र ने बैंक की नौकरी करते हुए भी साहित्य और रंगमंच से अपना नाता कभी टूटने नहीं दिया, और आज वह एक कामयाब नाटककार, लेखक और फिल्म निर्देशक के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. साहित्य से शुरू हुआ उनका यह सफर अब फिल्म निर्देशन तक जा पहुंचा है, और अपने निजी खर्च पर वह अब तक छह फीचर फिल्में और एक दर्जन से ज्यादा शॉर्ट फिल्में बना चुके हैं.
चौथी कक्षा से शुरू हुआ कहानियां लिखने का सफर
पुलिन मित्र बताते हैं कि उन्हें बचपन से ही कहानियां लिखने का शौक था. यह शौक इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी पहली कहानी चौथी कक्षा में ही लिख डाली थी. इसके बाद उन्होंने कहानियां लिखना कभी नहीं छोड़ा और लगातार नई-नई कहानियां लिखते रहे. उनकी मेहनत रंग लाई और उनकी कई कहानियों को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कारों से नवाजा गया. लेखन के प्रति यह बढ़ता लगाव धीरे-धीरे उन्हें नाटक लेखन की दुनिया की तरफ खींच ले गया, और यहीं से उनकी जिंदगी को एक नई दिशा मिली.
टी.एन. वर्मा की सलाह ने बदली नाटककार की राह
इसी दौर में पलामू के जाने-माने नाटककार टी.एन. वर्मा ने पुलिन मित्र को सलाह दी कि वह हिंदी में नाटक लिखें और उनका मंचन भी खुद करें. इस सलाह ने पुलिन मित्र की सोच को नई दिशा दी. इसके बाद उन्होंने हिंदी नाटकों का लेखन और निर्देशन शुरू किया. कई सालों तक वह रंगमंच से गहराई से जुड़े रहे, मंच पर लगातार प्रयोग करते रहे और इस दौरान रंगमंच की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली.
बैंक की नौकरी के बीच भी नहीं टूटा रंगमंच से नाता
उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 1986 में पुलिन मित्र की नौकरी भारतीय स्टेट बैंक में लग गई. नौकरी के दौरान उनका तबादला मुंबई से मेदिनीनगर कर दिया गया. नई जगह और नई जिम्मेदारियों के बावजूद मेदिनीनगर आने के बाद भी उन्होंने रंगमंच से अपना रिश्ता नहीं छोड़ा. वह लगातार नाटकों से जुड़े रहे, और इसी दौर में रंगमंच के उनके कुछ साथियों ने उन्हें सुझाव दिया कि उन्हें अब फिल्में बनानी चाहिए. शुरुआत में उन्हें फिल्म निर्माण की कोई खास जानकारी नहीं थी, इसलिए उन्होंने पहले बाकायदा फिल्म निर्देशन, सिनेमैटोग्राफी और फोटोग्राफी का प्रशिक्षण लिया, ताकि तकनीकी पक्ष को अच्छी तरह समझ सकें.
प्रशिक्षण के बाद पहली वेब सीरीज से शुरू हुआ फिल्मी सफर
प्रशिक्षण पूरा करने के बाद पुलिन मित्र ने अपनी पहली वेब सीरीज 'आहा जिंदगी' बनाई. इस पहले प्रयास ने उनका हौसला बढ़ाया और इसके बाद उनका फिल्मी सफर लगातार आगे बढ़ता चला गया. उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म 'डिफरेंट' का निर्देशन किया, जिसने उन्हें फिल्म निर्देशक के तौर पर पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने 'सितमगढ़' सहित कई शॉर्ट फिल्मों का निर्माण किया और लगातार नए विषयों पर काम करना जारी रखा.
छह फीचर फिल्में, एक दर्जन से ज्यादा शॉर्ट फिल्में, वो भी अपने खर्च पर
पुलिन मित्र अब तक अपने निजी खर्च पर छह फीचर फिल्में और 12 से 13 शॉर्ट फिल्में बना चुके हैं. बिना किसी बड़े प्रोडक्शन हाउस की मदद के इतनी फिल्में बनाना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. इसी साल उन्होंने तीन नई शॉर्ट फिल्में तैयार की हैं, जिनके नाम हैं 'मिसिंग डायरी', 'शिकारी आएगा' और एक अन्य फिल्म. इन तीनों फिल्मों की स्क्रीनिंग भी हो चुकी है, और दर्शकों की तरफ से इन्हें काफी अच्छा समर्थन मिला है, जो पुलिन मित्र के लिए आगे और फिल्में बनाने का हौसला बढ़ाता है.
25 साल में कई सम्मान, सीखने की भूख आज भी बरकरार
नाटक लेखन और निर्देशन के क्षेत्र में पिछले 25 वर्षों के दौरान पुलिन मित्र को कई सम्मान मिल चुके हैं. उन्हें श्रेष्ठ निर्देशन, श्रेष्ठ अभिनेता और श्रेष्ठ स्क्रिप्ट लेखक सहित कई श्रेणियों में पुरस्कृत किया जा चुका है. इतनी उपलब्धियों के बावजूद पुलिन मित्र का मानना है कि सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती. यही सोच उन्हें लगातार कुछ नया सीखने और नए प्रयोग करते रहने के लिए प्रेरित करती है. पुलिन मित्र की यह कहानी इस बात का सबूत है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो छोटे शहर से निकलकर भी बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं.





















