वर्तमान दौर में जहां युवाओं के सामने स्थायी रोजगार की चुनौतियां बनी हुई हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के मऊ जिले के एक युवा ने अपनी सूझबूझ से कृषि क्षेत्र में सफलता की नई मिसाल कायम की है। मऊ जिले के भातकोल निवासी आमीर अहमद ने इंटरमीडिएट तक पढ़ाई करने के बाद किसी नौकरी की तलाश में समय बिताने के बजाय खेती को ही अपना मुख्य व्यवसाय बनाने का निर्णय लिया। पिछले लगभग 5 वर्षों से वह वैज्ञानिक तकनीकों और बेहतर प्रबंधन के सहारे सब्जियों की खेती कर रहे हैं। उन्होंने महज 15 हजार रुपये की शुरुआती लागत से आठ विश्वा जमीन पर ऐसी बहुफसली प्रणाली विकसित की है, जिससे वह लगातार लाखों रुपये का लाभ अर्जित कर रहे हैं।
एक ही ढांचे में तीन फसलों की अनोखी योजना
आमीर अहमद की सफलता का सबसे बड़ा आधार उनकी लागत प्रबंधन तकनीक है। आमतौर पर अलग-अलग फसलों के लिए बार-बार खेत की तैयारी और ढांचे के निर्माण पर बड़ा खर्च होता है। हालांकि, आमीर अहमद ने एक बार ढांचा तैयार करके उसी लागत पर तीन अलग-अलग फसलें उगाने का तरीका विकसित किया है। इस बहुफसली चक्र में वह मुख्य रूप से चिचिन्दा, बोरो और लौकी को शामिल करते हैं। इस पूरी खेती की देखरेख और दैनिक कार्यों के लिए 3 से 4 लोगों की आवश्यकता होती है। एक बार खेत में मेड़बंदी और बुनियादी ढांचा तैयार हो जाने के बाद आगे की दो फसलों में केवल बीज का खर्च आता है, जिससे कुल उत्पादन लागत काफी कम हो जाती है।
मई-जून की बुआई से शुरू हुआ उत्पादन चक्र
इस आधुनिक खेती की शुरुआत आमीर अहमद ने मई और जून के महीनों में की थी। उन्होंने सबसे पहले खेत में व्यवस्थित तरीके से मेड़बंदी तैयार की और उस पर चिचिन्दा के बीज रोपे। जब पौधे अंकुरित होकर बढ़ने लगे, तब उन्होंने मल्चिंग विधि का सहारा लिया और बेलों को मल्चिंग संरचना पर ऊपर चढ़ने के लिए छोड़ दिया। इस बेहतर देखभाल का परिणाम यह रहा कि फसल तेजी से तैयार हुई। वर्तमान में वह पिछले लगभग एक महीने से लगातार चिचिन्दा की हार्वेस्टिंग कर रहे हैं। आठ विश्वा के छोटे से भूभाग पर इस फसल को खड़ा करने में कुल 15000 रुपये का खर्च आया था, जिसे उन्होंने उत्पादन शुरू होने के महज 10 दिनों के भीतर ही पूरी तरह वसूल कर लिया।
कम लागत में लगातार मुनाफे का चक्र
चिचिन्दा की फसल का चक्र समाप्त होने के बाद आमीर अहमद उसी तैयार मेड़बंदी और मल्चिंग ढांचे का उपयोग अगली फसल के लिए करेंगे। चिचिन्दा हटने के तुरंत बाद वह इसी स्थान पर बोरो के बीज लगाएंगे, जिससे बिना नया ढांचा बनाए दूसरी फसल की पैदावार शुरू हो जाएगी। बोरो की हार्वेस्टिंग पूरी होने के बाद इसी चक्र में तीसरी फसल के रूप में लौकी के बीज रोपे जाएंगे। इस तरह एक बार 15 हजार रुपये लगाने के बाद तीनों फसलें उसी मल्चिंग सेटअप पर आसानी से तैयार हो जाती हैं। एक ही लागत में तीन बार भरपूर पैदावार हासिल करके आमीर अहमद खेती से हर साल लाखों रुपये की शुद्ध कमाई कर रहे हैं।



















