अश्लेशा नक्षत्र में गुरु का प्रवेश: अगले 49 दिनों तक मेष, मिथुन समेत इन 7 राशियों की चमकेगी किस्मतफरीदाबाद में मिट्टी की गणेश मूर्तियां पानी में मिनटों में घुलती हैं और 70 प्रतिशत तक सस्ती मिल रही हैंटाटा संस की अर्जी रिजर्व बैंक ने की खारिज, अब शेयर बाजार में दस्तक देने के अलावा नहीं बचा कोई रास्ताराजस्थान में डिजिटल स्क्रीन और उम्मीदों के भारी दबाव से घट रही बच्चों की एकाग्रता, मानसिक तनाव पर विशेषज्ञों की रायदेवघर में धान की बंपर पैदावार के लिए रोपाई के 20 से 25 दिनों बाद क्यों जरूरी है सही खाद का इस्तेमालदेहरादून में बैंक कर्मचारी पर 5 लाख की सुपारी देकर गोली चलवाने वाली पूर्व प्रेमिका और शूटर गिरफ्तारकिचन के चिपचिपे पंखे को नए जैसा चमकाने के लिए अपनाएं ये तीन बेहद आसान घरेलू नुस्खेगणेशोत्सव पर पाना है पारंपरिक और शाही लुक, तो आजमाएं पैठणी साड़ी के ये 5 बेहद खूबसूरत डिजाइनबीकानेर में करीब 1 करोड़ रुपये की व्हेल की उल्टी जब्त, महाराष्ट्र से आए तीन तस्करों पर कसा शिकंजाभारत मंडपम में वैश्विक नेताओं के सामने पेश हुई भारतीय विरासत, पीएम नरेंद्र मोदी ने दिखाई रामेश्वरम के रामनाथस्वामी मंदिर की भव्य झलक
खेत ही बना मुनाफे की फैक्ट्री: छपरा के किसान छेदी यादव की कमाई से 4 घंटे में जो हो, वो परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारीसक्सेस स्टोरी
14 जून 2026, 9:02 am (91 दिन पहले)· 0

खेत ही बना मुनाफे की फैक्ट्री: छपरा के किसान छेदी यादव की कमाई से 4 घंटे में जो हो, वो परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारी

छपरा के संठा गांव के किसान छेदी प्रसाद यादव महज 10 कट्ठा खेत में मचान विधि से लौकी और कुंदरी उगाकर एक सीजन में ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई कर रहे हैं और पलायन की जगह घर पर रहकर खेती को रोजगार का बेहतर रास्ता साबित कर रहे हैं।

परदेस की किसी फैक्ट्री में दिनभर खटने के बजाय अगर अपने ही खेत में चार घंटे की समझदारी भरी मेहनत डाली जाए, तो कमाई भी मोटी होती है और परिवार का साथ भी नहीं छूटता। बिहार के छपरा (सारण) जिले के एक किसान ने इस सोच को अपनी जिंदगी में उतारकर दिखा दिया है कि सही तकनीक के साथ खेती अब घाटे का नहीं, बल्कि दोगुने-तिगुने मुनाफे का सौदा बन सकती है।

संठा गांव का वह किसान जिसने खेती की परिभाषा बदल दी

हम बात कर रहे हैं छपरा जिले के गरखा प्रखंड के संठा गांव में रहने वाले छेदी प्रसाद यादव की। पारंपरिक खेती के ढर्रे को पीछे छोड़कर वे अब एक ही खेत में कई फसलें एक साथ उगाने यानी मल्टी-क्रॉपिंग पर भरोसा करते हैं। खास बात यह है कि उनकी पूरी खेती जैविक (ऑर्गेनिक) विधि से होती है, यानी रासायनिक खाद-दवा से दूरी।

ये भी पढ़ें

उन्होंने अपने महज 10 कट्ठा के खेत में मचान विधि अपनाई है, जिसे मल्टी-लेयर फार्मिंग भी कहते हैं। इसी एक टुकड़े में वे ऊपर लौकी और नीचे कुंदरी की शानदार पैदावार ले रहे हैं। नतीजा यह कि इस छोटे-से खेत से ही एक सीजन में उन्हें ₹1.5 लाख तक की शुद्ध कमाई हो जाती है।

तीन दशक का अनुभव, गांव की मिसाल

छेदी यादव कोई नौसिखिए किसान नहीं हैं। बचपन से ही वे हरी सब्जियों की खेती करते आ रहे हैं और इस काम में उन्हें 30 साल से ज्यादा का तजुर्बा है। खेती को लेकर उनके अनोखे आइडिया और तकनीक आसपास के किसानों को भी खूब भा रहे हैं। पारंपरिक फसलों के साथ-साथ वे सीजनल नकदी फसलें यानी सब्जियां लगाकर अच्छी आमदनी कमाते हैं।

उनकी देखादेखी और मार्गदर्शन में इलाके के कई दूसरे किसान भी बड़े पैमाने पर सब्जी की खेती की ओर मुड़े हैं। इससे वे आत्मनिर्भर बन रहे हैं और अपने परिवार का भरण-पोषण बेहतर ढंग से कर पा रहे हैं।

'घर पर 4 घंटे, परदेस की 8 घंटे की मजदूरी पर भारी'

छेदी यादव साफ कहते हैं कि उन्होंने कभी बाहर जाकर किसी फैक्ट्री में 8 घंटे बंधुआ मजदूरी करने के बारे में नहीं सोचा। उनका मानना है कि परदेस में 8 घंटे खटने और दूसरों की डांट सुनने से कहीं बेहतर है कि घर पर रहकर खेत में 4 घंटे मेहनत कर ली जाए। इससे परिवार और सगे-संबंधियों का साथ भी बना रहता है और कमाई भी शानदार होती है। यही वजह है कि वे अपनी जिंदगी से बेहद संतुष्ट और खुश हैं।

TrendKia से बातचीत में छेदी प्रसाद यादव ने बताया कि कमाने की चाह में वे कभी दिल्ली या पंजाब नहीं गए। बीते 25-30 वर्षों से वे अपने गांव में ही रहकर खेती कर रहे हैं और एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

कुंदरी और लौकी की दोहरी पैदावार

अपनी खेती का गणित समझाते हुए वे बताते हैं कि एक बार में वे करीब 50 किलो तक कुंदरी तोड़ लेते हैं। कुंदरी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि एक बार लगाने के बाद इससे लगभग 2 से 3 साल तक लगातार पैदावार मिलती रहती है। इसी मचान के नीचे से वे रोजाना 70 से 80 पीस लौकी भी तोड़ते हैं। इन सब्जियों को हर हफ्ते छपरा बाजार समिति (मंडी) में ले जाकर बेच दिया जाता है, जिससे नियमित नकदी आती रहती है।

खुद की पढ़ाई छूटी, पर बच्चों को दिला रहे उच्च शिक्षा

बातचीत के दौरान छेदी यादव भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि पारिवारिक गरीबी के चलते वे खुद बिहार बोर्ड (मैट्रिक) से आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। लेकिन आज इसी खेती की बदौलत वे अपने बच्चों को उच्च शिक्षा दिला रहे हैं। उनके बेटे पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी में भी उनका हाथ बंटाते हैं।

छेदी यादव का दो टूक कहना है कि अगर सही तकनीक और सूझबूझ के साथ खेती की जाए, तो युवाओं को रोजगार की तलाश में अपना घर-गांव छोड़कर पलायन करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR