राजस्थान के तुल्लापुरा में आस्था का अनूठा संगम: चार दशकों से एक ही छत के नीचे इबादत कर रहे हिंदू-मुस्लिमदरभंगा के इस ठेले पर बिना तेल के बनता है क्रंची भुजा, कीमत सिर्फ ₹20भगदड़ के दौरान महिला प्रदर्शनकारी को बचाते वक्त जंतर मंतर में ड्यूटी कर रहीं RAF अधिकारी सोनिया सहरावत का हाथ टूटाजयपुर से जुड़े राजमार्गों पर सफर हुआ महंगा, NHAI ने 12 प्रतिशत तक बढ़ाया टोल टैक्ससर्दियों में कटहल बेचकर बंपर कमाई कर रहे जहानाबाद के किसान अंजनी सिन्हा, भाव पहुंचा 150 रुपए किलोआज बिहार विधानसभा में पेश होंगे सात विधेयक, सीएम सम्राट के तीखे तेवर की उम्मीदटीकमगढ़ में मासूम पोती की जान लेने वाली निकली उसकी अपनी दादी, बेटियों से नफरत बनी वजहअतिचारी गुरु 9 अगस्त तक रहेंगे अस्त, मेष-कर्क-तुला-मकर राशि वालों को सतर्क रहने की सलाहएक ही परिवार से 17 डॉक्टर, तीन पीढ़ियों से सीतामढ़ी में चल रही यह अनोखी परंपराकाशी में ठहरने की सस्ती जगहें: इन इलाकों में कम बजट में बुक करें होटल और होमस्टे
कोटा की सड़कों पर 56 वर्षों से चल रही है रामलाल की अनोखी दुकान, जहाँ चंद रुपयों में नए बन जाते हैं फटे हुए महंगे जूतेसक्सेस स्टोरी
14 घंटे पहले· 1

कोटा की सड़कों पर 56 वर्षों से चल रही है रामलाल की अनोखी दुकान, जहाँ चंद रुपयों में नए बन जाते हैं फटे हुए महंगे जूते

आधुनिक दौर में जहाँ युवा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दौड़ में शामिल हैं, वहीं कोटा के छावनी चौराहे पर रामलाल पिछले 56 वर्षों से अपने पुश्तैनी हुनर से महंगे ब्रांडेड जूतों को महज़ 500 रुपये में नया जीवन दे रहे हैं। पिता से मिले धैर्य और मीठे व्यवहार के दम पर वह आज के शिक्षित बेरोजगारों के सामने स्वाभिमान और हस्तकला की एक शानदार मिसाल पेश कर रहे हैं।

आज के तेज़ रफ्तार वाले युग में उपभोक्तावाद पूरी तरह से हावी हो चुका है। लोग किसी भी पुरानी, टूटी हुई या हल्की सी खराब हुई वस्तु को तुरंत फेंककर बाज़ार से नई चीज़ खरीदने में विश्वास रखते हैं। आधुनिक पीढ़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों, वातानुकूलित दफ्तरों और तकनीक आधारित स्टार्टअप्स के पीछे अंधी दौड़ लगा रही है। हाथों से किए जाने वाले पारंपरिक कामों को अक्सर कमतर आंका जाता है। लेकिन इस चकाचौंध के बीच कुछ ऐसे हुनरमंद लोग भी मजबूती से खड़े हैं जो अपनी पारंपरिक कला से समाज को एक बिल्कुल अलग दिशा दिखा रहे हैं। राजस्थान का कोटा शहर वैसे तो अपनी उच्च स्तरीय शिक्षा, कोचिंग संस्थानों और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए पूरे देश में मशहूर है। यहाँ हर साल लाखों युवा अपने भविष्य को संवारने और एक मुकाम हासिल करने के लिए आते हैं। इन्ही व्यस्त और भागदौड़ भरी सड़कों, किताबों की दुकानों और कोचिंग सेंटर्स के बीच एक ऐसी जगह भी है जहाँ एक कारीगर पिछले कई दशकों से अपनी छोटी सी जगह को ही अपना सबसे बड़ा साम्राज्य मानता है। छावनी चौराहे के फुटपाथ पर बैठकर अपने हुनर का जादू बिखेरने वाले रामलाल की कहानी आज के युवाओं और कॉरपोरेट जगत के लिए एक बड़ी मिसाल है। वह फटे हुए और बेकार समझे जाने वाले जूतों को कुछ इस तरह से संवारते हैं कि वे शोरूम से निकले बिल्कुल नए जूतों जैसे दिखने लगते हैं।

उपभोक्तावाद के दौर में मरम्मत का महत्व

वर्तमान समय में नाइकी, एडिडास और प्यूमा जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के जूते पहनना युवाओं के बीच एक बड़ा स्टेटस सिंबल बन चुका है। युवा और उनके माता-पिता इन जूतों पर अपनी गाढ़ी कमाई के हजारों रुपये खर्च करते हैं। लेकिन जब यही महंगे जूते थोड़े से फट जाते हैं, उनका धागा निकल जाता है या उनका सोल उखड़ने लगता है, तो अक्सर लोग उन्हें कबाड़ समझकर कूड़ेदान में डाल देते हैं। नई पीढ़ी मरम्मत कराने की संस्कृति से काफी दूर होती जा रही है। ठीक इसी मानसिकता को छावनी चौराहे पर बैठे रामलाल रोज़ाना खुली चुनौती देते हैं। उनका पूरा आत्मविश्वास और काम पर पकड़ इस बात में झलकती है कि वे किसी भी महंगे ब्रांड के खराब जूतों को बेहद कम लागत में वापस उपयोग के लायक बना सकते हैं। पांच हजार रुपये या उससे भी अधिक की भारी कीमत वाले स्पोर्ट्स या लेदर शूज को वह महज़ पांच सौ रुपये के मामूली खर्च में इस तरह से रिपेयर कर देते हैं कि ग्राहक भी उसे देखकर पूरी तरह से हैरान रह जाते हैं। जब लोग अपने फटे-पुराने जूतों को नए और चमचमाते हुए रूप में देखते हैं, तो उनके मुंह से खुशी और तारीफ के शब्द अपने आप निकल पड़ते हैं। यह सिर्फ चंद पैसों की बचत भर नहीं है, बल्कि संसाधनों के सही उपयोग और पर्यावरण को रबर और प्लास्टिक के कबाड़ से बचाने का भी एक बेहद शानदार और टिकाऊ तरीका है। आज की यूज़ एंड थ्रो संस्कृति में रामलाल जैसे लोग स्थिरता का एक बड़ा संदेश दे रहे हैं。

ये भी पढ़ें

पांच दशक से अधिक का लंबा सफर और अनुभव

किसी एक ही खुले स्थान पर, सर्दी, गर्मी और बरसात को झेलते हुए आधी सदी से ज्यादा समय बिताना कोई मामूली बात नहीं है। रामलाल ने अपनी इस अद्भुत और लंबी यात्रा की शुरुआत साल 1970 में की थी। उस समय वह महज तेरह वर्ष के एक नासमझ किशोर थे। इतनी कम उम्र में जब बच्चों को खेलने-कूदने का शौक होता है, तब उन्होंने अपने पिता के साथ कोटा के इसी ऐतिहासिक छावनी चौराहे पर आकर बैठना शुरू किया था। शुरुआत के पांच वर्षों तक उनके पिता ही मुख्य रूप से मरम्मत का सारा काम संभालते थे। रामलाल चुपचाप उनके बगल में बैठते थे और चमड़े को काटने, सही सुई का चुनाव करने, मोटे धागे पिरोने और जूतों को वापस उनका मूल आकार देने की इस बारीक कला को बेहद गौर से देखते थे। पिता के हाथों की वह जादूगरी और काम करने की रफ्तार उनके जहन में पूरी तरह से बस गई। वह मानते हैं कि असली हुनर किसी बंद कमरे या किताब से नहीं बल्कि खुले वातावरण में ध्यान से देखने और सच्ची लगन से आता है।

रामलाल अपने अनुभव से कहते हैं, "अगर इंसान के भीतर कुछ नया करने का टैलेंट और जज्बा हो, तो वह दुनिया का सब कुछ सीख सकता है।"

पिछले छप्पन वर्षों में उन्होंने इस चौराहे और पूरे कोटा शहर को तेजी से बदलते हुए देखा है। धूल भरी कच्ची सड़कों का डामर वाले पक्के राजमार्गों में तब्दील होना, फुटपाथ के छोटे पेड़ों का विशाल बरगद बन जाना और शहर की आबादी के साथ-साथ वाहनों के शोर का कई गुना बढ़ जाना, यह सब कुछ उनकी आंखों के सामने ही घटित हुआ है। इतनी लंबी अवधि तक एक ही काम को बिना किसी ऊब के पूरी शिद्दत से करना उनके असीम धैर्य और काम के प्रति उनके गहरे प्रेम को ही दर्शाता है।

बढ़ती महंगाई में आम नागरिक के लिए एक बड़ा सहारा

आजकल हर तरफ महंगाई आसमान छू रही है। एक आम वेतनभोगी इंसान, मध्यमवर्गीय परिवार या किसी छात्र के लिए बार-बार नए और ब्रांडेड जूते खरीदना आर्थिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। ऐसे कठिन और आर्थिक दबाव वाले समय में रामलाल का यह छोटा सा दिखने वाला काम लोगों की जेब पर पड़ने वाले भारी बोझ को काफी हद तक कम कर रहा है। उनकी दुकान पर हर दिन औसतन दस से बीस पक्के और नए ग्राहक अपने जूतों की मरम्मत कराने आते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उन स्कूली बच्चों, कॉलेज के छात्रों, फिटनेस के दीवानों और धावकों की होती है जिन्हें रोज़ाना ट्रैक पर दौड़ने या मैदान में खेलने के लिए मजबूत और आरामदायक जूतों की सख्त आवश्यकता होती है। महंगे स्पोर्ट्स शूज की मरम्मत की मांग आज के समय में बहुत तेजी से बढ़ी है क्योंकि उनके सोल अक्सर कठोर सतह पर घिस जाते हैं। रामलाल का मानना है कि जब किसी आम व्यक्ति की मेहनत की कमाई बचती है, तो उसके चेहरे पर जो राहत और खुशी आती है, वही उनके काम का असली और सबसे बड़ा इनाम है। उनका काम मशीन का नहीं बल्कि पूरी तरह से एक हस्तकला है जिसमें बहुत अधिक बारीकी और एकाग्रता की जरूरत होती है। वह इस कड़वी सच्चाई को भी बहुत अच्छे से स्वीकार करते हैं कि इस दुनिया में हर किसी इंसान को पूरी तरह से सौ प्रतिशत संतुष्ट करना लगभग असंभव है। इसके बावजूद उनका यह पक्का दावा है कि उनके पास आने वाले नब्बे प्रतिशत से अधिक ग्राहक उनके काम से पूरी तरह खुश होकर ही अपने घर वापस लौटते हैं।

पिता की दी हुई जीवन बदलने वाली अमूल्य सीख

सार्वजनिक स्थानों, भीड़भाड़ वाले चौराहों और खुले फुटपाथों पर बैठकर काम करना कभी भी आसान नहीं होता। वहां दिन भर में हर तरह के लोग आते हैं। अलग-अलग स्वभाव, भाषा और मानसिकता वाले ग्राहकों से निपटना एक बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक चुनौती होती है। जब रामलाल से यह बात पूछी गई कि उन्होंने इतने लंबे दशकों तक बिना किसी विवाद, बहस या लड़ाई-झगड़े के इतनी शांति से एक ही जगह पर अपना काम कैसे जारी रखा, तो उन्होंने अपनी इस सामाजिक सफलता का पूरा श्रेय अपने दिवंगत पिता को दिया। उनके पिता ने उन्हें जीवन और व्यापार के चार ऐसे अनमोल मूलमंत्र दिए थे जिन्होंने उनके सोचने का नज़रिया ही हमेशा के लिए बदल दिया।

उनका पहला नियम यह था कि हमेशा सामने वाले व्यक्ति से अच्छा व्यवहार करो और मधुर वाणी बोलो। दूसरा नियम था कि दुकान पर आने वाले हर ग्राहक का पूरा आदर किया जाए। तीसरा नियम था कि जीवन के लंबे सफर में चाहे कितनी भी मुश्किल, तनावपूर्ण या भड़काने वाली परिस्थिति क्यों न आ जाए, हमेशा गुस्से की जगह अपने विवेक और बुद्धि से ही काम लो। और अंतिम तथा सबसे महत्वपूर्ण नियम था कि अपने भीतर हर हाल में असीम धैर्य बनाए रखो। रामलाल बहुत गर्व और भावुकता के साथ यह बात मानते हैं कि अगर बचपन में उनके पिता ने उन्हें ये शानदार संस्कार नहीं दिए होते, तो तेरह साल की कच्ची उम्र के उबलते खून और जवानी के गुस्से के कारण वह कब के किसी न किसी से मारपीट करके या उलझकर इस जगह से भाग चुके होते। इन्हीं चार स्वर्णिम नियमों ने उन्हें न सिर्फ एक सफल व्यापारी बल्कि एक बेहद शांत और सुलझा हुआ इंसान भी बनाया है।

सच्चे रोज़गार का मतलब और स्वाभिमान का जीवन

आधुनिक शिक्षा प्रणाली कई बार युवाओं को सिर्फ कागजी डिग्रियां थमा देती है, लेकिन उन्हें ज़मीनी जीवन जीने और रोज़गार पैदा करने का असली हुनर नहीं सिखा पाती। रामलाल ने अपनी स्कूली पढ़ाई केवल पांचवीं कक्षा तक ही की है। शुरुआत में उनके घर और परिवार की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं थी और उन्हें बचपन में कई तरह के अभावों का सीधा सामना करना पड़ा था। लेकिन अपने हाथों के हुनर और भगवान ठाकुर जी पर अटूट विश्वास के दम पर आज वह एक बेहद सम्मानित, स्थिर और संतुष्ट जीवन जी रहे हैं। इस छोटे से दिखने वाले फुटपाथ के काम से वह हर दिन पांच सौ से छह सौ रुपये बहुत आसानी से कमा लेते हैं। यह नियमित कमाई उनके पूरे परिवार का खर्च चलाने और उन्हें एक अच्छी ज़िंदगी देने के लिए पूरी तरह से पर्याप्त है। वह पूरे स्वाभिमान और सीना तानकर कहते हैं कि आज के दौर में जहां बड़े-बड़े डिग्रीधारी, उच्च शिक्षित और पढ़े-लिखे युवा दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और भयंकर बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं, वहीं उनके पास काम की कभी कोई कमी नहीं रहती। रोज़ाना कोई न कोई ग्राहक उनके पास उम्मीद लेकर आता ही है। उनकी यह संघर्ष और सफलता की कहानी इस बात का स्पष्ट और जीता-जागता प्रमाण है कि दुनिया में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। अगर किसी काम को पूरी ईमानदारी, लगन और सही व्यवहार के साथ लंबे समय तक किया जाए, तो वह इंसान को न सिर्फ आर्थिक आज़ादी देता है बल्कि समाज के बीच एक बहुत ऊंचा मुकाम और सम्मान भी दिलाता है।

सवाल-जवाब

रामलाल छावनी चौराहे पर क्या काम करते हैं?
रामलाल पिछले 56 सालों से कोटा के छावनी चौराहे पर महंगे और ब्रांडेड जूतों की मरम्मत का काम करते हैं।
वह महंगे जूतों को रिपेयर करने के कितने पैसे लेते हैं?
वह पांच हजार रुपये तक की कीमत वाले महंगे स्पोर्ट्स या लेदर जूतों को महज़ 500 रुपये में बिल्कुल नया जैसा बना देते हैं।
रामलाल ने यह काम किससे और कब सीखा था?
उन्होंने यह काम साल 1970 में 13 वर्ष की उम्र में अपने पिता के साथ बैठकर और उन्हें काम करते हुए देखकर सीखा था।
रामलाल के पिता ने उन्हें कौन से जीवन मंत्र दिए थे?
उनके पिता ने उन्हें हमेशा मीठा बोलने, ग्राहकों का सम्मान करने, विवेक से काम लेने और असीम धैर्य बनाए रखने की सीख दी थी।
रामलाल रोज़ाना कितने ग्राहकों का काम करते हैं और कितना कमाते हैं?
उनकी दुकान पर रोज़ाना 10 से 20 ग्राहक आते हैं, जिससे वह हर दिन आसानी से 500 से 600 रुपये कमा लेते हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR