पंजाब के छोटे से शहर मोगा की गलियों से निकलकर भारतीय सिनेमा और जनसेवा की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सोनू सूद की जीवन यात्रा कड़े संघर्ष, अटूट अनुशासन और अपार मानवीय संवेदनाओं की कहानी है। एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में पले-बढ़े इस अभिनेता ने जब अपने सपनों के शहर मुंबई में पहला कदम रखा था, तब उनकी जेब में सिर्फ 5,500 रुपये थे। आज फिल्म उद्योग में खलनायक के रूप में अपनी मजबूत धाक जमाने के साथ-साथ वे देश भर के लाखों लोगों के दिलों में एक सच्चे नायक का दर्जा हासिल कर चुके हैं।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई से मिस्टर इंडिया के टॉप 5 तक
सोनू सूद का जन्म पंजाब के मोगा में हुआ था, जहां उनका बचपन बहुत ही सादगी भरे माहौल में बीता। उनके पिता एक स्थानीय कारोबारी थे और उनकी माता एक स्कूल अध्यापिका थीं। घर में पढ़ाई-लिखाई को हमेशा प्राथमिकता दी जाती थी। इसी राह पर चलते हुए सोनू सूद ने महाराष्ट्र के नागपुर शहर से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की। हालांकि, इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान ही उनकी किस्मत ने एक नया मोड़ लिया। अपने कॉलेज के आखिरी साल में उन्होंने एक बहुचर्चित मॉडलिंग प्रतियोगिता में भाग लिया और मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता के शीर्ष पांच प्रतिभागियों में अपनी जगह बनाने में सफल रहे। इसी सफलता ने उनके भीतर अभिनय और ग्लैमर की दुनिया में आगे बढ़ने की इच्छा को जन्म दिया।
मुंबई का शुरुआती संघर्ष और 500 रुपये की पहली कमाई
मॉडलिंग में अपनी शुरुआती पहचान बनाने के बाद सोनू सूद अपनी आंखों में अभिनय का सपना सजाकर मुंबई आ पहुंचे। शुरुआती दौर उनके लिए बहुत कठिन और चुनौतियों से भरा था। मुंबई की व्यस्त जिंदगी में गुजारा करने के लिए उन्होंने एक छोटे से कमरे में छह अन्य लोगों के साथ रहकर दिन काटे। अपने दैनिक खर्चों को पूरा करने के उद्देश्य से उन्होंने 4,500 रुपये महीने की एक बेहद छोटी सी नौकरी भी की। जब उन्हें अपना पहला मॉडलिंग असाइनमेंट मिला, तो उसके लिए उन्हें मात्र 500 रुपये का भुगतान किया गया था। इस सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने अनुशासन को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। चकाचौंध से भरी इस इंडस्ट्री में रहने के बावजूद उन्होंने कभी शराब या धूम्रपान को हाथ नहीं लगाया। वे पूरी तरह शुद्ध शाकाहारी खान-पान और बेहद कड़े फिटनेस दिनचर्या का पालन करते रहे, जिसने उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखा।
दक्षिण भारतीय सिनेमा से बॉलीवुड तक का सफर
सोनू सूद के अभिनय करियर का आगाज दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग से हुआ था। उन्होंने तमिल सिनेमा की फिल्म कल्लाझगर से अपने फिल्मी सफर की शुरुआत की। इसके बाद वर्ष 2002 में आई फिल्म शहीद-ए-आजम के माध्यम से उन्होंने बॉलीवुड की दुनिया में कदम रखा। हालांकि, उन्हें असली पहचान और देशव्यापी लोकप्रियता पर्दे पर नकारात्मक यानी खलनायक के किरदारों को निभाकर हासिल हुई। वर्ष 2008 में रिलीज हुई तेलुगु ब्लॉकबस्टर फिल्म अरुंधति में उनके द्वारा निभाए गए खौफनाक और सशक्त अवतार को दर्शकों और समीक्षकों द्वारा खूब सराहा गया। इसके बाद वर्ष 2010 में आई सुपरहिट बॉलीवुड फिल्म दबंग में छेदी सिंह का किरदार निभाकर वे हर भारतीय घर में पहचाने जाने लगे। उनकी प्रतिभा सिर्फ भारतीय सिनेमा तक ही सीमित नहीं रही, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी और प्रसिद्ध अभिनेता जैकी चैन के साथ बहुभाषी फिल्म कुंग फू योगा में काम करके अपनी बहुमुखी प्रतिभा को साबित किया।
महामारी के दौर में बने लाखों प्रवासियों के मसीहा
फिल्मों में खलनायक के रूप में मशहूर हुए सोनू सूद का सबसे बड़ा और वास्तविक रूप तब सामने आया जब पूरा विश्व कोविड-19 महामारी के संकट से जूझ रहा था। देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान जब लाखों प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे सड़कों पर पैदल ही अपने दूर-दराज के गांवों की ओर जाने के लिए मजबूर थे, तब सोनू सूद सहायता का हाथ बढ़ाकर सामने आए। उन्होंने न केवल 90 हजार से अधिक प्रवासी मजदूरों को बसों, ट्रेनों और उड़ानों के जरिए सुरक्षित उनके घर पहुंचाने की व्यवस्था की, बल्कि गंभीर मरीजों के लिए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराए और सैकड़ों जरूरतमंद मरीजों की दिल की सर्जरी का पूरा इंतजाम किया।
सूद चैरिटी फाउंडेशन और समाज सेवा के नए आयाम
मानवीय सहायता के इस प्रयास को स्थायी और व्यवस्थित रूप देने के लिए सोनू सूद ने सूद चैरिटी फाउंडेशन की स्थापना की। इसके साथ ही उन्होंने प्रवासी रोजगार नामक एक डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की, जिसे बाद में गुड वर्कर का नया नाम दिया गया। इस पहल का मुख्य उद्देश्य देश के युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करना और वंचित वर्गों के बच्चों को मुफ्त शिक्षा और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराना है। इस तरह एक छोटे शहर के साधारण लड़के से लेकर पर्दे के विलेन और असल जिंदगी के जनसेवक बनने का सोनू सूद का यह सफर हर किसी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।



















