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पलामू के किसान ओमकार नाथ ने नीलगाय की मार से बचने के लिए अपनाया पिपरमेंट, अब एक एकड़ से तीन गुना कमाईसक्सेस स्टोरी
3 घंटे पहले· 4

पलामू के किसान ओमकार नाथ ने नीलगाय की मार से बचने के लिए अपनाया पिपरमेंट, अब एक एकड़ से तीन गुना कमाई

पलामू जिले के पड़वा प्रखंड में किसान ओमकार नाथ ने नीलगाय से बचने के लिए पिपरमेंट की खेती शुरू की, जो अब एक एकड़ में लागत का तिगुना मुनाफा दे रही है।

रिया मेननरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता 3 मिनट पढ़ें AI के लिए
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खरीफ सीजन शुरू होते ही झारखंड के पलामू जिले के किसानों की सबसे बड़ी चिंता एक बार फिर सामने आ गई है, नीलगाय के झुंड जो धान, मक्का और दलहन जैसी फसलों को रातोंरात तबाह कर देते हैं। लेकिन पड़वा प्रखंड के किसान ओमकार नाथ ने इस मुसीबत का तोड़ ढूंढ लिया है। उन्होंने अपने खेत में पिपरमेंट लगाना शुरू किया, ऐसी फसल जिसे नीलगाय छूती तक नहीं, और आज यही फैसला उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया है।

नीलगाय से बचाव के साथ मुनाफे का जरिया

जिन किसानों के खेत नीलगाय के हमलों से बार-बार बर्बाद होते हैं, उनके लिए ओमकार नाथ की यह पहल किसी उम्मीद से कम नहीं है। पिपरमेंट की खुशबू और उसका तीखापन नीलगाय को पसंद नहीं आता, इसलिए यह फसल पूरी तरह सुरक्षित रहती है। यही वजह है कि पलामू के बाकी किसान भी अब ओमकार नाथ के खेत की तरफ देखने लगे हैं और उनसे प्रेरणा लेकर एरोमैटिक फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं।

लखनऊ से प्रशिक्षण, गांव में ही डिस्टिलेशन यूनिट

ओमकार नाथ यहीं नहीं रुके। उन्होंने पिपरमेंट का तेल निकालने के लिए अपने गांव में मशीन भी लगवा ली। इसके लिए उन्होंने लखनऊ स्थित सीएमएफ यानी सेंट्रल मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स संस्थान से बाकायदा प्रशिक्षण लिया और फिर गांव में डिस्टिलेशन यूनिट खड़ी की। अब इसी यूनिट की मदद से वे सिर्फ पिपरमेंट ही नहीं, बल्कि लेमन ग्रास, तुलसी, खस और दूसरी एरोमैटिक फसलों का तेल भी निकाल रहे हैं। इन फसलों से बनने वाले एसेंशियल तेल की बाजार में जबरदस्त मांग है और इसके दाम भी अच्छे मिलते हैं।

बहन के घर से लाया पौधा, अब बन गया व्यवसाय

इस खेती की जड़ें करीब 26 साल पुरानी हैं। ओमकार नाथ बताते हैं कि उनकी बहन बरेली में रहती हैं और उन्हीं के घर से वे पहली बार पिपरमेंट का पौधा लेकर आए थे। तब से यह पौधा उनके खेत का हिस्सा बना रहा, लेकिन इसे व्यावसायिक स्तर पर उगाना उन्होंने पिछले दो साल से ही शुरू किया है। शुरुआत में एक एकड़ में खेती पर उन्हें 15 से 20 हजार रुपये खर्च करने पड़े, लेकिन जो उपज और बाजार भाव मिला, वह उनकी उम्मीद से कहीं ज्यादा निकला। इसी सफलता के बाद अब वे अपनी खेती का रकबा और बढ़ाने की योजना बना रहे हैं।

एक एकड़ से 80 से 90 लीटर तेल, लागत का तिगुना रिटर्न

ओमकार नाथ के मुताबिक, एक एकड़ में लगाई गई पिपरमेंट की फसल से करीब 80 से 90 लीटर तेल निकलता है। चूंकि उनके पास अपनी डिस्टिलेशन यूनिट है, इसलिए तेल निकलवाने के लिए उन्हें कहीं बाहर भटकना नहीं पड़ता। बाजार में पिपरमेंट तेल 800 से 1000 रुपये प्रति लीटर तक बिक जाता है। इस हिसाब से देखा जाए तो एक एकड़ से होने वाली कमाई लागत के मुकाबले करीब तीन गुना तक पहुंच जाती है, यानी किसान को हर तरह से फायदा ही फायदा है।

दूसरे किसानों के लिए बड़ा सबक

ओमकार नाथ का कहना है कि जिन इलाकों में नीलगाय लगातार फसलों को नुकसान पहुंचाती रहती है, वहां एरोमैटिक फसलों की खेती एक बेहतर और सुरक्षित विकल्प साबित हो सकती है। कम लागत, कम जोखिम और अच्छी बाजार कीमत, इन तीन वजहों से यह खेती पलामू जैसे इलाकों के किसानों की आमदनी बढ़ाने का असरदार जरिया बन सकती है।

इसका आप पर असर

  • भारत में: नीलगाय से परेशान किसानों के लिए पिपरमेंट, लेमन ग्रास और तुलसी जैसी एरोमैटिक फसलें कम जोखिम वाला विकल्प बन सकती हैं, जिससे आमदनी बढ़ाने का नया रास्ता खुलता है।
  • पलामू में: स्थानीय किसान अब ओमकार नाथ की डिस्टिलेशन यूनिट से जुड़कर अपने पिपरमेंट, लेमन ग्रास या तुलसी का तेल आसानी से निकलवा सकते हैं, जिससे उन्हें अलग मशीन या दूर की यूनिट पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

प्रेरणा और सीख

  • समस्या को मौके में बदला: नीलगाय की समस्या से हार मानने के बजाय ओमकार नाथ ने ऐसी फसल चुनी जिसे नीलगाय नुकसान ही नहीं पहुंचा सकती।
  • धैर्य से शुरुआत: 26 साल पहले बहन के घर से लाया एक पौधा धीरे-धीरे उनके व्यवसाय की नींव बना, भले ही व्यावसायिक खेती शुरू करने में उन्हें सालों लग गए।
  • सिर्फ खेती नहीं, प्रोसेसिंग पर भी ध्यान: उन्होंने लखनऊ से प्रशिक्षण लिया और खुद की डिस्टिलेशन यूनिट लगाई, जिससे उनका मुनाफा कई गुना बढ़ गया।
  • एक फसल से आगे बढ़े: पिपरमेंट के अलावा लेमन ग्रास, तुलसी और खस जैसी फसलों को भी अपनाकर उन्होंने अपनी कमाई के जरिए बढ़ाए।
  • सफलता से दूसरों को प्रेरणा: उनकी मेहनत अब पूरे इलाके के किसानों के लिए मिसाल बन गई है, जो नीलगाय की समस्या से बचने के लिए इसी रास्ते पर चलने की सोच रहे हैं।

सवाल-जवाब

ओमकार नाथ कहां के किसान हैं?
वे झारखंड के पलामू जिले के पड़वा प्रखंड के किसान हैं।
पिपरमेंट की खेती नीलगाय की समस्या में कैसे मदद करती है?
नीलगाय पिपरमेंट की तीखी खुशबू के कारण इस फसल को नुकसान नहीं पहुंचाती, इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
उन्होंने प्रशिक्षण कहां से लिया?
उन्होंने लखनऊ स्थित सीएमएफ यानी सेंट्रल मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स संस्थान से प्रशिक्षण लिया।
एक एकड़ पिपरमेंट की खेती में लागत और मुनाफा कितना है?
शुरुआती लागत करीब 15 से 20 हजार रुपये आती है, जबकि एक एकड़ से करीब 80 से 90 लीटर तेल मिलता है, जिससे कमाई लागत के मुकाबले करीब तीन गुना तक पहुंच जाती है।
बाजार में पिपरमेंट तेल की कीमत क्या है?
बाजार में पिपरमेंट तेल 800 से 1000 रुपये प्रति लीटर तक बिकता है।
क्या वे सिर्फ पिपरमेंट का ही तेल निकालते हैं?
नहीं, अपनी डिस्टिलेशन यूनिट से वे लेमन ग्रास, तुलसी, खस और अन्य एरोमैटिक फसलों का भी तेल निकालते हैं।
उन्होंने पिपरमेंट का पौधा सबसे पहले कहां से लाया था?
करीब 26 साल पहले उन्होंने अपनी बहन के घर बरेली से पिपरमेंट का पहला पौधा लाकर लगाया था।
रिया मेनन
लेखक के बारे मेंरिया मेननफूड एवं रेसिपी संवाददाता अमृतसर
विशेषज्ञताफूड लेखन, रेसिपी, पाककला रुझान, कुकिंग टिप्स, रेस्तराँ रिव्यू, वैश्विक व्यंजन, घरेलू खाना, फूड संस्कृति, लाइफस्टाइल फूड कंटेंट, पाकशास्त्र

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला के रुझानों, रेसिपी, रेस्तराँ संस्कृति, फूड रिव्यू और खाना बनाने की टिप्स को कवर करती हैं। वे फूड प्रेमियों और घरेलू रसोइयों के लिए दिलचस्प सामग्री साझा करती हैं।

रिया मेनन एक फूड एवं रेसिपी संवाददाता हैं जो पाककला पत्रकारिता, रेसिपी विकास, फूड संस्कृति, रेस्तराँ रुझानों और लाइफस्टाइल कुकिंग कंटेंट में विशेषज्ञता रखती हैं। वे रोज़मर्रा के घरेलू खाने के विचारों और पारंपरिक रेसिपी से लेकर आधुनिक फ़्यूज़न व्यंजनों, फूड नवाचारों और डाइनिंग अनुभवों तक — सब कुछ कवर करती हैं। सहज और दिलचस्प कहानी कहने पर ज़ोर देते हुए रिया वैश्विक व्यंजनों, मौसमी रेसिपी, खाना बनाने की तकनीकों और फूड से जुड़े लाइफस्टाइल रुझानों की पड़ताल करती हैं। उनका काम पाठकों को नए व्यंजन खोजने, अपनी कुकिंग बेहतर बनाने और फूड व पाकशास्त्र की बदलती दुनिया से अपडेट रहने में मदद करता है।

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