फसल की कटाई पूरी होने के बाद खेतों में बचे सूखे डंठल और अवशेषों का प्रबंधन हमेशा से किसानों के लिए एक जटिल चुनौती रहा है। तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में जहां मक्का, कपास और सोयाबीन की बड़े पैमाने पर खेती होती है, वहां पैदावार निकालने के बाद भारी मात्रा में कृषि कचरा खेतों में ही छूट जाता था। अगली बुवाई के लिए खेत को तुरंत साफ करने के दबाव में किसान दशकों से इन अवशेषों को आग के हवाले करते आए हैं। इस आग से निकलने वाला धुआं वायुमंडल को जहरीला बनाता ही था, साथ ही जमीन की ऊपरी सतह में मौजूद जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व और लाभकारी जीवाणु भी जलकर नष्ट हो जाते थे। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब किसानों ने एक बेहद कारगर देसी समाधान निकाला है, जिसके तहत वे इन सूखे अवशेषों को बायोचार यानी जैविक कोयले में तब्दील कर रहे हैं।
बिना किसी खर्च के खेत में जैविक कोयला तैयार करने का तरीका
कृषि अवशेषों से बायोचार बनाने की विधि पूरी तरह प्राकृतिक, आसान और शून्य लागत वाली है। कटाई के बाद किसान खेत में बिखरे सूखे डंठलों को एक स्थान पर जमा कर लेते हैं। इसके बाद खेत की जमीन में ही एक छोटा गड्ढा तैयार किया जाता है और सारा कृषि कचरा उसमें भर दिया जाता है। इस सामग्री में आग लगाई जाती है, लेकिन प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा दहन को नियंत्रित रखना है।
यदि कचरे को खुली हवा में तेजी से जलने दिया जाए तो वह तुरंत राख में बदल जाएगा। इसी से बचने के लिए किसान आग पर लगातार पानी का हल्का छिड़काव करते रहते हैं ताकि डंठल भड़कने के बजाय धीमी गति से केवल सुलगते रहें। ऑक्सीजन और पानी के इस सटीक संतुलन से अवशेष राख नहीं बनते, बल्कि ठोस और काले जैविक कोयले का रूप ले लेते हैं। इस पूरी देसी तरकीब में बाहर से कोई मशीन या रासायनिक सामग्री नहीं खरीदनी पड़ती, जिससे यह हर छोटे किसान के लिए सुलभ बन जाती है।
दशकों तक मिट्टी में पोषण और नमी बनाए रखने की क्षमता
जमीन की सेहत सुधारने में बायोचार का प्रभाव असाधारण देखा गया है। स्थानीय किसानों के अनुभवों के मुताबिक, यह जैविक कोयला मिट्टी में मिलने के बाद आसानी से गलता या नष्ट नहीं होता है। एक बार खेत में अच्छी तरह मिला दिए जाने पर यह 20 से लेकर 50 वर्षों तक निरंतर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में सक्षम है।
यह मिट्टी की किसी भी तरह की अवांछित दुर्गंध को खत्म कर उसमें ताजगी और प्राकृतिक मजबूती वापस लाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी जमीन के भीतर जल सोखने और नमी को लंबे समय तक बांधकर रखने की क्षमता है। जब मिट्टी में नमी सुरक्षित रहती है, तो कम बारिश या सूखे के दौर में भी फसलें मुरझाने से बच जाती हैं। इस जैविक कोयले का प्रयोग दलहन, अनाज और हरी सब्जियों समेत किसी भी खाद्य फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित और गुणकारी माना गया है।
ग्रामीण परंपरा से निकला टिकाऊ समाधान
भारतीय ग्रामीण संस्कृति में लकड़ी के कोयले की अपनी अलग पहचान रही है, जहां इसका इस्तेमाल दांत साफ करने वाले मंजन से लेकर दैनिक जीवन की कई जरूरतों में होता रहा है। अब वही पारंपरिक सोच खेती की जमीन को दोबारा जीवंत करने का जरिया बन चुकी है। खेतों में पराली और डंठल जलाकर हवा बिगाड़ने के बजाय यह देसी तकनीक कृषि अपशिष्ट को एक बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा में बदलने का सबसे व्यावहारिक मार्ग दिखा रही है।
























