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खेतों में आग लगाने के बजाय कृषि अवशेषों से बायोचार तैयार कर रहे किसान, दशकों तक कायम रहेगी मिट्टी की नमीतेलंगाना
7 अक्तू॰ 2026, 7:06 am (2 घंटे पहले)· 0

खेतों में आग लगाने के बजाय कृषि अवशेषों से बायोचार तैयार कर रहे किसान, दशकों तक कायम रहेगी मिट्टी की नमी

तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में किसान कपास, मक्का और सोयाबीन के डंठलों को जलाने के बजाय उनसे जैविक कोयला बना रहे हैं, जिससे मिट्टी 20 से 50 साल तक उपजाऊ बनी रहती है।

फसल की कटाई पूरी होने के बाद खेतों में बचे सूखे डंठल और अवशेषों का प्रबंधन हमेशा से किसानों के लिए एक जटिल चुनौती रहा है। तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों में जहां मक्का, कपास और सोयाबीन की बड़े पैमाने पर खेती होती है, वहां पैदावार निकालने के बाद भारी मात्रा में कृषि कचरा खेतों में ही छूट जाता था। अगली बुवाई के लिए खेत को तुरंत साफ करने के दबाव में किसान दशकों से इन अवशेषों को आग के हवाले करते आए हैं। इस आग से निकलने वाला धुआं वायुमंडल को जहरीला बनाता ही था, साथ ही जमीन की ऊपरी सतह में मौजूद जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व और लाभकारी जीवाणु भी जलकर नष्ट हो जाते थे। इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए अब किसानों ने एक बेहद कारगर देसी समाधान निकाला है, जिसके तहत वे इन सूखे अवशेषों को बायोचार यानी जैविक कोयले में तब्दील कर रहे हैं।

बिना किसी खर्च के खेत में जैविक कोयला तैयार करने का तरीका

कृषि अवशेषों से बायोचार बनाने की विधि पूरी तरह प्राकृतिक, आसान और शून्य लागत वाली है। कटाई के बाद किसान खेत में बिखरे सूखे डंठलों को एक स्थान पर जमा कर लेते हैं। इसके बाद खेत की जमीन में ही एक छोटा गड्ढा तैयार किया जाता है और सारा कृषि कचरा उसमें भर दिया जाता है। इस सामग्री में आग लगाई जाती है, लेकिन प्रक्रिया का सबसे अहम हिस्सा दहन को नियंत्रित रखना है।

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यदि कचरे को खुली हवा में तेजी से जलने दिया जाए तो वह तुरंत राख में बदल जाएगा। इसी से बचने के लिए किसान आग पर लगातार पानी का हल्का छिड़काव करते रहते हैं ताकि डंठल भड़कने के बजाय धीमी गति से केवल सुलगते रहें। ऑक्सीजन और पानी के इस सटीक संतुलन से अवशेष राख नहीं बनते, बल्कि ठोस और काले जैविक कोयले का रूप ले लेते हैं। इस पूरी देसी तरकीब में बाहर से कोई मशीन या रासायनिक सामग्री नहीं खरीदनी पड़ती, जिससे यह हर छोटे किसान के लिए सुलभ बन जाती है।

दशकों तक मिट्टी में पोषण और नमी बनाए रखने की क्षमता

जमीन की सेहत सुधारने में बायोचार का प्रभाव असाधारण देखा गया है। स्थानीय किसानों के अनुभवों के मुताबिक, यह जैविक कोयला मिट्टी में मिलने के बाद आसानी से गलता या नष्ट नहीं होता है। एक बार खेत में अच्छी तरह मिला दिए जाने पर यह 20 से लेकर 50 वर्षों तक निरंतर मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने में सक्षम है।

यह मिट्टी की किसी भी तरह की अवांछित दुर्गंध को खत्म कर उसमें ताजगी और प्राकृतिक मजबूती वापस लाता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी जमीन के भीतर जल सोखने और नमी को लंबे समय तक बांधकर रखने की क्षमता है। जब मिट्टी में नमी सुरक्षित रहती है, तो कम बारिश या सूखे के दौर में भी फसलें मुरझाने से बच जाती हैं। इस जैविक कोयले का प्रयोग दलहन, अनाज और हरी सब्जियों समेत किसी भी खाद्य फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित और गुणकारी माना गया है।

ग्रामीण परंपरा से निकला टिकाऊ समाधान

भारतीय ग्रामीण संस्कृति में लकड़ी के कोयले की अपनी अलग पहचान रही है, जहां इसका इस्तेमाल दांत साफ करने वाले मंजन से लेकर दैनिक जीवन की कई जरूरतों में होता रहा है। अब वही पारंपरिक सोच खेती की जमीन को दोबारा जीवंत करने का जरिया बन चुकी है। खेतों में पराली और डंठल जलाकर हवा बिगाड़ने के बजाय यह देसी तकनीक कृषि अपशिष्ट को एक बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा में बदलने का सबसे व्यावहारिक मार्ग दिखा रही है।

सवाल-जवाब

बायोचार किन फसलों के अवशेषों से तैयार किया जा रहा है?
तेलंगाना में किसान मुख्य रूप से कपास, मक्का और सोयाबीन की फसल कटाई के बाद बचे सूखे डंठलों से बायोचार बना रहे हैं।
खेत में बायोचार बनाने का तरीका क्या है?
किसान खेत में छोटा गड्ढा खोदकर उसमें सूखे डंठल डालते हैं और आग लगाते हैं, फिर पानी का छिड़काव कर नियंत्रित रूप से सुलगाते हैं ताकि वह राख बनने के बजाय ठोस कोयला बने।
मिट्टी में एक बार बायोचार डालने का असर कितने समय तक रहता है?
यह जैविक कोयला जमीन में आसानी से नष्ट नहीं होता और लगभग 20 से 50 वर्षों तक लगातार मिट्टी की उर्वरता बनाए रखता है।
बायोचार से फसलों और मिट्टी को क्या मुख्य लाभ होते हैं?
यह मिट्टी की दुर्गंध को सोखता है, नमी को लंबे समय तक बांधकर रखता है और सूखे के समय फसलों को सूखने से बचाने में मदद करता है।
किन फसलों की खेती में बायोचार का उपयोग किया जा सकता है?
बायोचार का इस्तेमाल अनाज, दलहन और सब्जियों सहित किसी भी खाद्य फसल के लिए पूरी तरह सुरक्षित और फायदेमंद है।
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टिप्पणियाँ 5

Tanvi Desai@tanvi-desai·39 मिनट पहले

50 साल तक मिट्टी में नमी रहना और बायोचार बनाना कमाल की देसी तकनीक है!

Arjun Mehta@arjun-mehta·1 घंटे पहले

पराली जलाने का कितना बढ़िया और आसान हल निकाल लिया है किसानों ने।

Divya Reddy@divya-reddy·1 घंटे पहले

अर्जुन जी, सच में बहुत शानदार तरीका है! पर्यावरण भी बचेगा और हमारे स्कूलों के पर्यावरण पाठ्यक्रम में बच्चों को पढ़ाने के लिए एक बेहतरीन व्यावहारिक उदाहरण भी मिल गया।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

सिर्फ थोड़े पानी के छींटों से कचरे को कोयला बना देना कमाल की देसी जुगाड़ है।

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

करन भाई, वही तो! बिना एक रुपया खर्च किए 20 से 50 साल तक मिट्टी उपजाऊ रखने का यह तरीका वाकई गजब है।

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