क्रांतिधरा मेरठ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की स्मृति से जुड़ा ऐतिहासिक श्री क्षेत्रीय गांधी आश्रम इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रहा है। जहां देश भर में विभिन्न आयोजनों के जरिए बापू के आदर्शों को याद किया जाता है, वहीं मेरठ के इस आश्रम परिसर में अपनी ही संस्था की धरोहर को खुर्द-बुर्द होने से बचाने के लिए क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम कर्मचारी संगठन से जुड़े कर्मचारी पिछले 3 साल से अनवरत धरने पर बैठे हैं। कर्मचारियों का साफ कहना है कि यह आश्रम केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की जीवंत धरोहर है, जिसे किसी भी कीमत पर निजी हाथों में बेचने नहीं दिया जाएगा।
धरने की शुरुआत और दोबारा आंदोलन की वजह
राष्ट्रीय धरोहर के संरक्षण को लेकर चल रहे इस आंदोलन का खाका 9 अक्टूबर 2023 को खींचा गया था, जब कर्मचारियों ने आश्रम की संपत्तियों को बचाने के लिए शांतिपूर्ण सत्याग्रह शुरू किया। इस दौरान विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक और सांगठनिक बातचीत के बाद मिले आश्वासनों के मद्देनजर 13 जनवरी 2025 को इस धरने को कुछ दिनों के लिए स्थगित भी किया गया था। कर्मचारियों को भरोसा दिलाया गया था कि संपत्तियों को बेचने की कोशिशों पर रोक लगेगी और ठोस कदम उठाए जाएंगे। इसके बावजूद जब धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो कर्मचारियों ने 21 अप्रैल 2025 से एक बार फिर अपना धरना अनवरत शुरू कर दिया।
अब आलम यह है कि संगठन के कर्मचारी दिन-रात धरना स्थल पर ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि मेरठ क्षेत्रीय गांधी आश्रम और लखनऊ के सदस्यों द्वारा आश्रम की बेशकीमती संपत्ति को बेचने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं। क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम कर्मचारी संगठन के संरक्षक अनंतदेव कौशिक का कहना है कि वे इस संपत्ति को किसी भी हाल में लुटने नहीं देंगे और जब तक कोई पुख्ता कानूनी व प्रशासनिक समाधान नहीं निकलता, उनका गांधीवादी विरोध जारी रहेगा।
विधानसभा में उठा मुद्दा और मुख्यमंत्री का आश्वासन
मेरठ के गांधी आश्रम की बदहाली और संपत्तियों की बिक्री का यह संवेदनशील मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा के पटल पर भी गूंज चुका है। दिसंबर 2025 में विधानसभा सत्र के दौरान उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता विपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने मेरठ के श्री क्षेत्रीय गांधी आश्रम का मामला प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने सदन का ध्यान इस ऐतिहासिक धरोहर के संकट की ओर आकर्षित करते हुए जांच की मांग की थी।
इस मुद्दे पर सदन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जवाब देते हुए स्पष्ट कहा था कि इस पूरे मामले की गहन जांच कराई जाएगी। मुख्यमंत्री ने यह भी चेतावनी दी थी कि जो भी लोग सरकारी और ट्रस्ट की संपत्तियों पर गलत तरीके से कब्जा करने या उन्हें बेचने का प्रयास कर रहे हैं, उनके खिलाफ अत्यंत कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। हालांकि, आंदोलनकारी कर्मचारियों का कहना है कि मुख्यमंत्री के जांच संबंधी निर्देशों के बावजूद अब तक जमीनी स्तर पर दोषियों के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया है। यही कारण है कि कर्मचारी निराश होकर भी अपने संकल्प पर अटल हैं और गांधी जयंती के मौके पर भी धरना स्थल से ही बापू को नमन कर रहे हैं, ताकि इस ऐतिहासिक विरासत की रक्षा की जा सके।
1920 में जेबी कृपलानी ने रखी थी नींव
मेरठ के इस आश्रम का गौरवशाली अतीत देश के स्वतंत्रता संग्राम से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। आश्रम के इतिहास को रेखांकित करते हुए योगेश कुमार ने बताया कि वर्ष 1920 में जेबी कृपलानी द्वारा इसकी नींव रखी गई थी। उस वक्त राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की औपचारिक सहमति और स्वीकृति मिलने के बाद ही इस संस्थान का नाम श्री क्षेत्रीय गांधी आश्रम तय किया गया था। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान यह परिसर केवल खादी उत्पादन तक सीमित नहीं था, बल्कि आजादी की लड़ाई की महत्वपूर्ण रणनीतियां और नीतियां तय करने का मुख्य केंद्र भी रहा था।
इतिहास के पन्नों में यह गौरव भी दर्ज है कि देश आजाद होने के बाद लाल किले पर फहराया गया पहला राष्ट्रीय ध्वज भी इसी मेरठ के गांधी आश्रम में तैयार हुआ था। आजादी के आंदोलन में यहां के कर्मियों ने बढ़-चढ़कर अपना योगदान दिया था। इसके अलावा यहां गांधी जयंती से पूर्व सामूहिक चरखा चलाने की एक अनूठी परंपरा भी दशकों से चली आ रही है, जो स्वावलंबन और स्वदेशी के विचार को दर्शाती है।
हजारों परिवारों का सहारा अब 40 से 45 कर्मियों पर सिमटा
एक ऐतिहासिक दौर ऐसा भी था जब श्री क्षेत्रीय गांधी आश्रम हजारों कामगारों और बुनकरों के परिवारों के भरण-पोषण और लालन-पालन का मुख्य आधार बना हुआ था। आश्रम के अंतर्गत छपाई, बुनाई, कताई और खादी वस्त्र तैयार करने की विस्तृत इकाइयां संचालित होती थीं। देश के कोने-कोने में यहां का खादी उत्पाद अपनी गुणवत्ता और प्रामाणिकता के लिए जाना जाता था।
लेकिन उपेक्षा, अव्यवस्था और कथित कुप्रबंधन के चलते आज यह ऐतिहासिक संस्थान अपनी पहचान खोने की कगार पर पहुंच चुका है। वर्तमान समय में यहां मात्र 40 से 45 कर्मचारी ही शेष रह गए हैं। आश्रम में खादी छपाई समेत कपड़े तैयार करने से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण कार्य पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं और अधिकांश इकाइयों पर ताले लटक चुके हैं। कर्मचारियों का दर्द है कि उत्पादन बंद कर बेशकीमती जमीनों और ढांचों को बेचने का ताना-बाना बुना जा रहा है, जिसे रोकने के लिए वे शांतिपूर्ण सत्याग्रह की राह पर डटे हुए हैं।



















