पारंपरिक सादगी का प्रतीक माना जाने वाला खादी का ताना-बाना अब समकालीन लाइफस्टाइल और हाई-एंड फैशन मंचों पर मजबूती से अपनी जगह बना रहा है। आधुनिक डिजाइनिंग प्रयोगों और समकालीन परिधानों के मेल से खादी केवल सादे कुर्ते तक सीमित न रहकर ब्राइडल वियर और ट्रेंडी कपड़ों का मुख्य आधार बन चुकी है। युवाओं की पसंद को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग लगातार इस स्वदेशी कपड़े को नए रूप-रंग में पेश कर रहा है। इस पूरी मुहिम का सबसे बड़ा असर ग्रामीण स्तर के उन कारीगरों और बुनकरों पर पड़ रहा है, जिनकी आजीविका इस हस्तशिल्प पर टिकी है।
ट्रेड शो और रैंप पर खादी का नया रूप
व्यापार प्रदर्शनियों और फैशन कैटवॉक के जरिए खादी को एक ऐसा आधुनिक मंच दिया जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता शहरी खरीदारों के बीच तेजी से बढ़ रही है। ग्रेटर नोएडा में आयोजित यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में हिस्सा लेने पहुंचे उत्तर प्रदेश खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के डिप्टी सीईओ राजीव त्यागी ने इस बदलाव की रूपरेखा साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि खादी अब एक आधुनिक फैशन स्टेटमेंट के रूप में उभर रही है। बाजार में मौजूद सिंथेटिक या मशीन निर्मित कपड़ों के मुकाबले खादी की वास्तविक ताकत इसका पूरी तरह प्राकृतिक, सांस लेने योग्य कपड़ा होना है।
हाथ से काते गए सूत और हथकरघे पर बुने गए वस्त्र की प्रामाणिकता ही खादी की सबसे बड़ी पूंजी है। विभाग इसी प्राकृतिक खूबी को नए कट्स और ट्रेंडी सिल्हूट्स के साथ मिलाकर युवा खरीदारों तक ले जा रहा है। राजीव त्यागी के अनुसार, युवाओं को जोड़ने के लिए राज्य भर में विशेष फैशन शो कराए जा रहे हैं, ताकि खादी को पारंपरिक छवि के दायरे से बाहर निकालकर वैश्विक फैशन ट्रेंड्स के समकक्ष खड़ा किया जा सके। युवा डिजाइनर अब खादी फैब्रिक का इस्तेमाल भारी शादी-विवाह के परिधानों, आधुनिक जैकेट्स और रोजाना के पश्चिमी परिधानों को तैयार करने में कर रहे हैं। इस बदलाव से बाजार में मांग बढ़ने की उम्मीद है, जिसका सीधा असर उत्पादन और बुनकरों की मजदूरी पर पड़ेगा।
फैशन संस्थानों और डिजाइनरों की भागीदारी
खादी को आधुनिक रूप देने की यह योजना केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के प्रमुख डिजाइन संस्थानों का सहयोग भी इसमें शामिल है। उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो के पहले और दूसरे दोनों संस्करणों में खादी को विशेष प्राथमिकता दी गई थी। पिछले आयोजनों में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फैशन टेक्नोलॉजी, दिल्ली यानी निफ्ट की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली थी। इस साझेदारी के तहत युवा डिजाइनरों ने खादी की बुनावट को नए दौर के अनुसार ढाला और रैंप पर प्रदर्शित किया।
इसी तरह लखनऊ जैसे सांस्कृतिक केंद्रों में भी लगातार फैशन कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहां खादी के विशेष ब्रांड और समकालीन डिजाइन पेश हो रहे हैं। राजीव त्यागी ने रेखांकित किया कि जब कॉलेज और दफ्तर जाने वाले युवा खादी को आकर्षक और ट्रेंडी परिधानों के रूप में देखते हैं, तो वे इसे अपनी नियमित वार्डरोब का हिस्सा बनाने के लिए प्रेरित होते हैं। मांग में यह वृद्धि सीधे तौर पर कताई और बुनाई के काम में लगे ग्रामीण कारीगरों के लिए निरंतर रोजगार सुनिश्चित करती है।
माटी कला और इलेक्ट्रिक चाक से कुम्हारों को तकनीकी सहारा
कपड़ों के साथ-साथ राज्य सरकार पारंपरिक माटी कला को भी आधुनिक तकनीक से जोड़ रही है। ट्रेड शो में इलेक्ट्रिक चाक की मदद से तैयार किए गए टेराकोटा और मिट्टी के बर्तन दर्शकों के बीच भारी आकर्षण जुटा रहे हैं। राजीव त्यागी ने इस तकनीकी बदलाव पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पहले कुम्हारों को भारी शारीरिक मेहनत से हाथ से चलने वाले चाक पर काम करना पड़ता था, जिससे उनका समय अधिक लगता था और उत्पादन सीमित रहता था।
माटी कला बोर्ड के माध्यम से अब कारीगरों को आधुनिक इलेक्ट्रिक चाक मुहैया कराए जा रहे हैं। इससे कुम्हारों की शारीरिक मेहनत कम हुई है और उनकी उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ गई है। प्रदर्शनी में प्रदर्शित कई उत्पाद उन कारीगरों ने तैयार किए हैं, जिन्होंने बैंकों से आसान वित्तीय ऋण प्राप्त करके अपना स्वतंत्र काम शुरू किया है। सरकारी विभाग से जुड़ने के कारण इन कारीगरों को बिचौलियों के बिना सीधे बड़े बाजार और खरीदारों तक पहुंच मिल रही है। चरखे से लेकर फैशन रैंप तक और हाथ के चाक से इलेक्ट्रिक तकनीक तक, यह बदलाव पारंपरिक कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।





















