लखनऊ के राजनीतिक गलियारों में उच्च सदन की दस सीटों के संग्राम को लेकर रणनीतिक बिसात बिछाई जाने लगी है। विधानसभा में संख्या बल की पेचीदगियों के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उन तमाम सियासी चेहरों को दोबारा मंच साझा करने की पेशकश की है, जो पूर्व में उनका खेमा छोड़कर प्रतिस्पर्धी पाले में जा चुके हैं। आगामी मतदान को रिश्तों को फिर से जोड़ने का जरिया बताते हुए उन्होंने संकेत दिया कि अगर पुराने साथी वापस लौटना चाहें तो अतीत की कड़वाहट और गिले-शिकवे भुलाए जा सकते हैं। इस पहल का मुख्य मकसद तीसरे प्रत्याशी की जीत के लिए जरूरी अतिरिक्त मतों का प्रबंध करना है, जिस पर विपक्षी खेमे से तीखे राजनीतिक हमले शुरू हो गए हैं।
पुराने मतभेद भुलाने की पेशकश पर राजनीतिक विवाद
सपा प्रमुख ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि मतभेदों को पीछे छोड़कर जो भी लोग साथ खड़ा होना चाहते हैं, उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए हैं। उनके शब्दों में,
'राज्यसभा चुनाव का समय मिलन का समय होता है।'उन्होंने तर्क दिया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों, आर्थिक चुनौतियों अथवा पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण से जुड़े मसलों पर जिनकी भी सोच साझा है, उन्हें एकजुट होना चाहिए। अतीत की तमाम शिकायतों को दरकिनार करते हुए ऐसे सभी समूहों और नेताओं से हाथ मिलाने की तत्परता दिखाई गई है। हालांकि निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने इस पेशकश को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने इसे एक राजनीतिक चालबाजी बताते हुए कहा कि सूबे का कोई भी दल या विधायक इस किस्म के झांसे में आने वाला नहीं है, क्योंकि हर कोई इस दांव के पीछे की मंशा को भली-भांति पहचानता है।
तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए 9 अतिरिक्त मतों की दरकार
सपा की इस सक्रियता की असल वजह विधानसभा का संख्यात्मक समीकरण है, जहां पार्टी दो सीटों पर आसानी से काबिज होने की स्थिति में होने के बावजूद एक और प्रत्याशी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। राज्य विधानसभा के मौजूदा अंकगणित के मुताबिक एक सीट पर जीत दर्ज करने के लिए प्रथम वरीयता के 37 मतों की आवश्यकता है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सम्मिलित संख्या बल से दो सीटें सुरक्षित मानी जा रही हैं, मगर तीसरे उम्मीदवार की नैया पार लगाने के लिए विपक्षी गठबंधन को 9 अतिरिक्त वोटों का जुगाड़ करना पड़ेगा। यही वजह है कि गुप्त मतदान के दौरान दलबदल और पाला बदलने की अटकलें जोर पकड़ रही हैं। सपा सांसद वीरेंद्र सिंह ने दावा किया है कि सत्ताधारी दल के कई विधायक वर्ष 2027 के चुनावी समर में सपा के सिंबल पर उतरना चाहते हैं और लगातार उनके संपर्क में बने हुए हैं।
ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के छह विधायकों पर टिकी निगाहें
अखिलेश यादव के इस नए रुख को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी के संदर्भ से जोड़कर देखा जा रहा है, जो पूर्व चुनावों में सपा के साझीदार रह चुके हैं और बाद में भाजपा नीत मोर्चे का हिस्सा बन गए। खासकर सुभासपा के छह विधायकों की भूमिका को लेकर भारी संशय बना हुआ है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में ओम प्रकाश राजभर, अब्बास अंसारी, हंसू राम, दूधराम, बेदीराम और जगदीश नारायण को सुभासपा के मान्यता प्राप्त सदस्यों के तौर पर दर्ज किया गया है। इनमें से कई सदस्यों के रुख को लेकर राजनीतिक हलकों में तरह-तरह की चर्चाएं तैर रही हैं।
अब्बास अंसारी से चर्चा के बाद बढ़ी सियासी हलचल
सुभासपा विधायक अब्बास अंसारी ने 1 अक्टूबर को लखनऊ में अखिलेश यादव से व्यक्तिगत भेंट की, जिसने सत्ता पक्ष के कान खड़े कर दिए हैं। हालांकि इस बैठक के आधिकारिक एजेंडे की तफसील सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन इसके तुरंत बाद सुभासपा के कई अन्य विधायकों के विपक्षी खेमे की ओर झुकाव की अटकलें तेज हो गईं। हंसू राम और जगदीश नारायण के नामों को लेकर भी कयासबाजी का दौर जारी है, यद्यपि किसी भी पक्ष ने औपचारिक तौर पर कोई घोषणा नहीं की है। दूसरी ओर, ओम प्रकाश राजभर ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर अपने दल के विधायकों की स्थिति पर मंत्रणा की और स्वीकार किया कि उनकी पार्टी के कुछ विधायक उनके नियंत्रण से बाहर चल रहे हैं। राजभर ने जहां एक तरफ हंसू राम को संतुष्ट करने का दावा किया, वहीं दूसरी ओर अखिलेश यादव पर अपने विधायकों को धमकाने, डराने और धन का प्रलोभन देने के गंभीर आरोप लगाए। इसके अलावा भाजपा विधान परिषद सदस्य सुभाष यदुवंश ने भी तीखा प्रहार करते हुए कहा कि जिन लोगों ने डिंपल यादव के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां की थीं, अब सिर्फ वोटों की खातिर उन्हें गले लगाने की कोशिश की जा रही है।
राम गोपाल यादव और धनराज नाथवानी का नामांकन
समाजवादी पार्टी ने 30 सितंबर को अपने पत्ते खोलते हुए राम गोपाल यादव और धनराज परिमल नाथवानी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया। दोनों प्रत्याशियों ने लखनऊ में अपना नामांकन पत्र विधिवत दाखिल कर दिया है। रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े शीर्ष कॉरपोरेट अधिकारी धनराज नाथवानी को प्रत्याशी बनाकर पार्टी ने सभी को चौंका दिया। उनके पिता परिमल नाथवानी झारखंड से उच्च सदन के सदस्य हैं और पहले भी संसद के इस सदन का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। धनराज नाथवानी की उम्मीदवारी को उच्च सदन की इस लड़ाई में एक अलग रणनीतिक दांव माना जा रहा है।
विधानसभा का मौजूदा गणित और दलीय स्थिति
आगरा के फतेहाबाद विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक छोटेलाल वर्मा के आकस्मिक निधन के पश्चात सदन की प्रभावी सदस्य संख्या में परिवर्तन आया है। मौजूदा आंकड़ों पर नजर डालें तो सत्ताधारी गठबंधन के पाले में कुल 288 विधायक मौजूद हैं। इस खेमे में भाजपा के 255, अपना दल (सोनेलाल) के 13, राष्ट्रीय लोक दल के 9, सुभासपा के 6 तथा निषाद पार्टी के 5 सदस्य शामिल हैं। वहीं विपक्षी पाले में सपा और कांग्रेस के पास कुल 103 विधायकों का समर्थन है, जिसमें 101 सदस्य अकेले समाजवादी पार्टी के हैं। इसके अतिरिक्त जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के पास 2 विधायक हैं, जबकि 3 निर्दलीय विधायक भी सदन में मौजूद हैं। इस दलीय स्थिति के चलते भाजपा गठबंधन अपने बूते 7 सीटों पर विजय सुनिश्चित कर सकता है, जबकि सपा गठबंधन के दो प्रत्याशी आसानी से जीत सकते हैं। दसवीं सीट पर कब्जे की जंग ने ही पूरे मुकाबले को रोचक और अनिश्चित बना दिया है।
16 अक्टूबर को मतदान और मतगणना का तय कार्यक्रम
निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित चुनावी समय-सारिणी के अनुसार उत्तर प्रदेश की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर को मतदान संपन्न होगा। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 6 अक्टूबर मुकर्रर की गई है, जिसके बाद 7 अक्टूबर को पर्चों की संवीक्षा की जाएगी। उम्मीदवारी वापस लेने की अंतिम समय-सीमा 9 अक्टूबर तय है। 16 अक्टूबर के दिन प्रातः 9 बजे से अपराह्न 4 बजे तक वोट डाले जाएंगे और उसी शाम मतगणना पूरी कर परिणाम घोषित कर दिए जाएंगे। दोनों ही प्रमुख खेमे अब अपने विधायकों की बाड़ेबंदी और संभावित सेंधमारी से बचाव की रणनीतियों को अंतिम रूप देने में जुट गए हैं।





















