उत्तराखंड की शांत वादियां और प्राकृतिक सौंदर्य हर मौसम में लाखों सैलानियों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में यह पर्यटन हिमालयी कस्बों के अस्तित्व के लिए एक बड़ा संकट बनकर उभर रहा है। सरोवर नगरी नैनीताल और आस्था का प्रमुख केंद्र कैंचीधाम इस समय जरूरत से ज्यादा मानवीय दबाव और पर्यटकों के अनियंत्रित प्रवाह की दोहरी मार झेल रहे हैं। जब भी कोई लंबा वीकेंड या छुट्टियों का दौर आता है, तो नैनीताल की ऐतिहासिक माल रोड, नैनी झील का किनारा, भोटिया मार्केट, स्नो व्यू पॉइंट और कैंचीधाम आश्रम के आसपास पैर रखने तक की जगह नहीं बचती। संकरी पहाड़ी सड़कों पर घंटों तक रेंगता ट्रैफिक, पार्किंग स्थलों की भारी किल्लत और कई किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें अब इन खूबसूरत वादियों की स्थायी पहचान बन चुकी हैं।
प्रकृति और बुनियादी ढांचे पर गहराता दोहरा संकट
सैलानियों की इस बेतहाशा आमद का दुष्प्रभाव केवल सड़कों पर लगने वाले जाम तक ही सीमित नहीं रह गया है। वाहनों की अनवरत आवाजाही से न सिर्फ कमजोर सड़कों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, बल्कि पहाड़ी हवा में वायु प्रदूषण का स्तर भी बढ़ रहा है। इसके साथ ही कचरा प्रबंधन पूरी तरह चरमरा गया है, जहां प्लास्टिक का भारी अंबार चारों ओर बिखर रहा है। प्राकृतिक जलस्रोतों पर लगातार मांग का बोझ बढ़ता जा रहा है और बुनियादी ढांचे के नाम पर हो रहे अनियोजित निर्माण कार्यों ने समूची हिमालयी पारिस्थितिकी को गहरे जोखिम में डाल दिया है। नीम करोली महाराज के पावन स्थल कैंचीधाम में भी श्रद्धालुओं की लगातार बढ़ती तादाद के चलते वाहनों को संभालना और पार्किंग का इंतजाम करना स्थानीय प्रशासन के लिए एक सिरदर्द बन चुका है। ऐसे में यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या पर्यटन से होने वाले आर्थिक लाभ की अंधी दौड़ में संवेदनशील पहाड़ों की वास्तविक भारवहन क्षमता को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।
भारवहन क्षमता समाप्त, बालियानाला और निहाल नाला पर बढ़ता खतरा
नैनीताल की मौजूदा दुर्दशा और लगातार बढ़ते दबाव पर जाने-माने इतिहासकार डॉ. अजय रावत ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि शहर की इस बेहाल स्थिति को देखकर उन्हें बेहद दुख और पीड़ा होती है। उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 1995 में उन्होंने नैनीताल के संरक्षण और सुरक्षा को लेकर अदालत में एक जनहित याचिका दायर की थी। उस समय अदालत ने बेहद संवेदनशील बालियानाला क्षेत्र और आसपास के इलाकों में सुरक्षात्मक कार्य युद्धस्तर पर पूरे करने के कड़े निर्देश दिए थे, लेकिन उन आदेशों के अनुरूप अपेक्षित स्तर पर धरातल पर काम नहीं किया जा सका।
डॉ. रावत ने एक और महत्वपूर्ण तथ्य उजागर करते हुए बताया कि वर्ष 2006 में एटीआई ने भी स्पष्ट कर दिया था कि नैनीताल की प्राकृतिक भारवहन क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। उन्होंने अतीत की व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि पहले के समय में जब नैनीताल में पर्यटकों और वाहनों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती थी, तो प्रशासन अतिरिक्त गाड़ियों को हल्द्वानी के मैदानी क्षेत्र में ही रोक देता था। आज के भयावह हालात को देखते हुए एक बार फिर वैसी ही सख्त व्यवस्था लागू करने की तत्काल आवश्यकता है। डॉ. रावत के अनुसार, नैनीताल को थामे रखने वाली पहाड़ियां भूगर्भीय रूप से पहले से ही कमजोर हैं। शहर के एक छोर पर बालियानाला क्षेत्र में लगातार भूस्खलन का गंभीर खतरा बना हुआ है, तो वहीं दूसरी ओर राजभवन के ठीक पीछे स्थित निहाल नाला क्षेत्र भी अत्यधिक संवेदनशील बना हुआ है। ऐसे नाजुक दौर में समूचे शहर में पर्यटन को कड़े नियमों के तहत नियंत्रित करना अपरिहार्य हो चुका है।
भूगर्भीय ढलानों पर दौड़ती गाड़ियों का जानलेवा बोझ
भूगर्भ विज्ञानी डॉ. भाष्कर पाटनी ने भी नैनीताल और कैंचीधाम के मार्गों पर बढ़ते वाहनों के बोझ को बेहद खतरनाक और चिंताजनक करार दिया है। उनका स्पष्ट मानना है कि नैनीताल और कैंचीधाम को जोड़ने वाले पहाड़ी मार्ग इतने चौड़े और मजबूत नहीं हैं कि वे अनगिनत वाहनों का ऐसा भारी और निरंतर दबाव बर्दाश्त कर सकें। हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील है और इस तरह अनियंत्रित संख्या में भारी और हल्के वाहनों के चलने से सड़क की सतह और पहाड़ी ढलानों की नींव हिलती है। इसके अलावा, हजारों इंजनों से निकलने वाला विषैला धुआं पहाड़ों के नाजुक पर्यावरण को लगातार प्रदूषित कर रहा है।
डॉ. पाटनी ने चेताते हुए बताया कि गरमपानी से भवाली मार्ग के बीच कई संवेदनशील स्थानों पर पहाड़ों से बोल्डर और भारी पत्थर गिरने की घटनाएं लगातार सामने आती रहती हैं। समूचा हिमालयी क्षेत्र अत्यंत नाजुक पहाड़ों की श्रेणी में आता है, इसलिए यहां कोई भी नया निर्माण या चौड़ीकरण बेहद वैज्ञानिक सोच-विचार के बाद ही किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि खुद नैनीताल की पहाड़ियां बेहद संवेदनशील भूगर्भीय संरचना पर टिकी हैं और मौजूदा शहर का एक बहुत बड़ा हिस्सा पुरानी पहाड़ियों के ढीले मलबे के ऊपर ही बसा हुआ है, जिस पर अतिरिक्त भार विनाशकारी साबित हो सकता है।
विकास और पर्यावरण के संतुलन पर टिकी पहाड़ों की जिंदगी
नैनीताल और कैंचीधाम में आने वाले पर्यटकों का प्रवाह स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। क्षेत्र के होटल, होमस्टे, टैक्सी संचालक, गाइड, रेस्टोरेंट, दुकानदार और अनगिनत छोटे व्यापारियों की रोजमर्रा की आजीविका इसी पर्यटन कारोबार पर निर्भर करती है। लेकिन सबसे बुनियादी सवाल यह है कि पहाड़ों में पर्यटन का मॉडल कैसा होना चाहिए। यदि पर्यटकों की संख्या बिना किसी वैज्ञानिक रोक-टोक के लगातार बढ़ती रही और पार्किंग, ट्रैफिक प्रबंधन, ठोस कचरा निस्तारण, पेयजल आपूर्ति और पहाड़ों की प्राकृतिक भारवहन क्षमता की अनदेखी जारी रही, तो आने वाले समय में यही पर्यटन पहाड़ों के विनाश का सबसे बड़ा कारण बन जाएगा।
विशेषज्ञों का स्पष्ट संदेश है कि पहाड़ों को बचाने का अर्थ पर्यटन पर पूरी तरह पाबंदी लगाना नहीं है, बल्कि इसे व्यवस्थित, नियंत्रित और दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाना है। यदि समय रहते वैज्ञानिक कैरिंग कैपेसिटी के आधार पर नगर में प्रवेश करने वाले सैलानियों और बाहरी वाहनों की संख्या सीमित नहीं की गई, पार्किंग के मजबूत बुनियादी ढांचे नहीं बनाए गए, सार्वजनिक परिवहन को अनिवार्य प्राथमिकता नहीं दी गई और भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर पूर्ण रोक नहीं लगाई गई, तो देवभूमि के इन प्रसिद्ध स्थलों को अपूरणीय क्षति से बचाना असंभव हो जाएगा।



















