पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर यानी पीओके में आम निवासियों और सुरक्षा बलों के बीच बढ़ते तनाव के बीच वहां की स्थिति लगातार संवेदनशील बनी हुई है। सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे नागरिकों पर सुरक्षा बलों की कथित कठोर कार्रवाई को लेकर जहां अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों ने गहरी चिंता जताई है, वहीं वैश्विक मीडिया की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है। दुनिया भर में मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीटने वाले प्रमुख पश्चिमी समाचार संस्थानों ने पीओके में जारी इस मानवीय संकट पर पूरी तरह से रहस्यमयी खामोशी अख्तियार कर रखी है। उल्लेखनीय है कि यही अंतरराष्ट्रीय ब्रॉडकास्टर्स कुछ समय पूर्व भारत की राजधानी में आयोजित कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के प्रदर्शनों पर चौबीसों घंटे कवरेज दे रहे थे। इस स्पष्ट अंतर के सामने आने के बाद वैश्विक मीडिया घरानों की साख, निष्पक्षता और संपादकीय प्राथमिकताओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छिड़ गई है।
पीओके में उपजा मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों की मनमानी से तंग आकर आम नागरिक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए हैं। क्षेत्र से आ रही जानकारियों के मुताबिक, बिजली के बढ़ते दामों, खाद्यान्न की कमी और बुनियादी नागरिक अधिकारों के हनन के खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए सुरक्षा बलों द्वारा कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि वैश्विक स्तर पर काम करने वाली शीर्ष मानवाधिकार संस्थाओं को भी हस्तक्षेप करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र यानी UN और एम्नेस्टी इंटरनेशनल जैसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पीओके में हो रही हिंसा पर अपना कड़ा एतराज जताया है। इन संस्थाओं ने पाकिस्तान सरकार और उसकी सैन्य लीडरशिप को स्पष्ट हिदायत दी है कि वे निहत्थे नागरिकों के खिलाफ बल प्रयोग को तुरंत रोकें और क्षेत्र में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें।
हालांकि, इन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की चेतावनियों के बावजूद दुनिया के प्रमुख समाचार माध्यमों का रुख इस मामले में निराशाजनक रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब पीओके के पीड़ित नागरिकों की बात दुनिया तक पहुंचाने का वक्त आया, तो प्रमुख वैश्विक ब्रॉडकास्टर्स ने इस पूरे घटनाक्रम को ठंडे बस्ते में डाल दिया। वहां की जनता पर ढाए जा रहे जुल्मों और आम लोगों के दर्द की खबरें अंतरराष्ट्रीय टेलीविजन स्क्रीन से पूरी तरह गायब हैं। भारत से जुड़े हर छोटे प्रकरण पर बड़ी-बड़ी विशेष रिपोर्टें तैयार करने वाले ये मीडिया हाउस पीओके में मौलिक अधिकारों के खुले उल्लंघन पर पूरी तरह से मूकदर्शक बने हुए हैं।
पश्चिमी ब्रॉडकास्टर्स की चयनात्मक रिपोर्टिंग और सेंसरशिप का प्रभाव
वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा देखे जाने वाले समाचार चैनलों जैसे बीबीसी, सीएनएन, फॉक्स न्यूज और फ्रांस 24 की रिपोर्टिंग शैली इस वक्त सबसे बड़े विवाद का केंद्र बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया विश्लेषकों ने विभिन्न समयावधियों की कवरेज का अध्ययन करने के बाद पाया कि इन सभी प्रमुख संस्थानों ने पीओके में जारी हिंसा, झड़पों और नागरिक उत्पीड़न की घटनाओं को नगण्य स्थान दिया है। जहां एक तरफ अन्य क्षेत्रों में होने वाली छोटी राजनीतिक हलचलों पर भी दिन-रात बहस आयोजित की जाती है, वहीं पीओके में सैन्य बल प्रयोग से त्रस्त आम लोगों की स्थिति पर कोई गंभीर कवरेज नहीं की गई। इसे आलोचकों ने पश्चिमी मीडिया का स्पष्ट दोहरा रवैया और सिलेक्टिव रिपोर्टिंग करार दिया है।
चिंता की बात यह है कि यह खामोशी केवल विदेशी मीडिया तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान के अपने घरेलू मीडिया ने भी पीओके में चल रहे दमन चक्र और प्रशासनिक कार्रवाई पर पूरी तरह पर्दा डाल रखा है। सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के भारी दबाव के कारण स्थानीय टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में पीओके की वास्तविक स्थिति की कवरेज को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके परिणामस्वरूप, पीओके के नागरिकों की चीखें और उनकी न्याय की गुहार देश के भीतर और बाहर दोनों ही जगह दबाई जा रही है।
भू-राजनीतिक समीकरण और कूटनीतिक दबाव की संभावनाएं
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि पश्चिमी मीडिया संस्थानों द्वारा पाकिस्तान के प्रति दिखाए जा रहे इस नरम रुख के पीछे गहरे भू-राजनीतिक और कूटनीतिक हित छिपे हो सकते हैं। ऐतिहासिक रूप से अमेरिका और पश्चिमी देशों के पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक संरचना के साथ विशेष संबंध रहे हैं। विश्लेषकों का आरोप है कि इसी कूटनीतिक साठगांठ और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की मजबूरी के कारण पश्चिमी मीडिया संस्थान पाकिस्तान के सुरक्षा बलों द्वारा की जा रही हिंसा पर उस तरह से आक्रामक सवाल नहीं उठाते, जैसा कि वे अन्य एशियाई देशों के मामलों में करते हैं। यद्यपि किसी मीडिया संस्थान ने किसी सरकारी दबाव की बात स्वीकार नहीं की है, लेकिन रिपोर्टिंग का यह निरंतर पैटर्न कई गंभीर सवाल उत्पन्न करता है।
वैश्विक मीडिया की इस व्यापक उदासीनता के बावजूद, ब्रिटेन के कई संसद सदस्यों ने पीओके के बिगड़ते हालात पर खुलकर अपनी आवाज उठाई है। ब्रिटिश सांसदों ने अपनी संसद और सार्वजनिक मंचों के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पीओके की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया है। उन्होंने मांग की है कि वैश्विक मीडिया की अनदेखी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और वहां के नागरिकों को अत्याचारों से बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
दिल्ली के प्रदर्शन बनाम पीओके हिंसा का तुलनात्मक अध्ययन
इस पूरे मामले में मीडिया के दोहरे रवैये का सबसे बड़ा प्रमाण तब देखने को मिला जब आलोचकों ने भारत की घटनाओं और पीओके की स्थिति की अंतरराष्ट्रीय कवरेज का आमने-सामने रखकर मुकाबला किया। हाल ही में जब नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP द्वारा विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था, तब पूरे अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भारत पर केंद्रित हो गया था। वैश्विक समाचार चैनलों ने अपने प्राइम टाइम स्लॉट्स, मुख्य हेडलाइंस, वेबसाइट्स के मुख्य पृष्ठों और लाइव प्रसारणों के माध्यम से इस प्रदर्शन के हर पहलू को व्यापक रूप से कवर किया था। उस समय भारत सरकार की नीतियों और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर विदेशी संवाददाताओं द्वारा विस्तृत टिप्पणियां और नैतिक फैसले सुनाए जा रहे थे।
इसके ठीक विपरीत, जब पीओके में निर्दोष लोगों के जीवन पर संकट मंडरा रहा है और उनके बुनियादी नागरिक अधिकार छीने जा रहे हैं, तब अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक भी प्रतिनिधि वहां की स्थिति पर रिपोर्टिंग करता नहीं दिखता। आलोचकों के अनुसार यह तुलना स्पष्ट रूप से उजागर करती है कि पश्चिमी मीडिया के लिए मानवाधिकारों का मुद्दा केवल अपनी राजनीतिक पसंद और सहूलियत का विषय है। भारत के मामलों में तिल का ताड़ बनाने वाले ये अंतरराष्ट्रीय संस्थान पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाइयों पर आंखें मूंदकर बैठ जाते हैं, जिससे उनकी निष्पक्षता का दावा पूरी तरह खोखला साबित होता है।
वैश्विक पत्रकारिता की साख पर पड़ता प्रतिकूल प्रभाव
पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों का तकाजा है कि संवाददाताओं को हर परिस्थिति में निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा का पालन करना चाहिए। हालांकि, पीओके के संदर्भ में पश्चिमी मीडिया के इस रवैये ने दुनिया भर में स्वतंत्र पत्रकारिता के साख को गहरा धक्का पहुंचाया है। जब मुख्यधारा के मीडिया संस्थान अपने रणनीतिक या व्यावसायिक हितों के कारण किसी स्थान पर हो रहे मानवीय संकट की उपेक्षा करते हैं, तो इससे आम जनता का विश्वास समाचार माध्यमों से उठने लगता है।
आज के डिजिटल युग में, जब पारंपरिक मीडिया संस्थान खबरों को दबाने या अनदेखा करने की कोशिश करते हैं, तब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स एक विकल्प के रूप में उभरते हैं। पीओके के निवासियों द्वारा साझा किए जा रहे वीडियो और जानकारियां यह साबित करती हैं कि मुख्यधारा के मीडिया के सन्नाटे के बावजूद सच को ज्यादा देर तक छुपाया नहीं जा सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अब यह तय करना होगा कि मानवाधिकारों की रक्षा केवल भाषणों तक सीमित रहेगी या पीओके जैसे उपेक्षित क्षेत्रों में भी इसे समान रूप से लागू किया जाएगा।



















