गाड़ी का इंश्योरेंस कराते वक्त कंपनियां तुरंत सुरक्षा और परेशानी मुक्त दावों के बड़े वादे करती हैं, लेकिन नुकसान होते ही तकनीकी पेंच फंसाकर पल्ला झाड़ने की कोशिशें आम बात हो चुकी हैं। पंजाब के होशियारपुर जिले से जुड़ा एक ऐसा ही पेचीदा विवाद सामने आया, जहां पॉलिसी जारी होने के कुछ ही घंटों के भीतर वाहन चोरी हो जाने पर इंश्योरेंस कंपनी ने क्लेम पास करने से साफ मना कर दिया। ग्राहक ने इस मनमाने रवैये के खिलाफ हार मानने के बजाय कानूनी लड़ाई लड़ी और उपभोक्ता आयोग ने कंपनी के तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए पीड़ित उपभोक्ता के हक में फैसला सुनाया।
होशियारपुर में बोलेरो पिकअप और इंश्योरेंस का पूरा विवाद
होशियारपुर निवासी जतिंदर कुमार ने चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी के जरिए अपनी महिंद्रा बोलेरो पिकअप गाड़ी फाइनेंस करवाई थी। वाहन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से उन्होंने चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी से 8 सितंबर 2021 से लेकर 7 सितंबर 2022 तक की अवधि के लिए ₹21,103 का प्रीमियम देकर बीमा करवाया। इस पॉलिसी के तहत वाहन का इंश्योर्ड डिक्लेयर्ड वैल्यू (IDV) ₹3.5 लाख तय किया गया था।
बीमा प्रक्रिया पूरी होने के तुरंत बाद 7 और 8 सितंबर 2021 की दरमियानी रात करीब 2 बजे जतिंदर कुमार के घर के बाहर खड़ी यह बोलेरो पिकअप चोरी हो गई। सुबह घटना की जानकारी मिलते ही 8 सितंबर को ही पुलिस में विधिवत एफआईआर दर्ज करवाई गई। लंबी छानबीन के बाद भी जब पुलिस वाहन का सुराग लगाने में नाकाम रही, तो अदालत की ओर से अनट्रेस रिपोर्ट को मंजूरी दे दी गई।
बीमा कंपनी के बहाने और क्लेम खारिज करने का घटनाक्रम
पुलिस की अनट्रेस रिपोर्ट मिलने के बाद जतिंदर कुमार ने नुकसान की भरपाई के लिए इंश्योरेंस कंपनी के समक्ष अपना औपचारिक दावा पेश किया। शुरुआती दौर में कंपनी के प्रतिनिधियों ने प्रक्रिया में देरी के मौखिक बहाने बनाकर मामले को लटकाए रखा। इसके बाद 17 फरवरी 2022 को कंपनी ने आधिकारिक तौर पर क्लेम को खारिज करते हुए यह आरोप लगा दिया कि ग्राहक ने घटना की तारीख और वास्तविक नुकसान के बारे में गलत जानकारी साझा की है।
अपने वैध अधिकार से वंचित किए जाने पर जतिंदर कुमार ने सेवा में घोर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग की शरण ली। आयोग में जब मामला पहुंचा तो बीमा कंपनी ने बचाव में एक नई तकनीकी दलील पेश की। कंपनी ने लिखित जवाब में दावा किया कि गाड़ी 8 सितंबर की रात करीब 2 बजे चोरी हुई थी, जबकि उनके सिस्टम के अनुसार पॉलिसी उसी दिन दोपहर 1:58 बजे शुरू हुई दर्ज थी। कंपनी का कहना था कि चूंकि चोरी की घटना पॉलिसी के प्रभावी समय से पहले हुई, इसलिए वे नुकसान की भरपाई के लिए जवाबदेह नहीं हैं।
आयोग में गवाही और सुप्रीम कोर्ट के फैसले की नजीर
उपभोक्ता आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान फाइनेंस कंपनी के ब्रांच मैनेजर के बयान और रिकॉर्ड ने बीमा कंपनी के रुख की पोल खोल दी। ब्रांच मैनेजर ने अदालत में स्वीकार किया कि 7 सितंबर को ही गाड़ी का भौतिक सत्यापन कर लिया गया था और प्रीमियम की पूरी रकम नकद में प्राप्त कर ली गई थी। इससे यह साबित हो गया कि ग्राहक ने घटना घटने से पहले ही अपनी तरफ से सारी कानूनी औपचारिकताएं और भुगतान निपटा दिया था।
जिला उपभोक्ता आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद स्पष्ट किया कि जब ग्राहक ने घटना से पहले ही प्रीमियम जमा करा दिया था, तो कंपनी आंतरिक प्रशासनिक प्रक्रिया या सिस्टम में लेन-देन दर्ज करने में हुई देरी का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के नेशनल इंश्योरेंस बनाम माया देवी मामले का हवाला दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि प्रीमियम स्वीकार होते ही बीमा दायित्व शुरू हो जाता है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कंपनी ने 17 फरवरी 2022 के अपने रिजेक्शन लेटर में पॉलिसी के समय को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई थी, लिहाजा बाद में नया आधार गढ़कर मुकरना कानूनन गलत है।
आयोग का आदेश: 45 दिनों में भुगतान की समयसीमा
उपभोक्ता आयोग ने चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया कि वह जतिंदर कुमार को ₹3.5 लाख का पूरा बीमा क्लेम 9 फीसदी वार्षिक ब्याज सहित अदा करे। इसके अलावा ग्राहक को मानसिक तनाव और उत्पीड़न झेलने के एवज में ₹25,000 का हर्जाना और कानूनी खर्च के रूप में ₹10,000 अलग से देने का निर्देश दिया गया। अदालत ने सख्त हिदायत दी कि यह पूरी वित्तीय देनदारी 45 दिनों के भीतर पूरी की जाए।



















