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अंबिकापुर से बिलासपुर तक चला मेडिकल सफर, अजगर के मुंह के ट्यूमर की सफल सर्जरीछत्तीसगढ़
16 अक्तू॰ 2026, 11:02 am (2 घंटे पहले)· 0

अंबिकापुर से बिलासपुर तक चला मेडिकल सफर, अजगर के मुंह के ट्यूमर की सफल सर्जरी

छत्तीसगढ़ में वन्यजीव संरक्षण की एक अनोखी घटना सामने आई है जहाँ डॉक्टरों की टीम ने एक अजगर के मुंह के खतरनाक ट्यूमर का वेंटिलेटर पर रखकर जटिल ऑपरेशन किया।

वन्यजीव चिकित्सा के इतिहास में एक अनूठा मामला सामने आया है जहाँ एक बड़े अजगर के मुंह के अंदर उपजे ट्यूमर को जटिल सर्जरी के जरिए बाहर निकाला गया। इस पूरे मेडिकल सफर की शुरुआत अंबिकापुर से हुई जहाँ से इस बेजुबान जीव को लगभग 250 किलोमीटर दूर बिलासपुर पहुंचाया गया। इस चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया के दौरान सरीसृप को वेंटिलेटर पर रखकर उसका इलाज किया गया और डॉक्टरों की सूझबूझ से उसकी जान बचाई जा सकी।

शुरुआत में शिकार समझने की हुई थी भूल

इस पूरी घटना की शुरुआत तब हुई जब स्थानीय रेस्क्यूकर्ता सत्यम द्विवेदी ने एक इंडियन रॉक पाइथन को पकड़ा और उसके सिर का असामान्य रूप से फूला हुआ हिस्सा देखा। पहले उन्हें ऐसा लगा कि शायद इस सांप ने किसी बड़े जीव को निगल लिया है जो उसके गले में अटक गया है। लेकिन जब उन्होंने मु मु मुआयना किया तो अंदर खून के साथ एक अजीब सी गांठ दिखाई दी जिससे गंभीर बीमारी का अंदेशा हुआ।

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वन विभाग की अनुमति से तय किया गया लंबा सफर

स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए सत्यम द्विवेदी ने तुरंत सरगुजा के वन विभाग के डीएफओ से मौखिक अनुमति ली और अजगर को बेहतर इलाज के लिए छत्तीसगढ़ के दूसरे शहर ले जाने का निर्णय किया। बिलासपुर के कानन पेंडारी पहुँचकर उन्होंने डॉक्टर चंदन को वह जीव दिखाया जहाँ जाँच के दौरान पता चला कि यह गांठ कैंसर का रूप ले चुकी है। इसके बाद मामले की नजाकत को देखते हुए उसे वन्यजीव चिकित्सक डॉक्टर पीयूष दुबे के पास भेजा गया।

वेंटिलेटर और आधुनिक उपकरणों का हुआ इस्तेमाल

अजगर जैसी खतरनाक और संवेदनशील प्रजाति का ऑपरेशन करना अपने आप में डॉक्टरों के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। इस प्रक्रिया में एनेस्थीसिया देना और उसे वेंटिलेटर पर संभालना बेहद जोखिम भरा कार्य था जिसके लिए आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की मदद लेनी पड़ी। मेडिकल टीम ने जरूरत के वक्त आईवी फ्लूइड देने के साथ ही सीपीआर और एक्स-रे जैसी तकनीकों का भी पूरी सावधानी के साथ इस्तेमाल किया।

डॉक्टरों के अथक प्रयास से बची जान

साढ़े तीन घंटे तक चली इस लंबी और कठिन सर्जरी के बाद भी डॉक्टरों की धड़कनें इसलिए तेज थीं क्योंकि एनेस्थीसिया का असर काफी लंबे समय तक बना हुआ था। पेट मेडिक्स के संचालक और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉक्टर पीयूष दुबे के निरंतर प्रयासों और देखरेख के चलते धीरे-धीरे उस अजगर की सेहत में सुधार दर्ज किया जाने लगा। अब उस बेजुबान जीव ने अपने शरीर में हलचल शुरू कर दी है और उसकी निगरानी लगातार जारी है।

संरक्षण की दिशा में एक अनुठी मिसाल

कानून के दायरे में संरक्षित इंडियन रॉक पाइथन प्रजाति के इस सफल ऑपरेशन ने वन्यजीव प्रेमियों और चिकित्सकों के बीच एक नई उम्मीद जगा दी है। इस पूरे रेस्क्यू और इलाज ने यह साबित कर दिया है कि इंसानों की तरह ही वन्यजीवों को भी समय पर सही इलाज और मेडिकल सुविधाएँ मिलने पर बचाया जा सकता है।

सवाल-जवाब

अजगर को कहाँ से कहाँ ले जाया गया?
अजगर को अंबिकापुर से लगभग 250 किलोमीटर दूर बिलासपुर स्थित कानन पेंडारी ले जाया गया।
अजगर के मुंह में क्या समस्या थी?
अजगर के मुंह के अंदर एक ट्यूमर था जो बाद में कैंसर का रूप ले चुका था।
यह सर्जरी किसने की?
यह जटिल सर्जरी वन्यजीव चिकित्सक डॉ. पीयूष दुबे द्वारा की गई।
सर्जरी में कितना समय लगा?
अजगर के मुंह के ट्यूमर को निकालने के लिए करीब साढ़े तीन घंटे तक सर्जरी चली।
इलाज के दौरान अजगर को किस उपकरण पर रखा गया?
सांस और एनेस्थीसिया के जोखिम को देखते हुए अजगर को वेंटिलेटर पर रखा गया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 4

Ravikash Gupta@ravikash·1 घंटे पहले

बिलासपुर में जब मैं कछुए के रेस्क्यू सेंटर गया था, तब डॉक्टर दुबे ने मुझे बताया था कि बेजुबानों का ऑपरेशन कितना जोखिम भरा होता है।

Arjun Mehta@arjun-mehta·59 मिनट पहले

रविकेश जी, डॉक्टर दुबे की टीम वाकई कमाल कर रही है। संसद में वन्यजीव संरक्षण कानूनों पर चर्चा के दौरान भी ऐसे समर्पित डॉक्टरों का जिक्र आना चाहिए।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

अंबिकापुर से बिलासपुर तक का यह सफर और वो भी एक अजगर के लिए, वाकई हैरान करने वाला है। कुछ साल पहले जब मैं कानन पेंडारी गया था, तब वहाँ के वन्यजीवों के रेस्क्यू के किस्से सुने थे, पर वेंटिलेटर पर अजगर का ऑपरेशन पहली बार देख रहा हूँ। डॉक्टरों की यह मेहनत सच में कमाल की है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करण भाई, 250 किलोमीटर का वह लंबा सफर सचमुच हैरान करने वाला है। डॉक्टर पीयूष दुबे की मेहनत की दाद देनी होगी।

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