उपवास और धार्मिक त्योहारों के दौरान भारतीय रसोईघरों में साबूदाना का उपयोग बहुत ही चाव से किया जाता है। अधिकांश लोग इसे किसी पेड़ का बीज या प्राकृतिक अनाज मानते हैं, लेकिन सच यह है कि साबूदाना खेतों में सीधे इस रूप में नहीं उगता। यह एक विशेष जड़ वाली फसल टैपिओका, जिसे कई देशों में कसावा भी कहा जाता है, से निकाला गया परिष्कृत स्टार्च है। इस साधारण सी दिखने वाली जड़ को खाने योग्य चमकदार मोतियों में बदलने के लिए एक लंबी और जटिल औद्योगिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। भारत में मांग का एक बड़ा हिस्सा तमिलनाडु के औद्योगिक केंद्रों में तैयार किया जाता है, जहाँ वैज्ञानिक और यांत्रिक तरीकों से इसे अंतिम रूप दिया जाता है।
कृषि से प्रसंस्करण: टैपिओका की खेती और विषैले छिलके की चुनौती
साबूदाना बनाने की प्राथमिक शुरुआत टैपिओका यानी कसावा की खेती से होती है। यह शकरकंद की प्रजाति से मिलती-जुलती एक जड़ वाली जंगली फसल है। इसकी बुआई की तकनीक गन्ने की तरह होती है, जिसमें कसावा के तने के छोटे-छोटे टुकड़ों को मिट्टी के अंदर दबा दिया जाता है। जमीन के भीतर इसकी जड़ों को विकसित होने में 9 से 11 महीने या लगभग 10 से 11 महीने का समय लगता है। जब फसल पूरी तरह तैयार हो जाती है, तो किसानों द्वारा जड़ों को खोदकर बाहर निकाला जाता है।
भारत में साबूदाना उत्पादन का ढांचा बहुत केंद्रित है। देश का लगभग 99 प्रतिशत साबूदाना अकेले तमिलनाडु राज्य में तैयार किया जाता है। तमिलनाडु के सेलम जिले और उसके आसपास के क्षेत्रों में कसावा की प्रोसेसिंग करने वाली सैकड़ों औद्योगिक इकाइयाँ स्थापित हैं। कसावा की ताजी कटी जड़ों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इनका बाहरी छिलका विषैला होता है। इसी कारण खेत से कटाई के बाद बिना किसी देरी के इन्हें तुरंत प्रोसेसिंग इकाइयों तक पहुँचाना अनिवार्य होता है, ताकि फसल खराब न हो और विषैले तत्व गूदे में न फैलें।
फैक्ट्री में धुलाई, छिलाई और क्रशिंग की बहु-स्तरीय प्रक्रिया
फैक्ट्री में कसावा की जड़ों के पहुँचते ही प्राथमिक सफाई प्रक्रिया शुरू की जाती है। जड़ों को मैकेनिकल बेल्ट के माध्यम से स्क्रबर मशीन में भेजा जाता है। स्क्रबर में पानी के तेज दबाव और घर्षण की मदद से जड़ों पर लगी मिट्टी, धूल और बाहरी गंदगियों को पूरी तरह साफ कर दिया जाता है। इसके बाद कन्वेयर बेल्ट इन जड़ों को स्वचालित कटिंग और पीलिंग मशीनों तक ले जाती है।
पीलिंग मशीन जड़ों के विषैले छिलके को सटीकता से उतार देती है। छिलका हटने के बाद जड़ों को मशीनों के जरिए छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है और एक बार फिर से पानी से अच्छी तरह धोया जाता है। सफाई के इस कड़े चरण के बाद अगला कदम क्रशिंग यानी पेराई का होता है। भारी क्रशिंग मशीनों में कसावा के टुकड़ों को पीसकर एक घना गूदा तैयार किया जाता है। इस गूदे से निकलने वाले तरल पदार्थ, जिसे कसावा मिल्क कहा जाता है, को कई विशेष फिल्टरों से गुजारा जाता है ताकि उसमें मौजूद रेशे यानी फाइबर अलग हो सकें। अलग किए गए फाइबर को कन्वेयर बेल्ट की मदद से हटाकर अलग एकत्रित किया जाता है।
कसावा मिल्क से स्टार्च केक और फर्मेंटेशन तकनीक
फाइबर हटने के बाद प्राप्त कसावा मिल्क में मुख्य रूप से पानी और शुद्ध स्टार्च का मिश्रण होता है। फाइबर अवशेषों में मौजूद पानी को हटाने के लिए विशेष ब्रश प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इसके बाद स्टार्च को पानी से अलग करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया शुरू होती है। यह प्रक्रिया काफी हद तक दूध से दही जमाने या फर्मेंटेशन की तकनीक से मिलती-जुलती है।
कसावा मिल्क को बड़े-बड़े औद्योगिक टैंकों में रखा जाता है। फर्मेंटेशन प्रक्रिया के दौरान स्टार्च भारी होकर टैंक के तले में बैठने लगता है और पानी ऊपर तैरने लगता है। पानी को अलग निकालकर बह जाने दिया जाता है, जबकि तले में जमा स्टार्च एक ठोस केक की तरह बन जाता है। इस स्टार्च केक को निकालकर दोबारा फिल्टर किया जाता है। इसमें फिर से साफ पानी मिलाकर मिश्रण को पतला किया जाता है और सूक्ष्म फिल्टरों से पास कराया जाता है, जिससे यह एकदम मुलायम और बारीक पाउडर के रूप में बदल जाता है।
1 एमएम से 7 एमएम के मोतियों का निर्माण, रोस्टिंग और पॉलिशिंग
तैयार बारीक स्टार्च पाउडर को साबूदाना बनाने वाली विशेष स्वचालित मशीनों में डाला जाता है। इन मशीनों में स्टार्च पाउडर को एक तय तापमान पर रोस्ट यानी भुना जाता है। इसी दौरान यांत्रिक दबाव से 1 एमएम से लेकर 7 एमएम व्यास के गोल-गोल मोतियों जैसे दाने आकार लेते हैं। साबूदाने के दानों के बन जाने के बाद उन्हें दोबारा हल्की आँच पर भुना जाता है ताकि अंदर की नमी पूरी तरह खत्म हो जाए और दानों का गोल आकार स्थिर बना रहे।
इसके बाद साबूदाने के दानों को बड़े-बड़े शेड या खुली धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह नमी मुक्त होने के बाद दानों को पॉलिशिंग मशीन में भेजा जाता है। पॉलिशिंग की यह प्रक्रिया साबूदाने को वह ट्रेडमार्क सफेद चमक देती है जो बाजारों में ग्राहकों को आकर्षित करती है। यदि साबूदाने में अच्छी चमक न हो, तो उसे बाजार में उचित दाम नहीं मिलते। पॉलिशिंग के बाद मशीनों द्वारा स्वचालित तरीके से विभिन्न वजन के पैकेटों में पैकिंग की जाती है और इसे देश भर के बाजारों में बिक्री के लिए भेजा जाता है।
पोषक तत्व, पारंपरिक बनाम आधुनिक तकनीक और एफएसएसएआई की चेतावनी
पोषण के नजरिए से देखा जाए तो साबूदाना कार्बोहाइड्रेट का एक समृद्ध स्रोत है। इसमें मौजूद स्टार्च की उच्च मात्रा हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती के लिए फायदेमंद मानी जाती है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो नियमित रूप से व्यायाम या शारीरिक श्रम करते हैं। इसके अलावा इसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट भी पाए जाते हैं जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं।
पुराने समय में साबूदाना बनाने के लिए कसावा मिल्क को कई दिनों तक खुले गड्ढों में सड़ाया जाता था, जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से असुरक्षित माना जाता था। हालांकि, आधुनिक युग में उन्नत मशीनों, बंद फिल्टर प्रणालियों और हाइजीनिक सुखाने वाले शेडों के आने से यह प्रक्रिया पूरी तरह स्वच्छ और वैज्ञानिक हो चुकी है। फिर भी, विशेषज्ञों का सुझाव है कि खुले या बिना ब्रांड वाले साबूदाने की खरीद से बचना चाहिए। सुरक्षा और शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए हमेशा भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई पंजीकृत ब्रांडों का साबूदाना ही खरीदना चाहिए।



















