झारखंड के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर की धार्मिक महत्ता जितनी गहरी है, उतनी ही समृद्ध यहां की स्थानीय खानपान की परंपरा भी है। मंदिर नगरी में कदम रखते ही श्रद्धालुओं को भक्ति के साथ-साथ पारंपरिक व्यंजनों की सोंधी खुशबू अपनी ओर खींचती है। देवघर की गलियों में मिलने वाले देसी नाश्ते और पारंपरिक मिठाइयों का स्वाद पीढ़ियों से यात्रियों और स्थानीय निवासियों के दिल में बसा हुआ है। यहां की यात्रा पर आने वाले किसी भी श्रद्धालु का सफर तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक कि वह इन खास स्थानीय पकवानों का लुत्फ न उठा ले।
सुबह की पौष्टिक शुरुआत: ताजा दही-चूड़ा और सब्जी
देवघर में अधिकांश लोगों के दिन की शुरुआत पारंपरिक दही-चूड़ा और ताजा बनी सब्जी के साथ होती है। चाहे आम गृहस्थी हो या काम पर निकलने वाले कामकाजी लोग, हर कोई सुबह इस सादे और स्वादिष्ट नाश्ते को पहली पसंद मानता है। स्थानीय निवासियों के मुताबिक यह आहार न केवल पेट को देर तक भरा रखता है, बल्कि पचने में आसान और शरीर को अंदर से ठंडक देने वाला भी होता है। दफ्तर जाने की जल्दी हो या बाहर किसी काम से निकलना हो, लोग इसे खाकर ही अपने सफर पर निकलते हैं। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी मंदिर जाने से पहले ऊर्जा पाने का यह एक बेहतरीन देसी विकल्प बनता है।
मंदिर परिसर के बाहर की चटपटी मिलोनी या घुगनी-मुढ़ी
बाबा बैद्यनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना संपन्न करने के बाद अगर तीखा और चटपटा खाने की तलब हो, तो यहां की गलियों में घुगनी-मुढ़ी की तलाश शुरू हो जाती है। स्थानीय लोग इस पारंपरिक मेल को बड़े प्यार से मिलोनी कहकर पुकारते हैं। मंदिर के इर्द-गिर्द दोने और पत्तों की प्लेट में परोसा जाने वाला यह देसी स्नैक हर उम्र के लोगों को लुभाता है। इस मिलोनी में कुरकुरी मुढ़ी, चूड़ा, मसालेदार चना की सब्जी, खस्ता समोसा और तले हुए पकौड़े एक साथ मिलाए जाते हैं। परोसने से ठीक पहले इसके ऊपर छिड़का गया तीखा नमक-मिर्च और भुजिया इसके स्वाद को और भी लाजवाब बना देता है।
श्रद्धा और पहचान का प्रतीक: बाबा धाम का प्रसिद्ध पेड़ा
देवघर का नाम आते ही पूजा, मंदिर और प्रसाद के साथ-साथ यहां के विश्वविख्यात पेड़े की छवि अपने आप उभर आती है। देवघर में पेड़ा केवल एक मिठाई भर नहीं है, बल्कि इस पावन धाम में आने वाले हर श्रद्धालु की आध्यात्मिक यात्रा का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। मंदिर के चारों ओर फैली संकरी गलियों में पेड़ों से सजी अनगिनत दुकानें नजर आती हैं। पूजा खत्म होने के बाद श्रद्धालु इन दुकानों पर भीड़ लगाकर ताजा पेड़ा खरीदते हैं। कई लोग वहीं खड़े होकर इसका आनंद लेते हैं, जबकि अधिकांश भक्त अपने परिजनों और मित्रों में बांटने के लिए इसे डिब्बों में पैक कराकर अपने घर ले जाते हैं।
रसगुल्ला और मलाईदार केसर दही का अनूठा संगम
मंदिर की गलियों में पारंपरिक रसगुल्ले और केसरिया दही का मेल भी बहुत लोकप्रिय है। मीठे रस से भरे रसगुल्लों के साथ ठंडे और गाढ़े मलाईदार केसर दही का संगम एक बेहद अनूठा स्वाद तैयार करता है। यहां मिलने वाले सफेद और पीले दोनों ही किस्म के रसगुल्लों को लोग बहुत चाव से खाते हैं। मंदिर परिसर से बाहर निकलने वाले श्रद्धालु अक्सर इस ठंडे और मीठे स्वाद से अपनी थकान मिटाते हैं। स्थानीय मिठास को करीब से महसूस करने के लिए यह देसी मेल हर आगंतुक को आकर्षित करता है।
खोवा और घी से सजा पारंपरिक मनभोग
देवघर के खास मिष्ठानों में मनभोग का स्थान बेहद विशिष्ट माना जाता है। इस मिठाई को शुद्ध घी, दूध, खोवा, आटा और सुगंधित इलायची के सटीक अनुपात से विशेष विधि द्वारा पकाया जाता है। मिठाई तैयार होने के बाद इसके ऊपर काजू, बादाम और अन्य सूखे मेवों की कतरन डाली जाती है, जो इसके स्वाद और बनावट को कई गुना बढ़ा देती है। मंदिर मार्ग के आसपास की कुछ चुनिंदा पुरानी दुकानों में ही पारंपरिक मनभोग अपनी असली पहचान के साथ उपलब्ध होता है।
वजन के हिसाब से मिलने वाला गर्मागर्म पराठा
दर्शनार्थियों के बीच देवघर की मशहूर पराठा गली भी काफी चर्चा में रहती है। मंदिर के निकट स्थित यह पूरी गली केवल तरह-तरह के पराठों के लिए जानी जाती है। इस बाजार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां पराठे गिनती के बजाय तराजू पर तौलकर, यानी वजन के हिसाब से बेचे जाते हैं। कई अलग-अलग भरावन और स्वादों में मिलने वाले इन पराठों को खाने के लिए दर्शन के बाद श्रद्धालु सीधे इस गली का रुख करते हैं। दिन हो या देर रात, यहां तवे से सीधे प्लेट में उतरने वाले गर्मागर्म पराठों का स्वाद हर किसी की भूख मिटा देता है।
लोहे की कड़ाही और शुद्ध घी में पकने वाला मटन अट्ठे
शाकाहारी व्यंजनों और मिठाइयों के अलावा, देवघर का पारंपरिक मांसाहारी स्वाद भी अपनी अलग पहचान रखता है, जिसमें सबसे प्रमुख नाम मटन अट्ठे का है। मांसाहारी भोजन के शौकीनों के लिए यह डिश अपने अनोखे पकाने के तरीके के कारण बेहद खास मानी जाती है। मटन अट्ठे को पकाते समय पानी की एक भी बूंद का इस्तेमाल नहीं किया जाता, बल्कि इसे केवल शुद्ध घी और चुनिंदा मसालों के साथ धीमी आंच पर तैयार किया जाता है। इसे पारंपरिक रूप से लोहे की कड़ाही में भूनकर पकाया जाता है, जिससे इसकी महक और गाढ़ा सोंधा स्वाद बेहद विशिष्ट हो जाता है। जो भी लोग मांसाहार लेते हैं, वे देवघर प्रवास के दौरान इस पारंपरिक व्यंजन को अवश्य चखते हैं।


















