बिहार की राजधानी के व्यस्त चौराहे पर शाम ढलते ही एक ठेले के आसपास अजीबोगरीब आवाजें गूंजने लगती हैं, जहां लोग गिनती वाले नंबर बोलकर अपनी प्लेट मांगते हैं। काउंटर पर खड़ा खरीदार दो या तीन पीस मांगने की जगह सिर्फ 225 अथवा 325 कहता है और कड़ाही में मक्खन की छनछनाहट तेज हो जाती है। यह कोई रहस्यमयी सांकेतिक भाषा नहीं, बल्कि खानपान के शौकीनों के बीच अपनी खुराक तय करने का बेहद सीधा हिसाब-किताब है।
मक्खन और गिनती का सीधा हिसाब
इस अनूठी तरकीब की शुरुआत प्लेट में मक्खन की मात्रा तय करने के लिए हुई थी। दुकान के संचालक भोला कुमार के मुताबिक, अंक 225 का सीधा अर्थ दो पीस लिट्टी के साथ 25 ग्राम मक्खन का मेल है। इसी तर्ज पर जब कोई खरीदार 325 पुकारता है, तो उसका आशय तीन पीस लिट्टी को 25 ग्राम मक्खन में तलवाना होता है।
अपनी खुराक और स्वाद के शौकीन लोग इस व्यवस्था में अपनी पसंद के अनुसार बदलाव भी करवा सकते हैं। कड़ाही में 50 ग्राम मक्खन के अलावा कई नियमित खरीदार 100, 150 अथवा 200 ग्राम तक ताजा मक्खन डलवाकर अपनी लिट्टी छनवाते हैं। दशकों से चले आ रहे इस सिलसिले के चलते पुराने खरीदारों को पर्ची या लंबी बात कहे बिना चंद पलों में मनचाही प्लेट मिल जाती है।
पानी नहीं, दूध से गूंथा जाता है आटा
स्वाद के शौकीनों को खींचने वाली असली वजह सिर्फ तलने का ढंग नहीं, बल्कि तैयारी की बुनियाद में छिपा बदलाव है। आम तौर पर घरों और दुकानों में आटा पानी की मदद से तैयार होता है, परंतु इस भट्ठी पर कारीगर बाल्टी भर दूध उड़ेलते हैं। एक ही फेरे में करीब 30 से 35 किलो आटा परात में डाला जाता है, जिसे बांधने के लिए लगभग 20 किलो दूध लगता है।
इस भारी लागत और अलग तरीके पर जब काम करने वाले कारीगर से बात की गई, तो उनका कहना था, "इससे खाने में अच्छा लगता है।" दूध की इसी नमी के चलते आग पर पकने के बाद भी लिट्टी अंदर से बेहद खस्ता और मुलायम बनी रहती है, जो मक्खन में जाते ही स्वाद को दोगुना कर देती है।
चोखे में हाजमोला और मसालों की जुगलबंदी
थाली में सोंधी खुशबू के साथ जब तक तीखा चोखा न सजे, तब तक बिहारी खानपान का रंग अधूरा माना जाता है। यहां चोखा बनाने की विधि भी आम हलवाइयों से काफी भिन्न रखी गई है। कड़ाही में पहले बैंगन तथा लाल टमाटर को उबाला जाता है, फिर उसमें उबले आलू का भुरता मिलाया जाता है।
सब्जियों के इस मिश्रण में जीरा, गोलकी, तवे पर भुनी लाल मिर्च, कुचला हुआ लहसुन और हरी धनिया पत्ती डाली जाती है। स्वाद को एक अनोखा चटखारा देने के लिए कारीगर इसमें हाजमोला पाउडर का छिड़काव करते हैं, जो पाचन के साथ जीभ को अलग स्वाद देता है। एक बार की बड़ी कड़ाही में तकरीबन 40 किलो उबले आलू, 20 किलो बैंगन एवं 15 किलो टमाटर डालकर पूरा मसाला तैयार किया जाता है। अंत में कच्चा सरसों तेल डालकर इस पूरे मिश्रण को हाथ से मसला जाता है।
चार दशक का सफर और ठिकाना
ठेले के तवे पर पकती इस थाली के पीछे 45 बरस का लंबा इतिहास दर्ज है। सन् 1981 के दौर में गोपी कृष्णा जी ने इस जायके की नींव रखी थी, जिसे आज उनके नाम पर गोपी कृष्णा लिट्टी भंडार कहा जाता है। वर्तमान समय में वे अपने पुत्र भोला के संग मिलकर इस चूल्हे की कमान संभालते हैं। कई बुजुर्ग खरीदार आज भी यहां पहुंचते हैं, जो अपने बचपन के दिनों से इस स्वाद के मुरीद रहे हैं।
दूधिया आटे और मक्खन में डूबी इस पारंपरिक डिश का आनंद लेने के लिए पटना में जीपीओ गोलंबर का रुख करना पड़ता है। मल्टीमॉडल हब के पास बने भूमिगत रास्ते के मुहाने पर, कबाड़ी बाजार वाले पीपल वृक्ष के नीचे यह दुकान सजती है। शाम 4:30 बजे से लेकर रात 10:30 बजे तक चूल्हा जलता है, जहां शाम के वक्त खाने वालों का तांता लगा रहता है।



















