संगम नगरी प्रयागराज के ऐतिहासिक चौक क्षेत्र में कदम रखते ही देसी घी और चाशनी की भीनी-भीनी महक बरबस ही राहगीरों को अपनी ओर खींच लेती है। इस इलाके में स्वाद की कई पुरानी विरासतें मौजूद हैं, लेकिन भगवानदास मिठाई वाले की पहचान बेहद अलग और खास है। सन् 1834 में शुरू हुआ यह पारंपरिक प्रतिष्ठान लगभग दो सदियों का सफर पूरा करते हुए आज भी उसी शिद्दत और गुणवत्ता के साथ ग्राहकों की सेवा में जुटा हुआ है। परिवार की पांचवीं पीढ़ी वर्तमान में इस पूरे कारोबार की बागडोर संभाल रही है। यहां बनने वाले महीन दाने के मोतीचूर के लड्डू इतने मशहूर हैं कि उन्हें चखने के लिए शहर के पुराने बाशिंदों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले नए शौकीन भी नियमित रूप से पहुंचते हैं।
महाजनी टोला से लेकर चौक तक का सफर
दुकान का संचालन कर रहे अजीत गुप्ता अपने पारिवारिक इतिहास के पन्नों को पलटते हुए बताते हैं कि इस मीठे सफर की नींव उनके पिता के नाना ने वर्ष 1834 में रखी थी। शुरुआत में यह प्रतिष्ठान महाजनी टोला की तंग गली में एक छोटी सी जगह पर खोला गया था। समय बीतने के साथ कारोबार का दायरा बढ़ा और दुकान महाजनी टोला से स्थानांतरित होकर जीरो रोड पहुंची। इसके बाद मीरापुर में भी इसका संचालन हुआ और अंततः यह चौक इलाके में स्थायी रूप से स्थापित हो गई। हालांकि वक्त की जरूरतों के हिसाब से दुकान का ठिकाना कई बार बदला, लेकिन परिवार ने कभी भी अपनी पारंपरिक कारीगरी और मिठाई बनाने के मूल संस्कारों से समझौता नहीं किया।
प्लेट में रखते ही बिखर जाते हैं मोतीचूर के दाने
इस दुकान के मोतीचूर के लड्डुओं की शोहरत के पीछे एक अनूठी पाक-कला छिपी है। अजीत गुप्ता के अनुसार, भगवानदास अपने दौर के बेहद सिद्धहस्त और सम्मानित हलवाई थे। समूचा हलवाई समाज उन्हें एक उस्ताद और गुरु के रूप में देखता था। लड्डुओं को बेहद बारीक और महीन दानों में ढालने की अनूठी तकनीक ईजाद करने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। पुराने जमाने में जब लड्डू तैयार किए जाते थे, तब दानों को चाशनी में भिगोने के बाद उनमें चीनी जमकर सख्त हो जाती थी, जिससे लड्डू काफी ठोस बन जाता था। भगवानदास ने इस समस्या का समाधान ढूंढते हुए एक सर्वथा नया तरीका खोज निकाला। इस खास विधि का कमाल यह है कि जब आप लड्डू को प्लेट में रखते हैं, तो उसके बारीक दाने अलग-अलग बिखर जाते हैं। इसी अद्वितीय बनावट और कोमलता ने इस मोतीचूर के लड्डू को पूरे इलाके में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
सैकड़ों किस्मों का खजाना और देसी घी की मिठास
दुकान के काउंटर पर मिठाइयों की अनगिनत किस्में सजी नजर आती हैं। संचालक अजीत गुप्ता का कहना है कि उनकी दुकान में उपलब्ध मिठाइयों की सटीक गिनती बताना भी मुश्किल है, क्योंकि ग्राहकों की मांग और पसंद के आधार पर 400 से लेकर 500 तरह की मिठाइयां तैयार कर पेश की जा सकती हैं। देसी घी से तैयार होने वाले पारंपरिक पकवानों के साथ-साथ मोतीचूर के लड्डू की मांग साल भर सबसे ज्यादा बनी रहती है। कारोबार के इतिहास में एक दिलचस्प मोड़ तब आया था जब अजीत गुप्ता के पिता को सुदूर ऑस्ट्रेलिया में भारतीय मिठाई की दुकान स्थापित करने का सीधा प्रस्ताव दिया गया था। हालांकि, पारिवारिक सदस्यों की असहमति और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने के फैसले के चलते उन्होंने विदेश जाने से इनकार कर दिया और प्रयागराज में ही पुश्तैनी काम को नई ऊंचाइयों पर ले जाना उचित समझा।
पीढ़ियों से जुड़े ग्राहकों की जुबानी स्वाद की दास्तान
प्रतिष्ठान पर पहुंचने वाले ग्राहकों का जुड़ाव भी कई दशकों पुराना है। यहां नियमित आने वाले ग्राहक दीपक बताते हैं कि वे लगभग एक साल से इस दुकान पर आ रहे हैं। उन्हें यहां देसी घी में तैयार मिठाइयां बेहद पसंद आती हैं, जिनमें मोतीचूर का लड्डू और सोहन पापड़ी उनकी पहली पसंद हैं। वहीं चित्रकूट से आए एक अन्य ग्राहक का कहना है कि वे बीते करीब 28 वर्षों से इस दुकान के मुरीद हैं। चौक बाजार में खान-पान की कई नामी दुकानें होने के बावजूद वे मेवा बाटी, काजू कतली, रसमलाई और मोतीचूर के लड्डू लेने सीधे यहीं आते हैं। लोकनाथ इलाके के निवासी रियासत ने अपनी यादें साझा करते हुए बताया कि वे 14 साल की उम्र से यहां की मिठाइयां खा रहे हैं। उनकी सबसे पसंदीदा मिठाई चमचम है, जबकि वे मगज, खजूर के लड्डू और मोतीचूर का स्वाद भी अक्सर लेते हैं। लगभग 192 वर्षों के इस लंबे सफर में पीढ़ियां बदल गईं, पते बदले और मिठाइयों की फेहरिस्त भी विस्तृत हो गई, मगर महीन दाने वाले मोतीचूर के लड्डू की मूल मिठास आज भी जस की तस बरकरार है।


















