फिटनेस की दुनिया में वार्मअप और स्ट्रेचिंग से जुड़े नियम समय-समय पर बदलते रहे हैं। एक दौर था जब वर्कआउट शुरू करने से पहले स्ट्रेचिंग करना हर किसी के लिए अनिवार्य माना जाता था। इसके बाद सोशल मीडिया और फिटनेस ट्रेंड्स का रुख बदला, जहां यह दावा किया जाने लगा कि वर्कआउट से पहले स्ट्रेचिंग करने से मांसपेशियों की ताकत कम हो जाती है और वर्कआउट का असर खत्म हो जाता है। हालांकि, ये दोनों ही धारणाएं पूरी तरह सच नहीं हैं। कसरत से पहले स्ट्रेचिंग करने के अपने फायदे भी हैं और कुछ सीमाएं भी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की स्ट्रेचिंग कर रहे हैं और आपकी वर्कआउट योजना क्या है।
स्ट्रेचिंग से मिलने वाली अस्थायी गतिशीलता और उसका सही इस्तेमाल
वर्कआउट से ठीक पहले स्ट्रेचिंग करने का सबसे बड़ा मकसद शरीर के किसी खास हिस्से को उस दिन की कसरत के लिए तैयार करना होता है। जिम में कई लोगों को गहरे स्क्वाट लगाने में परेशानी होती है। इसकी मुख्य वजह अक्सर टखनों (एंकल) की सीमित गतिशीलता (मोबिलिटी) होती है। जब पैरों के पंजे जमीन पर सपाट टिके होते हैं, तो टखने सही तरीके से मुड़ नहीं पाते। ऐसी स्थिति में अगर वर्कआउट शुरू करने से पहले काफ मसल्स और एकिलिस टेंडन की लक्षित स्ट्रेचिंग की जाए, तो टखनों का लचीलापन तुरंत बढ़ जाता है।
स्ट्रेचिंग करने से जोड़ों और मांसपेशियों की रेंज ऑफ मोशन (गति सीमा) में तुरंत सुधार आता है। इसे एक साधारण उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप बिना वार्मअप के 10 बार लगातार झुककर अपने पैरों के अंगूठे छूने की कोशिश करें, तो पहली बार में आपके हाथ ज्यादा नीचे नहीं पहुंचेंगे। लेकिन 10वीं बार तक आपकी पहुंच काफी नीचे तक हो जाएगी। हालांकि, स्ट्रेचिंग से मिलने वाला यह लचीलापन अस्थायी होता है और कुछ घंटों बाद मांसपेशियां दोबारा अपनी सामान्य स्थिति में आ जाती हैं।
इसी वजह से वर्कआउट से ठीक पहले लक्षित स्ट्रेचिंग करना बहुत कारगर साबित होता है। इस अल्पकालिक लचीलेपन का फायदा उठाकर आप बेहतर फॉर्म के साथ स्क्वाट या अन्य कसरतें कर सकते हैं। जब टखने ज्यादा मुड़ पाते हैं, तो लेग्स का वर्कआउट ज्यादा प्रभावी होता है। इसके अलावा, लंबे समय के लिए शरीर का लचीलापन बढ़ाने के उद्देश्य से वर्कआउट के अंत में या किसी अलग समय पर फुल-बॉडी स्ट्रेचिंग सेशन करना ज्यादा बेहतर रहता है।
क्या वर्कआउट से ठीक पहले स्ट्रेचिंग करने से ताकत कम होती है?
हालांकि वर्कआउट से पहले स्ट्रेचिंग के फायदे हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से की गई स्ट्रेचिंग नुकसान भी पहुंचा सकती है। मान लीजिए आप भारी वजन के साथ स्क्वाट लगाने की योजना बना रहे हैं। ऐसे में टखनों को स्ट्रेच करना तो फायदेमंद है, लेकिन जांघ के आगे के हिस्से यानी क्वैड्स की गहरी स्ट्रेचिंग करना सही नहीं होगा। स्क्वाट करते समय मुख्य रूप से क्वैड्स को ही सबसे ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है।
खेल विज्ञान के अध्ययन बताते हैं कि अगर किसी मांसपेशी की वर्कआउट से ठीक पहले बहुत गहरी और लंबे समय तक स्टैटिक स्ट्रेचिंग की जाए, तो उसकी तात्कालिक ताकत (पावर आउटपुट) में थोड़ी कमी आ जाती है। यदि आप भारी लिफ्टिंग से तुरंत पहले उन मुख्य मांसपेशियों को गहराई से स्ट्रेच करते हैं जिनसे वजन उठाना है, तो आप महसूस करेंगे कि आप उतना वजन नहीं उठा पा रहे हैं जितना सामान्य दिनों में उठाते हैं।
हालांकि, इस बात को लेकर ज्यादा घबराने की जरूरत नहीं है। पहली बात यह है कि ज्यादातर लोग कसरत से ठीक पहले बहुत अधिक समय तक गहरी स्ट्रेचिंग नहीं करते। दूसरी बात यह है कि ताकत में आने वाली यह कमी बहुत मामूली होती है। यदि आप गलती से स्क्वाट से पहले क्वैड्स को थोड़ा स्ट्रेच कर भी लेते हैं, तो भी इससे आपके पूरे वर्कआउट का फायदा खत्म नहीं होता। सबसे सही तरीका यह है कि वर्कआउट से पहले सिर्फ उन्हीं जोड़ों को स्ट्रेच करें जिनकी गतिशीलता बढ़ाना जरूरी हो, और पूरे शरीर की गहरी स्ट्रेचिंग को वर्कआउट खत्म होने के बाद के लिए बचाकर रखें।
इंजरी रोकने का भ्रम: क्या स्ट्रेचिंग वाकई चोटों से बचाती है?
फिटनेस जगत में एक पुराना भ्रम यह फैला हुआ है कि वर्कआउट से पहले स्ट्रेचिंग करने से इंजरी (चोट) लगने का खतरा कम हो जाता है। विभिन्न स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि केवल प्री-वर्कआउट स्ट्रेचिंग करने से चोटों से बचाव का कोई सीधा संबंध नहीं है।
यदि आप जिम में अपना कीमती समय केवल इसलिए स्ट्रेचिंग में बिता रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि यह आपको चोट से सुरक्षित रखेगा, तो आप अपनी रणनीति बदल सकते हैं। जिम में सभी के पास समय सीमित होता है। इसलिए पूरे शरीर को बेवजह खिंचाव देने के बजाय केवल 2 से 3 मिनट उन विशिष्ट एक्सरसाइज के लिए शरीर को तैयार करने में लगाएं, और फिर अपने मुख्य ट्रेनिंग रूटीन पर ध्यान केंद्रित करें।
मस्कुलर वार्मअप के लिए स्टैटिक नहीं, डायनामिक मूवमेंट क्यों है बेहतर?
केवल एक जगह स्थिर होकर खिंचाव बनाने (स्टैटिक स्ट्रेचिंग) से मांसपेशियां और जोड़ पूरी तरह गर्म नहीं होते। स्ट्रेचिंग पोजिशन में जाने के लिए जब आप शरीर को हिलाते-डुलते हैं, तो उससे थोड़ा वार्मअप जरूर होता है, लेकिन मांसपेशियों का तापमान बढ़ाने और जोड़ों को सुचारू बनाने का यह सबसे बेहतर तरीका नहीं है।
शरीर को वर्कआउट के लिए तैयार करने का सबसे प्रभावी जरिया डायनामिक स्ट्रेचिंग यानी गतिमान वार्मअप है। डायनामिक मूवमेंट में शरीर लगातार गति में रहता है। उदाहरण के लिए, घुटनों को ऊपर उठाकर दौड़ना (हाई नीज) या पीछे हिप्स पर पैर मारते हुए जॉगिंग करना (बट किक्स) बेहतरीन डायनामिक एक्सरसाइज हैं। साधारण हल्की जॉगिंग या शरीर को एक्टिव करने वाले आसान मूवमेंट भी मांसपेशियों का तापमान बढ़ाने में उतने ही मददगार होते हैं। इसके अलावा सूर्य नमस्कार जैसे योग फ्लो भी पूरे शरीर की मांसपेशियों और जोड़ों को एक साथ वार्मअप करने का एक शानदार जरिया हैं।
अपने वर्कआउट के हिसाब से कैसे तैयार करें सही वार्मअप प्लान?
हर वर्कआउट के लिए वार्मअप का तरीका अलग होना चाहिए। ओवरहेड प्रेस या शोल्डर वर्कआउट करने से पहले कंधों और ऊपरी पीठ की स्ट्रेचिंग करना फायदेमंद होता है। इसी तरह, स्क्वाट करने से पहले टखनों, काफ्स और हिप्स का लचीलापन बढ़ाना जरूरी होता है।
दूसरी ओर, अगर आपके वर्कआउट रूटीन में केवल बेंच प्रेस और बाइसेप कर्ल्स जैसी कसरतें शामिल हैं, तो आपको शुरुआत में किसी खास स्ट्रेचिंग की जरूरत शायद न पड़े। हालांकि, बेंच प्रेस में मजबूत पोजिशन बनाने और कंधों को स्थिर रखने के लिए पीठ की हल्की स्ट्रेचिंग मदद कर सकती है।
वर्कआउट-विशिष्ट तैयारी के लिए आप 5 से 10 सेकंड की हल्की स्टैटिक स्ट्रेचिंग कर सकते हैं, डायनामिक मूवमेंट चुन सकते हैं या फिर फोम रोलिंग का सहारा ले सकते हैं। अपने शरीर की जरूरतों को समझें और उसी हिसाब से अपना वार्मअप रूटीन तय करें।



















