नोएडा के सेक्टर 63 में रहने वाली आशू को पिछले महीने बुखार की समस्या का सामना करना पड़ा था। मौसम में फ्लू का प्रकोप होने के कारण उन्होंने तुरंत दवाएं शुरू कर दीं, लेकिन कुछ ही दिनों में उनकी दोनों बेटियों और पति को भी संक्रमण अपनी चपेट में ले लिया। इस तरह पूरा परिवार खांसी, जुकाम और बुखार से जूझने लगा। करीब आठ दिन बीतने के बाद आशू तो स्वस्थ हो गईं, लेकिन कुछ समय बाद ही उनकी बेटी को फिर से खांसी और बदन दर्द की शिकायत रहने लगी। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि इस मौसम में इस तरह की स्थिति कई घरों में देखने को मिल रही है।
जब घर का कोई सदस्य बुखार और सर्दी-जुकाम से उबर जाता है, तो अक्सर यह मान लिया जाता है कि खतरा टल गया है। हालांकि, क्या मरीज के ठीक होने के साथ ही बीमारी पूरी तरह घर से विदा हो जाती है? शायद इस बात पर कम ही लोग गौर करते हैं कि फ्लू के वायरस आपके तकिए, दरवाजों के हैंडल या फिर एसी और टीवी के रिमोट पर अब भी सक्रिय हो सकते हैं। जानकारी के मुताबिक, फ्लू फैलाने वाले ये विषाणु कुछ सतहों पर चौबीस घंटे तक जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। इसलिए केवल अपने शरीर का ध्यान रखना ही काफी नहीं है, बल्कि घर के चप्पे-चप्पे को संक्रमण मुक्त बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बाजार में आजकल तमाम ऐसे सैनिटाइज़र उपलब्ध हैं जो हाथों के साथ-साथ वस्तुओं को भी साफ करने का दावा करते हैं, लेकिन केवल सैनिटाइजेशन से काम नहीं चलता। सतहों को पूरी तरह रोगाणुमुक्त यानी डिसइन्फेक्ट करना आवश्यक हो जाता है। सैनिटाइजेशन और डिसइन्फेक्शन के बीच के फर्क को समझना जरूरी है। सैनिटाइज करने का मतलब केवल कीटाणुओं की तादाद को कम करना होता है, जबकि डिसइन्फेक्ट करने का मतलब उन्हें जड़ से खत्म करना है। यदि आप केवल गीले कपड़े से डाइनिंग टेबल या फर्नीचर पोंछते हैं, तो वह सैनिटाइज हुआ है। लेकिन कीटाणुओं का पूरी तरह सफाया करने के लिए ब्लीच, अल्कोहल आधारित उत्पादों या विशेष रोगाणुनाशक घोल का प्रयोग करना पड़ता है।
दैनिक साफ-सफाई आमतौर पर केवल धूल और गंदगी हटाती है, लेकिन वायरस को खत्म नहीं कर पाती। स्वास्थ्य से जुड़ी जानी-मानी वेबसाइट हेल्थलाइन के अनुसार, घर को सुरक्षित रखने के लिए सफाई, सैनिटाइजेशन और डिसइन्फेक्शन के तीनों चरणों को अपनाना चाहिए। घर में कुछ ऐसी जगहें होती हैं जिन्हें दिनभर में सबसे ज्यादा छुआ जाता है, जिन्हें हाई-टच सरफेस कहा जाता है। इनमें सबसे पहला स्थान दरवाजों और खिड़कियों के हैंडल का आता है, जिन्हें घर का हर सदस्य अनगिनत बार छूता है। इसके अलावा मोबाइल फोन और टीवी के रिमोट पर सबसे अधिक कीटाणु पाए जाते हैं। इन्हें साफ करने के लिए अल्कोहल वाइप्स का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बाथरूम के भीतर फ्लश का हैंडल, नल और टॉयलेट सीट पर भी रोगाणुओं का डेरा रहता है, जिन्हें नियमित रूप से साफ करना अनिवार्य है। इसके साथ ही रसोईघर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, क्योंकि यहीं से कीटाणु सीधे हमारे भोजन तक पहुंच सकते हैं। किचन स्लैब, चाकू के हट्टे और फ्रिज के हैंडल को हमेशा संक्रमण मुक्त रखना चाहिए।
फ्लू के दौर में मरीज अपना अधिकांश समय बिस्तर पर ही गुजारता है, इसलिए बिस्तर और चादरों की सफाई पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए। चादरों, तकिए के गिलाफ और कंबल को कम से कम साठ डिग्री सेल्सियस तापमान वाले गर्म पानी में धोएं, क्योंकि इस तापमान पर अधिकांश वायरस नष्ट हो जाते हैं। गद्दों और तकियों पर स्प्रे करने वाले रोगाणुनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। छिड़काव करने के बाद कुछ देर के लिए उन्हें छोड़ दें और फिर खुली हवा में सूखने दें।
संक्रमित व्यक्ति के कपड़ों को संभालते समय हाथों में दस्ताने जरूर पहनें और गंदे कपड़ों को बिल्कुल न झटकें, अन्यथा हवा में वायरस फैल सकते हैं। कपड़ों को सीधे वाशिंग मशीन में डालकर गर्म पानी से धोएं। बीमारी के दौरान लगातार छींकने के कारण हवा में भी कीटाणु तैरने लगते हैं, इसलिए इनडोर एयर क्वालिटी को बेहतर बनाना भी जरूरी है। इसके लिए दिन में कम से कम पंद्रह से बीस मिनट के लिए घर की खिड़कियां और दरवाजे खुले रखें ताकि ताजी हवा आ सके। इसके अलावा हवा को शुद्ध बनाए रखने के लिए एयर प्यूरीफायर का उपयोग भी काफी मददगार साबित हो सकता है।



















