रोजमर्रा की जिंदगी में भोजन बच जाना बेहद आम बात है और लोग अक्सर बचे हुए खाने को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए फ्रिज में रख देते हैं। इसके अलावा कई तरह के तैयार खाद्य पदार्थों को भी अधिक समय तक सुरक्षित रखने के लिए कूलिंग चैंबर या फ्रिज का सहारा लिया जाता है। हालांकि यह मान लेना पूरी तरह गलत है कि फ्रिज के भीतर रखा जाने वाला हर खाद्य पदार्थ हमेशा सुरक्षित बना रहता है। आयुर्वेदिक हेल्थ कोच डिंपल जांगड़ा ने ऐसे तीन मुख्य संकेतों के बारे में विस्तार से बताया है जिनकी मदद से कोई भी आसानी से यह जांच सकता है कि फ्रिज में रखा हुआ भोजन अब खाने योग्य बचा है या पूरी तरह खराब हो चुका है।
बनावट में चिपचिपाहट और लिसलिसा पन
भोजन के खराब होने की शुरुआत सबसे पहले उसके टेक्सचर या बनावट में बदलाव से होती है। यदि पकी हुई दाल, सब्जी, कटी हुई सब्जियों या फिर हरी पत्तेदार सब्जियों के ऊपर किसी भी प्रकार की चमकदार या चिपचिपी परत यानी लिसलिसा पन नजर आने लगे, तो इसे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस तरह की बनावट असल में बैक्टीरिया की सक्रियता और माइक्रोब्स के तेजी से पनपने का स्पष्ट प्रमाण होती है। जब सूक्ष्मजीव खाने में अपनी संख्या बढ़ाते हैं, तो वह भोजन दूषित होने लगता है। ऐसा भारी और सड़ा हुआ खाना खाने से पेट में सूजन, उल्टी और दस्त जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। यह पाचन तंत्र को सीधे तौर पर कमजोर करता है, इसलिए भोजन की सतह पर इस तरह का बदलाव दिखाई देते ही उसे तुरंत छोड़ देना समझदारी है।
फफूंद का दिखना और रंग में बदलाव आना
यदि किसी भी खाद्य पदार्थ, दाल या सब्जी में किसी भी तरह की फफूंद नजर आ जाए या उसका रंग बदल चुका हो, तो उस पूरे भोजन को बिना किसी संकोच के बाहर फेंक देना चाहिए। केवल ऊपर से फफूंद लगा हुआ हिस्सा काटकर बाकी का खाना इस्तेमाल करने की भूल बिल्कुल न करें। जो फफूंद इंसान को अपनी नंगी आंखों से दिखाई देती है, वह केवल उसका ऊपरी हिस्सा भर होती है। असल स्थिति यह होती है कि फफूंद नरम खाद्य पदार्थों के भीतर जड़ जैसे बेहद बारीक धागों को बहुत गहराई तक फैला चुकी होती है। इसके साथ ही यह माइकोटॉक्सिन और एफ्लाटॉक्सिन जैसे हानिकारक तत्व छोड़ती है जो दिखने वाले हिस्से से कई गुना ज्यादा क्षेत्र में फैल चुके होते हैं। इस तरह के जहरीले तत्व इंसानी शरीर के भीतर पहुंचने पर लिवर और किडनी को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
भोजन की महक और गंध में बदलाव
यदि फ्रिज में रखे हुए किसी भी डिब्बाबंद या पके हुए भोजन से खट्टी महक, सिरके जैसी तेज गंध, कड़वाहट या फिर उबले हुए अंडे जैसी अजीब सी बू आने लगे, तो इसका सीधा सा अर्थ यह है कि उसमें हानिकारक बैक्टीरिया अत्यंत तेजी से विकसित हो रहे हैं और लगातार ऑर्गेनिक एसिड छोड़ रहे हैं। यदि खाने की प्राकृतिक गंध में किसी भी प्रकार का बदलाव महसूस हो, तो उसे बिना सोचे-समझे कूड़ेदान में डाल देना चाहिए। किसी भी फूड पैकेट पर छपी हुई एक्सपायरी तारीख का लेबल देखने से कहीं अधिक सटीक और भरोसेमंद जानकारी आपकी अपनी नाक दे सकती है।
आयुर्वेद की दृष्टि से भोजन और भंडारण के नियम
आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार हमेशा ताजा और गरमागरम पका हुआ भोजन ग्रहण करना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि ऐसे भोजन में प्राण ऊर्जा सर्वाधिक मात्रा में पाई जाती है और शरीर उसे सबसे आसानी से पचा लेता है। यदि किन्हीं कारणों से पके हुए खाने को स्टोर करना ही पड़े, तो उसे बनाने के तुरंत बाद तेजी से ठंडा करना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में उसे दो से तीन दिनों से अधिक समय तक फ्रिज के भीतर नहीं रखना चाहिए। इसके अलावा, जब भी ऐसे संग्रहित भोजन को दोबारा काम में लेना हो, तो उसे परोसने से पहले अच्छी तरह और पूरी गहराई तक गर्म करना आवश्यक है ताकि छिपे हुए रोगाणु नष्ट हो सकें।



















