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हिमाचल के लाहौल-स्पीति में घेपन झील पर मंडराया खतरा, वैज्ञानिकों की टीम करेगी अध्ययन और लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टमहिमाचल प्रदेश
1 सित॰ 2026, 3:34 pm (1 दिन पहले)· 3

हिमाचल के लाहौल-स्पीति में घेपन झील पर मंडराया खतरा, वैज्ञानिकों की टीम करेगी अध्ययन और लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित घेपन ग्लेशियल झील का आकार तेजी से बढ़ने के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। नेपाल की घटना से सबक लेते हुए यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी की जा रही है और संभावित खतरे से निपटने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाएगा।

नेपाल के चीन अधिकृत तिब्बत क्षेत्र में पहाड़ियों के बीच ग्लेशियर फटने से आई भीषण बाढ़ के बाद भारी पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ था। इस बड़ी आपदा से सीख लेते हुए अब हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। समुद्र तल से चार हजार सत्तर मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियल झील की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा रही है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान इस झील के कुल आकार में एक सौ तिहत्तर प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। संभावित खतरे के मद्देनजर प्रशासनिक स्तर पर एहतियाती कदम उठाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके।

सी-डैक के सहयोग से स्थापित होगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

बढ़ते खतरे को भांपते हुए जिला प्रशासन ने इस संवेदनशील जलस्त्रोत के समीप अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का निर्णय लिया है। लाहौल-स्पीति की उपायुक्त किरण भड़ाना ने जानकारी दी है कि घेपन ग्लेशियल झील के जलस्तर समेत अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी मानकों की लगातार निगरानी की जा रही है। इस पूरी प्रक्रिया को आधुनिक तकनीक से लैस करने के लिए तिरुवनंतपुरम स्थित सी-डैक के माध्यम से यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। प्रशासन की योजना इस उन्नत निगरानी प्रणाली को आगामी सितंबर महीने के भीतर ही स्थापित कर देने की है।

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सिस्सू झील पर हो चुका है सफल तकनीकी परीक्षण

प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक सी-डैक की तकनीकी टीम द्वारा सिस्सू झील पर इसी तरह के अर्ली वार्निंग सिस्टम का परीक्षण पहले ही सफलतापूर्व पूरा किया जा चुका है। इस परीक्षण के दौरान झील से जुड़े तमाम जरूरी आंकड़े और सूचनाएं बेहद सटीकता के साथ प्राप्त हुई थीं। इसी सफल प्रयोग के आधार पर अब घेपन झील पर भी उसी तकनीक का उपयोग करते हुए निगरानी ढांचा तैयार करने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है। हालांकि इस पूरी प्रणाली को जमीन पर उतारने से पहले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की तरफ से अंतिम स्वीकृति आदेश मिलने का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद कार्य में और तेजी आएगी।

वैज्ञानिकों की विशेष टीम करेगी चौदह दिनों का विस्तृत अध्ययन

घेपन ग्लेशियल झील से जुड़े तमाम संभावित खतरों का बारीकी से आकलन करने के उद्देश्य से भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेष विशेषज्ञों का एक दल आगामी एक सितंबर, दो026 को इस क्षेत्र का दौरा करेगा। यह विशेषज्ञ टीम करीब चौदह दिनों तक दुर्गम इलाके में रहकर झील और उसके आसपास के भूभाग का व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण करेगी। इस दौरान टीम की ओर से झील क्षेत्र की मैपिंग करने के साथ-साथ हिमस्खलन और भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील इलाकों की सीमा तय की जाएगी। इसके अलावा झील की गहराई, पानी के बहाव की गति और मौसम से जुड़े विभिन्न आंकड़ों का भी गहन विश्लेषण किया जाएगा।

राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सौंपी जाएगी विस्तृत रिपोर्ट

वैज्ञानिकों के इस दल द्वारा किए जाने वाले अध्ययन के आधार पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाएगी, जिसे बाद में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को सौंप दिया जाएगा। उपायुक्त किरण भड़ाना ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला प्रशासन की ओर से स्वयं जमीनी हकीकत का जायजा लेने के लिए सितंबर महीने में अधिकारियों की एक अन्य टीम को भी मौके पर भेजा जाएगा। साल दो023 के नवंबर महीने में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की तरफ से जिला प्रशासन को इस झील के लगातार फैलते आकार को लेकर आधिकारिक चेतावनी दी गई थी, जिसमें एहतियात बरतने की सलाह दी गई थी।

जुलाई दो024 में प्रशासनिक अधिकारियों ने किया था दुर्गम दौरा

इसरो से मिली चेतावनी के बाद जुलाई दो024 के दौरान उस समय के उपायुक्त के नेतृत्व में विभिन्न विभागों के तेईस अधिकारियों और कर्मचारियों का एक बड़ा दल चार हजार सत्तर मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस दुर्गम झील तक पहुंचा था। उस कठिन यात्रा के दौरान अधिकारियों ने झील के अचानक फटने की आशंका और उससे निचले इलाकों में होने वाले संभावित नुकसान को कम करने के उपायों पर गहन विचार-विमर्श किया था। तमाम पहलुओं का अध्ययन करने के बाद एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करके राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को भेजी गई थी, जिसके आधार पर अब आगे के कदम उठाए जा रहे हैं।

आपदा की स्थिति में नुकसान को कम करने की रणनीति

प्रशासन का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि भविष्य में किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा आती है, तो उससे होने वाली मानवीय और आर्थिक क्षति को कम से कम रखा जा सके। इसके साथ ही प्रभावित होने वाले इलाकों में बचाव और राहत कार्यों को बिना किसी देरी के तुरंत शुरू किया जा सके। विशेषज्ञों द्वारा सुझाई गई तमाम सिफारिशों को चरणबद्ध ढंग से लागू किया जा रहा है। झील के फटने जैसी विकट परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए सिस्सू से लेकर हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक के बत्तीस स्थानों को संवेदनशील जोन के रूप में चिन्हित किया गया है।

स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया दलों का किया गया गठन

चिन्हित किए गए संवेदनशील क्षेत्रों के भीतर रहने वाले आम नागरिकों को जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की ओर से लगातार जागरूक किया जा रहा है ताकि वे किसी भी खतरे के वक्त तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें और आवश्यक सावधानियां बरत सकें। इस प्रशिक्षण अभियान में विभिन्न सरकारी विभागों को भी शामिल किया गया है ताकि आपदा के वक्त हर महकमा अपनी जिम्मेदारी को लेकर पूरी तरह सजग रहे। इसके अलावा सिस्सू और शाशिन जैसे गांवों में स्थानीय स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया दलों का गठन भी किया गया है। इन तमाम गतिविधियों को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से अतिरिक्त वित्तीय मदद की मांग की गई है।

बत्तीस संवेदनशील स्थानों पर की जाएगी हाई फ्लड लेवल मार्किंग

भौगोलिक स्थिति के अनुसार घेपन झील की दूरी सिस्सू से करीब ग्यारह किलोमीटर है, जबकि झील से होते हुए उदयपुर होते हुए जिले की अंतिम छोर की सीमा तक की कुल दूरी लगभग नब्बे किलोमीटर बैठती है। बाढ़ के संभावित खतरे और उसके व्यापक प्रभाव को देखते हुए जिले के सभी चिन्हित संवेदनशील स्थानों पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के तहत हाई फ्लड लेवल मार्किंग का काम शुरू कर दिया गया है। इस मार्किंग का मुख्य मकसद बाढ़ के संभावित स्तर के बारे में आम जनता को जागरूक करना और जमीनी स्तर पर एक पक्का संदर्भ बिंदु तैयार करना है ताकि लोग खतरे से पहले सतर्क हो सकें।

नदी किनारे रहने वाले लोगों के लिए बढ़ाई जाएगी जागरूकता

प्रशासन की ओर से कुल बत्तीस ऐसे स्थानों की पहचान की गई है जहां यह विशेष मार्किंग की जानी है। इन संवेदनशील बिंदुओं पर निशान लगाने से सामान्य जलस्तर और संभावित बाढ़ के पानी के स्तर के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से समझ में आ सकेगा। इससे विशेष तौर पर नदियों के किनारे बस्तियों बनाकर रहने वाले लोगों को बाढ़ के खतरों के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी। साथ ही किसी भी आपात परिस्थिति के उत्पन्न होने पर त्वरित तैयारी और बचाव कार्यों के संचालन को और अधिक मजबूती मिलने की उम्मीद है।

जीएलओएफ मॉनिटरिंग कमेटी का हो रहा है गठन

इन तमाम एहतियाती और तकनीकी उपायों के अलावा जिला स्तर पर एक विशेष ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड मॉनिटरिंग कमेटी का गठन भी किया जा रहा है। इस अहम समिति में विभिन्न प्रशासनिक विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों के साथ-साथ पर्वतारोहण और पर्यावरण से जुड़े अनुभवी जानकारों को भी सदस्य के रूप में शामिल किया जाएगा। यह समिति घेपन झील की हर गतिविधि और उसके आसपास के भौगोलिक बदलावों पर लगातार नजर रखेगी ताकि समय रहते किसी भी संभावित खतरे की चेतावनी दी जा सके और जान-माल की रक्षा के लिए पुख्ता इंतजाम किए जा सकें।

सवाल-जवाब

घेपन ग्लेशियल झील कहाँ स्थित है?
घेपन ग्लेशियल झील हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में चार हजार सत्तर मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
हाल के वर्षों में घेपन झील के आकार में कितना बदलाव आया है?
बीते कुछ वर्षों के दौरान इस झील के आकार में एक सौ तिहत्तर प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
झील के पानी की निगरानी के लिए कौन सी तकनीकी प्रणाली लगाई जा रही है?
सी-डैक तिरुवनंतपुरम के सहयोग से झील के पास एक आधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है।
वैज्ञानिकों की टीम कब झील का अध्ययन करने जाएगी?
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पांच विशेषज्ञों की टीम एक सितंबर, दो026 को झील क्षेत्र का चौदह दिवसीय वैज्ञानिक अध्ययन करने पहुंचेगी।
इसरो ने प्रशासन को कब सचेत किया था?
इसरो ने नवंबर 2023 में विभिन्न माध्यमों से जिला प्रशासन को झील के बढ़ते आकार के संबंध में सूचित किया था।
झील के संभावित खतरे को लेकर कितने संवेदनशील स्थानों की पहचान की गई है?
सिस्सू से हिमाचल प्रदेश की अंतिम सीमा तक कुल चौंतीस स्थानों को संवेदनशील क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है।
हाई फ्लड लेवल मार्किंग के लिए कितने स्थानों को चुना गया है?
आपदा जोखिम को कम करने के लिए कुल बत्तीस स्थानों पर हाई फ्लड लेवल मार्किंग का कार्य शुरू किया गया है।
झील की सिस्सू से दूरी कितनी है?
घेपन झील की दूरी सिस्सू से लगभग ग्यारह किलोमीटर है।
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