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स्क्रीन की लत छुड़ाने जमशेदपुर पहुंचे चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, बच्चों में बढ़ा क्रेजझारखंड
21 सित॰ 2026, 9:06 am (2 घंटे पहले)· 0

स्क्रीन की लत छुड़ाने जमशेदपुर पहुंचे चित्रकूट के लकड़ी के खिलौने, बच्चों में बढ़ा क्रेज

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट से पारंपरिक काष्ठ खिलौने लेकर जमशेदपुर पहुंचे हिमांशु के स्टॉल पर बच्चों की भारी भीड़ उमड़ रही है। बिना बैटरी और स्क्रीन वाले ये हस्तनिर्मित खिलौने बच्चों के मानसिक विकास और एकाग्रता को निखार रहे हैं।

स्मार्टफोन, इंटरनेट वीडियो और सोशल मीडिया रील्स की दुनिया में उलझे बच्चों को वास्तविक खेलकूद की ओर लौटाने की एक अनोखी पहल जमशेदपुर में देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश स्थित चित्रकूट धाम से आए हिमांशु शहर में लकड़ी के पारंपरिक और आकर्षक खिलौने लेकर पहुंचे हैं। आधुनिक गैजेट्स के दौर में काष्ठ कला से बने ये खिलौने बच्चों का ध्यान अपनी ओर खींचने में पूरी तरह कामयाब हो रहे हैं। इन खिलौनों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि बच्चों की मानसिक एकाग्रता, रचनात्मक सोच और शारीरिक संतुलन को बेहतर बनाने में भी मदद करते हैं।

कारीगरों के हुनर और मेहनत से तराशे गए उत्पाद

हिमांशु के अनुसार, आज के समय में छोटे बच्चों की दिनचर्या का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन की स्क्रीन के सामने बीत जाता है। ऐसे माहौल में हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने बच्चों को स्क्रीन की आभासी दुनिया से बाहर निकालकर एक नया और स्वाभाविक अनुभव प्रदान करते हैं। यहां प्रदर्शित खिलौनों में लकड़ी से तैयार बेब्लेड, फिरकनी यानी लट्टू, पक्षियों की मधुर आवाज निकालने वाली विशेष सीटियां, तीर-धनुष और विभिन्न प्रकार के दिमागी पजल बच्चों के बीच बेहद लोकप्रिय हो रहे हैं। इन सभी खिलौनों का निर्माण चित्रकूट और उसके नजदीकी इलाकों के कुशल कारीगरों द्वारा पूरी तरह हाथों से किया जाता है। एक-एक खिलौने को तराशने, उसे चिकना रूप देने और उस पर प्राकृतिक रंगों की फिनिशिंग करने में शिल्पकार अपनी पीढ़ियों पुरानी पारंपरिक कला का इस्तेमाल करते हैं।

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मानसिक विकास और आंखों व हाथों का सटीक समन्वय

इस प्रदर्शनी में अलग-अलग आयु वर्ग के बच्चों के लिए विशेष उत्पाद रखे गए हैं। नन्हे बच्चों के लिए लकड़ी की गाड़ियां, रंग-बिरंगे ब्लॉक्स, संतुलन बनाने वाले बैलेंसिंग गेम्स और मैग्नेटिक रोलर कोस्टर उपलब्ध कराए गए हैं। मैग्नेटिक रोलर कोस्टर की सहायता से बच्चे एकाग्रचित्त होकर वस्तुओं की दिशा और गति को समझना सीखते हैं। वहीं लकड़ी के जटिल पजल को हल करते समय बच्चों में तर्कशक्ति और किसी समस्या का समाधान खोजने का कौशल विकसित होता है। इसके अलावा लट्टू नचाने और बेब्लेड घुमाने जैसी गतिविधियों से बच्चों के हाथों की मांसपेशियों और आंखों के बीच का तालमेल (हैंड-आई कोऑर्डिनेशन) काफी मजबूत होता है।

स्क्रीन और बैटरी की झंझट से पूरी तरह मुक्त

खिलौनों की इस श्रृंखला में लकड़ी के हाथी, घोड़े, रेलगाड़ी, छोटी कारें, घूमने वाला चक्र, पारंपरिक झुनझुने और रिंग फेंकने वाले खेल भी शामिल हैं। इन खिलौनों की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि इनमें किसी प्रकार की इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन, चिप या बैटरी की जरूरत नहीं पड़ती। कई खेल ऐसे तैयार किए गए हैं जिन्हें बच्चे अकेले खेलने के स्थान पर अपने भाई-बहनों और मित्रों के समूह में खेल सकते हैं। इससे बच्चों में आपसी संवाद, साझा करने की भावना और मिलजुलकर खेलने की सामाजिक आदतें भी विकसित होती हैं। मशीन निर्मित प्लास्टिक के खिलौनों की तुलना में ये उत्पाद बच्चों को भारतीय लोककला और सांस्कृतिक धरोहर के करीब ले जाने का माध्यम बन रहे हैं।

गोपाल मैदान में लगा है विशेष स्टॉल

माता-पिता के लिए भी अपने बच्चों को गैजेट्स की लत से बचाने के लिहाज से ये खिलौने एक बेहतरीन और सुरक्षित विकल्प साबित हो रहे हैं। जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में आयोजित प्रदर्शनी में हिमांशु का यह स्टॉल लगाया गया है। यह प्रदर्शनी दोपहर 1 बजे से लेकर रात 10 बजे तक आम लोगों के लिए खुली रहती है। स्थानीय अभिभावक और बच्चे अगले 15 दिनों तक यहां जाकर इन पारंपरिक हस्तनिर्मित काष्ठ खिलौनों को देख और खरीद सकते हैं।

सवाल-जवाब

जमशेदपुर में लकड़ी के खिलौने कहां से लाए गए हैं?
ये विशेष पारंपरिक लकड़ी के खिलौने उत्तर प्रदेश के चित्रकूट धाम से लाए गए हैं।
जमशेदपुर में यह प्रदर्शनी किस स्थान पर लगी है?
यह प्रदर्शनी जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में आयोजित की जा रही है।
प्रदर्शनी का समय क्या है और यह कितने दिनों तक चलेगी?
स्टॉल दोपहर 1:00 बजे से रात 10:00 बजे तक खुले रहते हैं और यह प्रदर्शनी अगले 15 दिनों तक जारी रहेगी।
इस स्टॉल पर किस तरह के खिलौने उपलब्ध हैं?
यहां लकड़ी के लट्टू, बेब्लेड, सीटी, तीर-धनुष, पजल, मैग्नेटिक रोलर कोस्टर, कार, हाथी, घोड़े और बैलेंसिंग गेम उपलब्ध हैं।
ये खिलौने बच्चों के विकास में कैसे सहायक हैं?
ये खिलौने बच्चों की एकाग्रता, समस्या सुलझाने की क्षमता और हाथ-आंख के समन्वय (हैंड-आई कोऑर्डिनेशन) को बेहतर बनाते हैं।
क्या इन खिलौनों में बैटरी या स्क्रीन का इस्तेमाल होता है?
नहीं, ये पूरी तरह हस्तनिर्मित लकड़ी के खिलौने हैं जिनमें किसी बैटरी या इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन की आवश्यकता नहीं होती।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Rohan Gupta@rohan-gupta·26 मिनट पहले

यह पहल दर्शाती है कि कैसे पारंपरिक शिल्प और आधुनिक बाल मनोविज्ञान का यह मेल डिजिटल डिटॉक्स का एक प्रभावी समाधान बन सकता है। हालांकि, बड़े पैमाने पर स्क्रीन की लत को दूर करने के लिए ऐसे स्थानीय प्रयासों को एआई-संचालित पैरेंटिंग टूल्स और डिजिटल वेलनेस ऐप्स के साथ जोड़ना होगा ताकि माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन कर सकें।

Arjun Mehta@arjun-mehta·49 मिनट पहले

यह पहल दर्शाती है कि पारंपरिक हस्तशिल्प और स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देकर किस प्रकार आधुनिक जीवनशैली की बड़ी चुनौतियों का समाधान किया जा सकता है। स्क्रीन टाइम कम करने और मानसिक विकास के लिए इस तरह के स्वदेशी उत्पादों को स्कूलों और सार्वजनिक मंचों पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी संबल मिले।

Ravikash Gupta@ravikash·48 मिनट पहले

यह पहल केवल बच्चों के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक उभरता हुआ आर्थिक अवसर भी है। भारत के ग्रामीण हस्तशिल्प और काष्ठ कला बाजार में अपार संभावनाएं हैं। यदि इस प्रकार के स्वदेशी और स्क्रीन-मुक्त उत्पादों को स्टार्टअप्स, डिजिटल ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और सुदृढ़ सप्लाई चेन के माध्यम से जोड़ा जाए, तो यह पारंपरिक अर्थव्यवस्था को आधुनिक वित्तीय स्थिरता प्रदान कर सकता है। ऐसे स्थानीय उद्यमों में निवेश और सही कॉर्पोरेट समर्थन से न केवल कारीगरों की आय बढ़ेगी, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल एसेट्स की बढ़ती मांग को पूरा करने में भी सक्षम होगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

यह पहल बच्चों को स्क्रीन की लत से दूर करने के साथ-साथ हमारी पारंपरिक काष्ठ कला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जीवनदान देने का बेहतरीन माध्यम है। जब ऐसे हस्तनिर्मित खिलौने बाजार में टिकेंगे, तभी स्थानीय कारीगरों का पलायन रुकेगा और उनकी पीढ़ियों पुराना हुनर सुरक्षित रह पाएगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

यह सराहनीय है कि उत्तर प्रदेश के चित्रकूट के कारीगरों की यह पहल केवल बाल मनोविज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अंचल के कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने का एक प्रभावी मॉडल भी प्रस्तुत करती है। जब इस तरह के हस्तशिल्प झारखंड जैसे अन्य राज्यों के बाजारों तक पहुंचते हैं, तो यह स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा करता है। इससे बिचौलियों की भूमिका कम होती है और शिल्पकारों को उनकी मेहनत का वास्तविक आर्थिक लाभ सीधे मिलता है, जो राज्य के पारंपरिक कारीगरों के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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