सेब को आमतौर पर ठंडे पहाड़ी इलाकों की फसल माना जाता रहा है, लेकिन अब गर्म मैदानी क्षेत्रों में भी इसे छत या बालकनी के गमले में आसानी से उगाया जा रहा है। पोषण की दृष्टि से सेब में प्रचुर मात्रा में डाइटरी फाइबर और पेक्टिन पाया जाता है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने के साथ कब्ज और गैस की परेशानी को दूर करने में मदद करता है। इसमें मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। कम कैलोरी और ज्यादा फाइबर होने के कारण यह वजन संतुलित रखने में मददगार है, जबकि इसमें पाए जाने वाले पॉलीफेनॉल्स इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित कर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को घटाते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे गर्म राज्यों में भी अब बागवानी प्रेमी गमलों और ग्रो बैग्स में सेब के पौधे तैयार कर रहे हैं। सही किस्म के चयन, गमले के आकार और उचित पोषण की मदद से घरेलू स्तर पर भी सेब की बंपर पैदावार हासिल की जा सकती है।
गर्म मैदानी राज्यों के लिए सबसे मुफीद किस्में और रोपाई का समय
घर में गमले के भीतर सेब का पौधा लगाते समय कभी भी बीज से शुरुआत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बीज से तैयार पौधे फल देने में बहुत लंबा समय लेते हैं और उनमें पैदावार की गारंटी नहीं होती। हमेशा किसी प्रमाणित नर्सरी से अच्छी किस्म का ग्राफ्टेड पौधा ही चुनना चाहिए, क्योंकि ग्राफ्टेड पौधों में तीन साल के भीतर फल लगना शुरू हो जाता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे मैदानी और गर्म मौसम वाले राज्यों के लिए हरमन-99, अन्ना और डोरसेट गोल्डन किस्में सबसे ज्यादा उपयुक्त और उन्नत मानी गई हैं। इनमें से हरमन-99 किस्म गर्म इलाकों में सबसे लोकप्रिय है, जिसका पेटेंट हरिमन शर्मा के नाम पर दर्ज है। यह पौधा नर्सरी के अलावा ऑनलाइन माध्यम से भी आसानी से मिल जाता है और आमतौर पर इसकी कीमत लगभग 235 रुपये होती है। इस पौधे को लगाने के लिए जून और जुलाई का समय, गर्मी का मौसम, सितंबर और अक्टूबर या फिर नवंबर का महीना सबसे सही माना जाता है।
गमले का साइज और पोषक तत्वों से भरपूर पॉटिंग मिक्स
सेब का पौधा लगाने के लिए गमले या ग्रो बैग का आकार कम से कम 15×15 इंच होना बेहद जरूरी है। यदि लंबे समय तक पौधे को बिना बार-बार बदले रखना चाहते हैं, तो 24×24 इंच का ग्रो बैग सबसे बेहतरीन विकल्प साबित होता है, जिससे पौधे की जड़ों को फैलने की पूरी जगह मिलती है और बार-बार रिपॉटिंग का झंझट खत्म हो जाता है। मिट्टी तैयार करने के लिए 30 प्रतिशत वर्मीकंपोस्ट, 30 प्रतिशत कोकोपीट अथवा बालू रेत, 30 प्रतिशत बगीचे की सामान्य उपजाऊ मिट्टी और 10 प्रतिशत अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद को आपस में मिला लें। इस मिश्रण में दो मुट्ठी नीम खली और फलदार पौधों के लिए जरूरी ऑर्गेनिक रॉक फॉस्फेट मिलाएं। जब पॉटिंग मिक्स तैयार हो जाए, तो पौधे को लगाने से पहले एक या दो दिन तक आसपास के दूसरे पौधों के साथ छाया में रखें ताकि वह नए वातावरण के अनुकूल हो सके। इसके बाद गमले में लगाते समय यह खास ध्यान रखें कि ग्राफ्टिंग वाला जोड़ हमेशा मिट्टी की सतह से ऊपर रहे। पौधे को गमले में स्थापित करने के तुरंत बाद भरपूर पानी देना चाहिए।
धूप, सिंचाई और नियमित देखरेख की बुनियादी जरूरतें
सेब के पौधे को अच्छी तरह बढ़ने और फलने-फूलने के लिए रोजाना कम से कम 6 से 8 घंटे की सीधी धूप मिलना जरूरी है। गमले की मिट्टी को सख्त होने से बचाने और जड़ों तक हवा तथा धूप पहुंचाने के लिए हर 20 दिन के अंतराल पर हल्की निराई-गुड़ाई जरूर करें। महीने में एक बार पौधे की थाले में वर्मीकंपोस्ट या पुरानी सड़ी हुई गोबर की खाद देना पौधे के स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखता है। जब भी कोई फलदार पौधा ग्रो बैग में लगाया जाता है, तो साल में दो बार जड़ों की छंटाई यानी रूट प्रूनिंग करना अनिवार्य माना गया है। यदि जड़ों की प्रूनिंग समय पर नहीं की जाएगी, तो जड़ें आपस में उलझकर बाउंड हो जाएंगी, जिससे मिट्टी में दिए जाने वाले पोषक तत्व पौधे को नहीं मिल पाएंगे। इसके नतीजे में पौधे की बढ़वार रुक जाएगी, पत्तियां पीली पड़कर झड़ने लगेंगी और पौधे पर फूल व फल नहीं आ पाएंगे। यह रूट प्रूनिंग दिसंबर से जनवरी और जुलाई से अगस्त के महीनों में की जानी चाहिए।
टहनियों की कटाई-छंटाई और फंगल इन्फेक्शन से सुरक्षा
यूं तो ग्राफ्टेड सेब के पौधे को बहुत अधिक पेचीदा देखभाल की जरूरत नहीं होती, लेकिन नियमित छंटाई के अभाव में कई बार पौधे पर फूल नहीं आते। इसके समाधान के लिए पौधे की सूखी, रोगग्रस्त और आपस में उलझी हुई शाखाओं को काटकर हटा देना चाहिए। छंटाई का सबसे सही समय जनवरी का महीना होता है। जब भी शाखाओं की कटाई करें, तो कटर या प्रूनर को हमेशा 45 डिग्री के कोण पर रखकर तिरछा कट लगाएं। कटाई के तुरंत बाद कटे हुए हिस्से पर हल्दी का गाढ़ा लेप लगा दें, जिससे कटे हुए भाग से किसी भी प्रकार का फंगल या कीट संक्रमण पौधे के भीतर न फैल सके। नियमित छंटाई से पौधे के भीतरी हिस्सों तक पर्याप्त धूप और हवा पहुंचती है, जिससे नई कोपलें और फूल आसानी से निकलते हैं।
फूलों की संख्या और फलों का आकार बढ़ाने वाली जैविक खाद
गर्म मौसम वाले मैदानी इलाकों में सेब के पौधों पर फूल आने की प्रक्रिया फरवरी के अंत से लेकर अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक चलती है। इस समयावधि में पौधे की पोषण संबंधी जरूरतें बढ़ जाती हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए गमले में ऑर्गेनिक सीवीड ग्रेन्यूल्स मिलाए जा सकते हैं। यह सीवीड लिक्विड रूप में भी मिलता है, जिसका पानी में घोल बनाकर पत्तियों और टहनियों पर छिड़काव किया जा सकता है। यह एक बेहतरीन ऑर्गेनिक ग्रोथ प्रमोटर के रूप में काम करता है और शाखाओं पर ज्यादा कलियां लाने में मदद करता है। इसके अलावा पौधे में बंपर फ्लावरिंग और बेहतर आकार के फल पाने के लिए प्रोम यानी फॉस्फेट रिच ऑर्गेनिक मैन्योर का इस्तेमाल सबसे असरदार उपाय है। प्रोम वास्तव में रासायनिक डीएपी खाद का एक पूरी तरह जैविक और सुरक्षित विकल्प है। यह खाद 50 किलोग्राम के बैग में आती है और थोक बाजार में इसकी कीमत 7 रुपये से 10 रुपये प्रति किलोग्राम तक होती है। इसे गमले में डालने से पहले मिट्टी की अच्छी तरह गुड़ाई कर लें और फिर जड़ों के चारों ओर मिट्टी में मिलाकर हल्की सिंचाई कर दें। इससे पौधे को प्रचुर मात्रा में फॉस्फेट मिलता है, जिससे फूल झड़ने की समस्या कम होती है और फलों का आकार तेजी से बड़ा होता है।

















