शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों में जहां देश के अधिकांश राज्यों में श्रद्धालु नौ दिनों का कठिन व्रत, फलाहार और सात्विक खानपान का कड़ा अनुशासन निभाते हैं, वहीं पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में इस पर्व का अंदाज बिल्कुल अनोखा दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल के लिए दुर्गा पूजा केवल एक पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि यह हर व्यक्ति की अंतरात्मा से जुड़ी एक अत्यंत भावुक अनुभूति है, जिसका इंतजार लोग पूरे बारह महीने बेसब्री से करते हैं। इस महापर्व के दौरान देश के अन्य हिस्सों के लोगों के मन में अक्सर एक स्वाभाविक जिज्ञासा और आश्चर्य पैदा होता है कि देवी की पूजा-अर्चना के बीच मछली और मटन जैसे मांसाहारी व्यंजनों का भोग कैसे लगाया जाता है और भक्त इसे खुले दिल से प्रसाद के रूप में क्यों ग्रहण करते हैं। इस विशिष्ट खानपान के पीछे सदियों पुरानी शाक्त परंपरा, आत्मीय रिश्ते और भौगोलिक पहचान का गहरा ताना-बाना मौजूद है।
घर की लाडली बेटी का कैलाश से मायके आगमन
बंगाली समाज और संस्कृति में मां दुर्गा को केवल मंदिर या पंडाल में स्थापित मिट्टी और पत्थर की भव्य प्रतिमा के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें अपने घर की लाडली बेटी मानकर अंतर्मन से स्वीकार किया जाता है। जनमानस में यह दृढ़ मान्यता है कि वर्ष में एक बार देवी अपने चारों बच्चों यानी भगवान कार्तिकेय, भगवान गणेश, देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती के साथ देवों के देव महादेव के निवास कैलाश पर्वत से अपने मायके बंगाल की धरती पर पधारती हैं। इस पावन अवसर पर चारों ओर 'आशछे' का स्वर गूंज उठता है, जिसका अर्थ है कि घर की प्यारी बेटी अब मायके पहुंच चुकी है।
जब किसी भी साधारण भारतीय परिवार में कोई विवाहित बेटी लंबे समय के अंतराल के बाद अपने मायके आती है, तो माता-पिता और परिजन उसके सत्कार में कोई कमी नहीं छोड़ते। उसे केवल सादा भोजन या खिचड़ी परोसने के बजाय उसकी पसंद के सबसे स्वादिष्ट, समृद्ध और लजीज पकवान तैयार करके खिलाए जाते हैं। बंगाल के लोग मां दुर्गा के साथ ठीक वैसा ही पारिवारिक और निश्छल रिश्ता निभाते हैं। जिस तरह बेटी के आने पर घर में उत्सव का माहौल बनता है और शानदार दावतों का आयोजन होता है, उसी स्नेह भाव से देवी का स्वागत मछली, मटन और बंगाल के पारंपरिक व्यंजनों से सजाई गई थालियों के साथ किया जाता है। यह भोजन केवल भोग नहीं, बल्कि एक बेटी के प्रति पूरे परिवार का अनमोल लाड़-प्यार और वात्सल्य भाव प्रकट करने का माध्यम बन जाता है।
शाक्त परंपरा और आदि शक्ति की आराधना का गूढ़ रहस्य
उत्तर भारत और देश के अन्य पश्चिमी क्षेत्रों में धार्मिक पर्वों पर वैष्णव परंपरा का व्यापक प्रभाव दिखता है, जहां शुद्ध सात्विकता, प्याज-लहसुन के त्याग और उपवास पर विशेष बल दिया जाता है। इसके विपरीत, बंगाल की भूमि में प्राचीन काल से शाक्त परंपरा की जड़ें बेहद गहरी रही हैं। शाक्त मत के अंतर्गत देवी को 'आदि शक्ति' यानी संपूर्ण ब्रह्मांड की मूल ऊर्जा, शक्ति और जननी माना जाता है।
महाष्टमी और महानवमी के अत्यंत पावन अवसरों पर, जब पंडालों में ढाक और ढोल की गूंजती थाप से संपूर्ण वातावरण ऊर्जावान हो उठता है, तब प्राचीन रीति-रिवाजों के अनुसार देवी को विशेष भोग निवेदित किया जाता है। कई पारंपरिक स्थलों और पारिवारिक पूजाओं में बलि की रस्म के बाद या फिर बिना प्याज और लहसुन का उपयोग किए खास विधि से तैयार किया गया मांसाहारी प्रसाद देवी के सम्मुख अर्पित किया जाता है। भक्तों का यह अडिग विश्वास होता है कि मां उनके ही परिवार की अभिन्न सदस्य हैं और वे उसी भोजन को सहर्ष स्वीकार करती हैं जो उनके बच्चे अपने घरों में आदर और प्रेम से ग्रहण करते हैं।
नदियों की माटी, आजीविका और मछली का सांस्कृतिक महत्व
बंगाल का भूगोल और वहां की जीवनशैली जल, नदियों और समुद्र से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। गंगा, पद्मा और अनगिनत छोटी-बड़ी जलधाराओं ने सदियों से इस भूभाग के जन-जीवन को सींचा है और उन्हें पोषण दिया है। बंगाल के निवासियों के लिए मछली कभी किसी विलासिता, दिखावे या शौक की वस्तु नहीं रही, बल्कि यह हर सामान्य गृहस्थ की दिनचर्या, आजीविका और पोषण का मुख्य आधार रही है।
स्थानीय समाज में मछली को उर्वरता, संपन्नता और परम शुभता का प्रतीक माना जाता है। विवाह से लेकर गृह प्रवेश और अन्य सभी मांगलिक आयोजनों की शुरुआत में मछली की उपस्थिति अनिवार्य समझी जाती है। जब किसी क्षेत्र का भूगोल, प्राकृतिक संसाधन और लोकजीवन संस्कृति के साथ इस तरह एकाकार हो जाते हैं, तो वहां का दैनिक खानपान भी स्वाभाविक रूप से आस्था और पूजा पद्धति का अंग बन जाता है। बंगाली जनमानस के लिए देवी को मछली का भोग चढ़ाना और उसका सेवन करना उतना ही स्वाभाविक और पवित्र है, जितना किसी अन्य संस्कृति में दूध, दही, पंचामृत या मिठाइयों का भोग लगाना माना जाता है।
धार्मिक बंधनों से परे प्रेम और अपनत्व का महापर्व
दुर्गा पूजा के मुख्य चार दिनों में बंगाल के गली-मोहल्लों में चारों ओर पकवानों की मनमोहक सुगंध तैरती रहती है। देवी की प्रतिमा के चेहरे पर झलकता वात्सल्य और श्रद्धालुओं के चेहरों पर उमड़ती खुशी यह साफ संदेश देती है कि यह आयोजन कठोर कर्मकांडों से कहीं आगे बढ़कर निश्छल प्रेम, आत्मीयता और पारिवारिक जुड़ाव का उत्सव है। इस मानवीय और सांस्कृतिक मर्म को समझ लेने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि दुर्गा पूजा में मछली और मीट की मौजूदगी किसी भी रूप में अनादर नहीं, बल्कि अपनी आराध्य को अपने ही परिवार का हिस्सा मानकर उनके प्रति असीम स्नेह प्रकट करने का अनुपम तरीका है।



















