भारत की अर्थव्यवस्था में आधुनिक तकनीक अपनाने की तेज रफ्तार अब देश के बाहरी व्यापार आंकड़ों में भी स्पष्ट रूप से दिखने लगी है। घरेलू स्तर पर हाई-टेक कंप्यूटिंग उपकरणों के विशाल आयात के चलते व्यापार घाटे का दायरा काफी बढ़ गया है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े उत्पादों का व्यापार घाटा अब देश के कुल व्यापार घाटे में कच्चे तेल के बाद दूसरा सबसे बड़ा कारण बन गया है। इस तेज विस्तार ने पारंपरिक रूप से दूसरे स्थान पर रहने वाले सोने के आयात घाटे को भी पीछे छोड़ दिया है, जिससे विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर के सामने भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ रहा है।
एआई हार्डवेयर आयात का बढ़ता आकार और आंकड़े
तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर स्थापित करने के लिए जरूरी अत्याधुनिक उपकरणों के आयात में बीते एक साल के दौरान रिकॉर्ड वृद्धि देखी गई है। जुलाई 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले 12 महीनों के रोलिंग आधार पर एआई-सक्षम उत्पादों का व्यापार घाटा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 2.0 प्रतिशत पर पहुंच गया। मूल्य के हिसाब से यह घाटा 77 अरब डॉलर दर्ज किया गया है। एक साल पहले की समान अवधि में यह आंकड़ा भारत की जीडीपी का 1.5 प्रतिशत था। इस मद में आयात बिल का इस स्तर तक पहुंचना यह दर्शाता है कि आधुनिक डेटा और कंप्यूटिंग अवसंरचना तैयार करने के लिए भारत की विदेशी कलपुर्जों पर निर्भरता कितनी गहरी है।
इस घाटे के अंतर्गत शामिल श्रेणियों में मुख्य रूप से एडवांस सेमीकंडक्टर, हाई-परफॉर्मेंस प्रोसेसर, आधुनिक मेमोरी चिप्स, डेटा-प्रोसेसिंग यूनिट्स यानी डीपीयूस और जटिल नेटवर्किंग हार्डवेयर शामिल हैं। इन तमाम उपकरणों की घरेलू मांग में लगातार इजाफा हो रहा है, लेकिन घरेलू उत्पादन की सीमित क्षमता के कारण इनका एक बड़ा हिस्सा विदेशों से मंगवाना पड़ रहा है।
मात्रा से ज्यादा कीमतों में उछाल बना घाटे की वजह
आयात से जुड़े इस व्यापक विस्तार का गहन विश्लेषण बताता है कि यह गिरावट केवल सामानों की संख्या या मात्रा में वृद्धि के कारण नहीं हुई है। वास्तव में, एआई-सक्षम सामानों के व्यापार घाटे का यह हालिया दबाव मात्रा-आधारित होने के बजाय मूल्य-आधारित अधिक प्रतीत होता है। वैश्विक स्तर पर आधुनिक चिप्स, सर्वर पार्ट्स और डेटा प्रोसेसिंग से जुड़े उन्नत घटकों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजारों में काफी ऊंची बनी हुई हैं। हाई-एंड हार्डवेयर की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में प्रीमियम कीमतों के चलते भारत का आयात खर्च तेजी से बढ़ा है, जिसने कुल व्यापार अंतर को और चौड़ा कर दिया है।
रुपये को सहारा देने वाले कारक और पूंजी प्रवाह
व्यापार घाटे में आए इस भारी उछाल के बावजूद भारतीय रुपये को तात्कालिक रूप से कुछ महत्वपूर्ण कारकों से सहारा मिल रहा है। हाल के हफ्तों में देश में पूंजी का अंतर्वाह मजबूत रहा है। अनिवासी जमा यानी एनआरआई डिपॉजिट को आकर्षित करने के लिए पेश किए गए नीतिगत प्रोत्साहनों ने इस पूंजी प्रवाह को रफ्तार दी है। यह स्थिर पूंजी आवक निकट भविष्य में भारत के बाहरी वित्तीय संतुलन और भारतीय मुद्रा को आवश्यक स्थिरता प्रदान करने में अहम भूमिका निभा रही है, जिससे व्यापार घाटे का तात्कालिक असर कुछ हद तक संतुलित हो रहा है।
वैश्विक बाजारों में अन्य मुद्राओं और परिसंपत्तियों की स्थिति
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा और जिंस बाजारों में भी इस समय व्यापक हलचल देखने को मिल रही है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7100 के स्तर से ऊपर स्थिर बना रहा। अमेरिकी डॉलर में जुलाई के अंत के बाद के अपने उच्चतम स्तर से आई मामूली गिरावट थोड़ी थमती दिखी, क्योंकि दुनिया भर में भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं बरकरार हैं। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना यानी पीबीओसी द्वारा लोन प्राइम रेट्स पर यथास्थिति बनाए रखने से ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव रहा, हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी आरबीए द्वारा दर वृद्धि की संभावनाओं और आगामी ट्रंप-शी शिखर सम्मेलन से पहले इसे समर्थन भी मिला।
दूसरी तरफ, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 157.00 के नीचे आ गया। शुक्रवार को बैंक ऑफ जापान द्वारा रेट चेक किए जाने के बाद संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों से येन में मामूली मजबूती देखी गई। जापान में छुट्टी के माहौल के बीच रूस-यूक्रेन और मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी कारोबारियों को सतर्क रखा है। केंद्रीय बैंक की नीतिगत दिशा के तहत, बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के मतदान से अपने अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया, जो मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण की दिशा में एक और कदम है और व्यापक रूप से बाजार की उम्मीदों के अनुरूप रहा।
सोने के भाव और बॉन्ड बाजारों में तनाव
जिंस बाजार की बात करें तो सोना इस हफ्ते की शुरुआत में मंदी के रुख के साथ खुला और इसकी दो दिनों की तेजी का सिलसिला थम गया। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा आगे ब्याज दरों में और बढ़ोतरी की उम्मीदों और मजबूत अमेरिकी डॉलर ने सोने की कीमतों पर दबाव बनाए रखा। वहीं वित्तीय बाजारों में तीसरी तिमाही के अंतिम हफ्तों में उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी हुई है। कच्चे तेल की कीमतें गिर रही हैं, जबकि यूरोपीय और अमेरिकी शेयर बाजार बढ़त के साथ खुलने की तैयारी में दिखे। वित्तीय तनाव सबसे ज्यादा सॉवरेन बॉन्ड बाजार में देखा गया, जहां शुक्रवार देर रात यूरोपीय और अमेरिकी यील्ड में एक बार फिर तेज उछाल दर्ज किया गया।



















