कनाडा की अर्थव्यवस्था ने हाल के महीनों में विपरीत परिस्थितियों के बीच संभलने के ठोस संकेत दिए हैं, जिससे विकास दर को नया सहारा मिलता दिख रहा है। वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही के दौरान सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी वृद्धि में दर्ज किया गया सुधार यह दर्शाता है कि घरेलू स्तर पर आर्थिक गतिविधियां पटरी पर लौट रही हैं। इसके साथ ही बेरोजगारी दर में आई गिरावट ने प्रति व्यक्ति आय और लाभ को मजबूती प्रदान की है। श्रम बाजार में आई इस मजबूती और वेतन वृद्धि के कारण उपभोक्ता खर्च भी स्थिर बना हुआ है, जिसने व्यापक आर्थिक सुस्ती की चिंताओं को फिलहाल काफी हद तक दूर कर दिया है।
व्यापारिक शुल्क का सीमित दायरा और उपभोक्ता खर्च का रुख
व्यापार के मोर्चे पर संयुक्त राज्य अमेरिका की ओर से लगाए गए शुल्कों को लेकर चिंताएं जरूर बनी हुई हैं, लेकिन उनका वास्तविक दायरा अभी काफी सीमित नजर आ रहा है। नए प्रावधानों के तहत कनाडाई आयात के 5 प्रतिशत हिस्से पर 50 प्रतिशत का भारी अमेरिकी शुल्क लगाया गया है। इस कदम से संबंधित लक्षित क्षेत्रों पर गंभीर प्रभाव पड़ना तय है, लेकिन सीमा पार होने वाले अधिकांश कनाडाई निर्यात और आयात अभी भी पूरी तरह शुल्क मुक्त बने हुए हैं। इस प्रकार शुल्क वृद्धि का असर कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है, हालांकि इससे जुड़े जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं।
दूसरी ओर, घरेलू मांग को लेकर वित्तीय आंकड़ों से भी सकारात्मक संकेत मिले हैं। कार्ड लेनदेन के आंकड़ों से पता चलता है कि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के बावजूद गर्मियों के दौरान उपभोक्ता खर्च में लचीलापन बना रहा। ईंधन और ऊर्जा लागत में इजाफे के बावजूद परिवारों ने अपनी खरीदारी सीमित नहीं की, जिसका सीधा श्रेय मजबूत रोजगार और बेहतर वेतन वृद्धि को जाता है।
बैंक ऑफ कनाडा का रुख और संभावित ब्याज दर वृद्धि
केंद्रीय बैंक के नीतिगत फैसलों को लेकर वित्तीय विश्लेषकों का अनुमान है कि बैंक ऑफ कनाडा वर्ष 2026 के दौरान अपनी नीतिगत ब्याज दरों को मौजूदा स्तर पर स्थिर रख सकता है। ऊर्जा की ऊंची कीमतों का असर अभी तक व्यापक महंगाई के आंकड़ों में बड़े पैमाने पर देखने को नहीं मिला है, जिससे केंद्रीय बैंक के पास जल्दबाजी न करने और धैर्य बरतने का विकल्प मौजूद है।
हालांकि, आर्थिक परिदृश्य पूरी तरह जोखिम मुक्त नहीं है। यदि ऊर्जा की लागत अन्य जरूरी वस्तुओं और सेवाओं को महंगा करने लगी, तो ब्याज दरों में अनुमान से पहले बढ़ोतरी का जोखिम बन सकता है। मौजूदा अनुमानों के मुताबिक 2027 की शुरुआत से दरों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, लेकिन यदि मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ता है, तो बैंक ऑफ कनाडा को अपनी सख्त मौद्रिक नीति पहले भी लागू करनी पड़ सकती है।
अमेरिकी डॉलर की मजबूती और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में मंगलवार को एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में कमजोरी दर्ज की गई। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर 0.7150 के स्तर से नीचे फिसल गई, जो पिछले कारोबारी दिन दर्ज किए गए तीन सप्ताह से अधिक के निचले स्तर के काफी करीब है। इस गिरावट के पीछे कई वैश्विक कारक सक्रिय नजर आ रहे हैं।
अमेरिकी फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी की बैठक शुरू होने से ठीक पहले अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तरों के करीब टिकी हुई है। तेल की बढ़ती कीमतों के कारण पैदा हुए मुद्रास्फीति के जोखिमों ने अमेरिकी डॉलर को व्यापक समर्थन दिया है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव और गहरा गया है। इसके अतिरिक्त, चीन के अगस्त महीने के आर्थिक गतिविधि आंकड़ों में मिला-जुला रुख देखने को मिला, जिससे भी ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को कोई सहारा नहीं मिल सका।
येन के मुकाबले डॉलर 155 के करीब और सोने में नरमी
मुद्रा बाजार में एक अन्य प्रमुख हलचल अमेरिकी डॉलर और जापानी येन के बीच देखी गई, जहां यह जोड़ी मंगलवार की सुबह 155.00 के स्तर की ओर बढ़ती हुई नजर आई। कारोबारी इस सप्ताह होने वाली अमेरिकी फेडरल रिजर्व और बैंक ऑफ जापान दोनों की महत्वपूर्ण बैठकों के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। फेड द्वारा दरों में संभावित बढ़ोतरी के दांव और तेल से जुड़े महंगाई के जोखिमों ने अमेरिकी डॉलर को लगातार मजबूत बनाए रखा है। फिर भी, यदि बैंक ऑफ जापान अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य करने की दिशा में सख्त रुख अपनाता है, तो इससे येन को समर्थन मिल सकता है और डॉलर की तेजी पर कुछ ब्रेक लग सकता है।
वहीं दूसरी तरफ, कीमती धातुओं के बाजार में सोने के भाव में लगातार दूसरे कारोबारी दिन गिरावट दर्ज की गई। मंगलवार को यूरोपीय सत्र के पहले हिस्से में सोने की कीमतें करीब 0.80 प्रतिशत गिरकर 4,265 से 4,264 डॉलर प्रति औंस के दायरे में कारोबार करती देखी गईं। सर्राफा बाजार में यह गिरावट सोमवार को दर्ज किए गए एक महीने से अधिक के निचले स्तर के बेहद नजदीक है। निवेशक आज से शुरू हो रही अमेरिकी केंद्रीय बैंक की दो दिवसीय नीतिगत बैठक के फैसलों को लेकर सतर्क हैं, जिससे सोने की मांग पर प्रत्यक्ष असर पड़ रहा है।



















