अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार के शुरुआती एशियाई कारोबार के दौरान अमेरिकी डॉलर के मुकाबले इंडोनेशियाई रुपिया में सुधार देखने को मिला है। पिछले सत्र में बढ़त हासिल करने के बाद अमेरिकी डॉलर बनाम इंडोनेशियाई रुपिया यानी USD/IDR जोड़ी अपने हालिया मुनाफे को गंवाती नजर आई और यह 17,910 के स्तर के आसपास कारोबार कर रही थी। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा आगामी मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत ब्याज दरों में और सख्ती किए जाने की संभावनाओं में आई कमी ने डॉलर पर दबाव डाला है, जिसका सीधा सहारा उभरते एशियाई बाजारों की मुद्राओं को मिला है। सीएमई फेडवॉच टूल के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय बाजारों में कारोबारी अक्टूबर महीने की बैठक में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की करीब 28 प्रतिशत संभावना ही मानकर चल रहे हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और आर्थिक संकेतकों पर टिकी नजरें
डॉलर इंडेक्स में हल्की नरमी के बावजूद अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड वर्ष 2002 के बाद के अपने उच्चतम स्तरों के करीब बनी हुई है। बांड बाजार में यह मजबूती अमेरिकी अर्थव्यवस्था में जारी लचीलेपन, फेडरल रिजर्व की ओर से नीतिगत दरों को लंबे समय तक ऊंचा बनाए रखने के कयासों तथा देश के दीर्घकालिक वित्तीय घाटे और बढ़ते कर्ज के स्तर को लेकर बढ़ती चिंताओं के मिले-जुले असर से बनी हुई है। बाजार से जुड़े निवेशक और मुद्रा कारोबारी मौद्रिक नीति की भावी दिशा को समझने के लिए प्रमुख व्यापक आर्थिक संकेतकों की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। इस समय सभी की नजरें अमेरिका के आगामी गैर-कृषि पेरोल यानी नॉन-फार्म पेरोल्स डेटा पर केंद्रित हैं। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि समीक्षाधीन महीने में नई नौकरियों की संख्या घटकर 90,000 रह सकती है, जो पिछले महीने के 162,000 के आंकड़े की तुलना में एक स्पष्ट सुस्ती को दर्शाती है। वहीं दूसरी ओर, बेरोजगारी दर 4.1 प्रतिशत पर स्थिर रहने का अनुमान लगाया गया है।
इंडोनेशिया में खाद्य महंगाई और मौद्रिक नीति का परिदृश्य
दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इंडोनेशिया के भीतर बैंक इंडोनेशिया ने घरेलू मुद्रा पर बने दबाव के पीछे वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही देश में सितंबर महीने की महंगाई दर बढ़कर तीन महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। आईएनजी की एशिया रिसर्च टीम के विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में इंडोनेशिया में कुल मूल्य दबाव और बढ़ सकता है। उनका अनुमान है कि अल नीनो के प्रभाव से खाद्य पदार्थों की कीमतों में तेजी आने के कारण इंडोनेशिया की उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई मुद्रास्फीति सालाना आधार पर 3.3 प्रतिशत तक तेज हो सकती है। विश्लेषकों ने स्पष्ट किया कि चावल की बढ़ती कीमतें इस तेजी का मुख्य चालक बनी रहेंगी, जबकि खाद्य लागत में होने वाली वृद्धि का असर कोर महंगाई तक फैलने की आशंका है, जिससे देश में अंतर्निहित मुद्रास्फीति दबावों का दायरा और विस्तृत हो सकता है।
मुद्रास्फीति और विनिमय दर के बीच का आर्थिक गणित
मुद्रास्फीति किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की एक प्रतिनिधि टोकरी की कीमतों में होने वाली आम बढ़ोतरी को मापती है। हेडलाइन मुद्रास्फीति को आमतौर पर महीने-दर-महीने और साल-दर-साल प्रतिशत बदलाव के रूप में व्यक्त किया जाता है। इसके विपरीत, कोर मुद्रास्फीति में भोजन और ईंधन जैसे अधिक उतार-चढ़ाव वाले घटकों को बाहर रखा जाता है, जिनकी कीमतें मौसमी बदलावों और भू-राजनीतिक तनावों के कारण तेजी से बदलती हैं। अर्थशास्त्री और नीति निर्माता कोर मुद्रास्फीति के आंकड़ों पर अधिक ध्यान देते हैं क्योंकि दुनिया भर के अधिकांश केंद्रीय बैंकों का प्राथमिक लक्ष्य महंगाई को एक प्रबंधनीय दायरे में रखना होता है, जो आमतौर पर 2 प्रतिशत के आसपास माना जाता है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई समय के साथ आम उपभोग की वस्तुओं की कीमतों में होने वाले अंतर को ट्रैक करता है।
जब कोर सीपीआई दर केंद्रीय बैंक के निर्धारित 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो उसे नियंत्रित करने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती है, और इसके विपरीत जब यह लक्ष्य से नीचे गिरती है तो दरों में कटौती का रास्ता खुलता है। वित्तीय बाजारों के दृष्टिकोण से सामान्य नियम यह है कि उच्च ब्याज दरें किसी मुद्रा के आकर्षण को बढ़ाती हैं, इसलिए बढ़ती महंगाई अक्सर मजबूत मुद्रा का कारण बनती है। हालांकि यह पहली नजर में विरोधाभासी लग सकता है, लेकिन उच्च मुद्रास्फीति वाले देश का केंद्रीय बैंक जब दरों में वृद्धि करता है, तो यह वैश्विक निवेशकों को बेहतर रिटर्न की तलाश में अपनी पूंजी वहां लगाने के लिए आकर्षित करता है, जिससे विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ता है और स्थानीय मुद्रा को मजबूती मिलती है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति घटती है तो कम ब्याज दरों के कारण मुद्रा कमजोर हो सकती है।
सोने के बाजार और ब्याज दरों का समीकरण
पारंपरिक तौर पर सोने को उच्च मुद्रास्फीति के दौर में धन के मूल्य को संरक्षित रखने वाले एक प्रमुख सुरक्षित निवेश के रूप में देखा जाता रहा है। गंभीर बाजार उथल-पुथल या संकट के समय निवेशक अक्सर पूंजी की सुरक्षा के लिए पीली धातु की ओर रुख करते हैं, लेकिन सामान्य आर्थिक चक्रों में स्थिति इसके विपरीत हो सकती है। इसका कारण यह है कि जब महंगाई बहुत अधिक बढ़ जाती है, तो केंद्रीय बैंक उससे निपटने के लिए ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी करते हैं। बढ़ी हुई ब्याज दरें सोने के लिए नकारात्मक साबित होती हैं क्योंकि वे ब्याज देने वाले बांड्स या नकद जमा खातों की तुलना में बिना ब्याज वाली संपत्ति जैसे सोना रखने की अवसर लागत को बढ़ा देती हैं। इसके विपरीत, मुद्रास्फीति में कमी सोने के लिए सकारात्मक मानी जाती है क्योंकि इससे ब्याज दरें नीचे आती हैं और यह कीमती धातु निवेशकों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन जाती है। एशियाई कारोबार में सोने की कीमतें कई प्रयासों के बावजूद 4,200 डॉलर के स्तर को दोबारा हासिल करने में विफल रहने के बाद लाल निशान में कारोबार करती दिखीं, जहां व्यापारी गैर-कृषि पेरोल आंकड़ों की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
वैश्विक मुद्राओं और अन्य परिसंपत्तियों की स्थिति
विदेशी मुद्रा बाजार में अन्य प्रमुख जोड़ियों में भी डॉलर की चाल के अनुरूप फेरबदल दर्ज किया गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर शुक्रवार के एशियाई सत्र में वापसी करते हुए अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.6950 के स्तर की ओर बढ़ा। व्यापारियों द्वारा अहम अमेरिकी रोजगार रिपोर्ट से पहले मुनाफावसूली करने के कारण अमेरिकी डॉलर 17 महीने के उच्चतम स्तर से पीछे हटा है। वहीं दूसरी तरफ, बढ़ती वैश्विक यील्ड और मुद्रास्फीति के जोखिमों के बीच नवंबर महीने में ब्याज दर वृद्धि की पुनर्जीवित उम्मीदों से ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को समर्थन मिला। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी USD/JPY जोड़ी टोक्यो के अप्रत्याशित रूप से गर्म सीपीआई आंकड़ों और व्यापक डॉलर नरमी के बाद 158.00 के करीब नई दिशा तलाशने के लिए संघर्ष करती नजर आई। इसके अतिरिक्त, वैकल्पिक डिजिटल परिसंपत्तियों में पाई नेटवर्क की कीमत में अस्थिरता बनी रही, जो पिछले सत्र में 3 प्रतिशत से अधिक की गिरावट के बाद 0.0900 डॉलर के स्तर के आसपास मंडराती रही और चार घंटे के चार्ट पर राइजिंग वेज पैटर्न के टूटने के जोखिम के साथ 0.1000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे सीमित रही।


















