पूर्वोत्तर के कई इलाकों में पारंपरिक बाजरे की खेती एक बार फिर रफ्तार पकड़ रही है। स्थानीय किसान और ग्रामीण आजीविका के नए अवसर पैदा करने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों के साथ-साथ नए उत्पादों पर जोर दे रहे हैं। अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' की 139वीं कड़ी के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात का जिक्र किया।
मेघालय के गांवों में नए उत्पादों की शुरुआत
मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में, प्रधानमंत्री ने खंडुली गांव की दो महिलाओं के प्रयासों की विशेष सराहना की जिन्होंने बाजरे से मूल्य वर्धित उत्पाद तैयार किए हैं। उनकी इस पहल के कारण बाजरे का उपयोग केवल पारंपरिक भोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे कुकीज़, केक, मफिन और बेबी फूड जैसे उत्पाद भी बनने लगे हैं। इन उत्पादों के बाजार में आने से बिक्री में इजाफा हुआ और बाजरे की मांग में तेजी आई, जिससे किसानों को एक बार फिर से इस फसल की खेती करने का प्रोत्साहन मिला।
प्रधानमंत्री ने बताया कि स्थानीय खान-पान की संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान होने के बावजूद इस गांव में बाजरे की खेती कम हो गई थी। इसके अलावा, उन्होंने पश्चिम गारो हिल्स के सदोलपारा गांव के एक किसान चेक्जिग संगमा का उदाहरण भी दिया, जिन्होंने बाजरे की खेती के लिए आधुनिक तरीकों को अपनाया है। इस कदम से उनकी आमदनी में सुधार हुआ है और स्थानीय लोगों के बीच इस फसल के प्रति जागरूकता भी बढ़ी है।
नागालैंड में एक दशक बाद वापसी
दूसरी ओर, नागालैंड के कोहिमा जिले में स्थित केजोमा गांव के लोगों ने एक बार फिर बाजरे की खेती को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया है। यहां एक दशक से अधिक समय से इस फसल की खेती बंद पड़ी थी। प्रधानमंत्री ने जानकारी दी कि इस गांव में साल 2024 में खेती की दोबारा शुरुआत हुई और इसके बाद साल 2025 में गांव का पहला बाजरा महोत्सव आयोजित किया गया। तब से लेकर अब तक इस क्षेत्र में बाजरे से बने उत्पादों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।
वैश्विक स्तर पर श्री अन्न का प्रसार
प्रधानमंत्री ने इन सभी विकास कार्यों को भारत की उस वैश्विक पहल से जोड़ा जिसके तहत बाजरे को 'श्री अन्न' के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत के प्रयासों से साल 2023 को अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष के रूप में मनाया गया था, जिसे दुनिया भर से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। इससे इस प्राचीन अनाज के सांस्कृतिक और पोषण संबंधी महत्व के बारे में लोगों की समझ और जागरूकता फिर से मजबूत हुई है।
प्रधानमंत्री का मानना है कि मेघालय और नागालैंड के इन अनुभवों से यह साफ हो जाता है कि किस तरह युवा पीढ़ी पारंपरिक कृषि ज्ञान और उद्यमिता को आपस में जोड़कर स्थानीय विरासत को सुरक्षित रखते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे सकती है।


















