अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी उथल-पुथल, कूटनीतिक तनाव और नाइंसाफी के माहौल के बीच अमन और इंसाफ की वकालत करने वाली हस्तियों को सम्मानित करने वाला नोबेल शांति पुरस्कार समूची मानवता के लिए एक बड़ा संबल माना जाता है. दक्षिण अफ्रीका की विख्यात मानवाधिकार पैरोकार और न्यायविद् नावी पिल्लई को इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजे जाने की हालिया घोषणा ने एक बार फिर इस सर्वोच्च सम्मान की ऐतिहासिक अहमियत को केंद्र में ला दिया है. नावी पिल्लई का जुड़ाव सीधे तौर पर भारत से भी रहा है, क्योंकि उनके पूर्वज लगभग 136 वर्ष पूर्व तमिलनाडु की धरती से जाकर दक्षिण अफ्रीका में बस गए थे. उन्होंने रंगभेद के दौर में नेल्सन मंडेला समेत अनेक सेनानियों के अधिकारों की अदालती लड़ाई लड़ी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पीड़ितों की मुखर आवाज बनीं. यह सफर महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के उसी दर्शन की याद दिलाता है, जिसकी शुरुआत गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका की जमीन पर सत्याग्रह के जरिए की थी.
अल्फ्रेड नोबेल का विजन और 1901 में हुई ऐतिहासिक शुरुआत
इस वैश्विक सम्मान की नींव स्वीडन के विख्यात वैज्ञानिक, आविष्कारक और उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की अंतिम इच्छा और वसीयत पर टिकी है. उन्होंने अपने जीवनकाल में अर्जित अकूत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा एक विशेष ट्रस्ट के लिए सुरक्षित रख दिया था. उनकी स्पष्ट मंशा थी कि इस सुरक्षित कोष से मिलने वाले लाभ से प्रतिवर्ष उन लोगों को सम्मानित किया जाए, जिन्होंने बीते वर्ष के दौरान मानव जाति के व्यापक कल्याण और प्रगति में सबसे असाधारण योगदान दिया हो. इसी संकल्प के आधार पर वर्ष 1901 में पहली बार नोबेल पुरस्कारों के वितरण का सिलसिला शुरू हुआ था.
साल 1901 में जब इतिहास का पहला नोबेल शांति पुरस्कार घोषित हुआ, तब इसे दो असाधारण शख्सियतों को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया था. इनमें स्विट्जरलैंड के विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और प्रतिष्ठित संस्था ‘रेड क्रॉस’ के संस्थापक हेनरी ड्यूनांट शामिल थे. उनके साथ ही फ्रांस के प्रमुख अर्थशास्त्री और अंतरराष्ट्रीय शांति आंदोलन के मुखर पैरोकार फ्रेडरिक पैसी को भी इस पहले सम्मान का भागीदार बनाया गया था. इन दोनों विचारकों ने युद्ध और संघर्ष की विभीषिका के बीच मानवीय गरिमा को बचाने के लिए अभूतपूर्व संस्थागत प्रयास किए थे.
विजेताओं को मिलने वाले तीन मुख्य उपहार
दुनियाभर के लोगों में यह जानने की गहरी उत्सुकता रहती है कि वैश्विक शांति के इस शिखर सम्मान के साथ विजेताओं को वास्तव में क्या-क्या सौंपा जाता है. नोबेल फाउंडेशन द्वारा प्रत्येक नोबेल विजेता को औपचारिक रूप से तीन विशिष्ट वस्तुएं प्रदान की जाती हैं
- 18 कैरेट सोने का मेडल: विजेता को 18 कैरेट के रीसाइकल्ड हरे सोने से निर्मित एक अत्यंत नक्काशीदार और खूबसूरत पदक दिया जाता है. इस ऐतिहासिक मेडल पर अल्फ्रेड नोबेल की छवि उकेरी होती है और साथ ही अमन का वैश्विक संदेश अंकित रहता है.
- हस्तनिर्मित डिप्लोमा प्रमाण पत्र: विजेताओं को स्वीडन के राजा के करकमलों से एक विशेष रूप से तैयार हस्तनिर्मित डिप्लोमा दिया जाता है. कलात्मक रूप से डिजाइन किए गए इस प्रमाण पत्र पर संबंधित विजेता की विशिष्ट उपलब्धियों और योगदान का आधिकारिक विवरण अंकित होता है.
- करोड़ों रुपये की नकद राशि: नोबेल फाउंडेशन की ओर से हर साल विजेताओं को एक विशाल नकद राशि प्रदान की जाती है. यह धनराशि फाउंडेशन के ट्रस्ट फंड के वार्षिक निवेश रिटर्न और वित्तीय स्थिति के आधार पर समय-समय पर निर्धारित होती है.
पुरस्कार राशि का गणित और उसके बंटवारे के नियम
नोबेल फाउंडेशन के आधिकारिक ऐलान के अनुसार, मौजूदा समय में प्रत्येक नोबेल पुरस्कार के लिए कुल पुरस्कार राशि 1.2 करोड़ स्वीडन क्रोना (SEK 12 million) तय की गई है. यदि इस विशाल रकम को भारतीय मुद्रा (INR) में आंका जाए, तो यह राशि 11.5 करोड़ रुपये से भी अधिक बैठती है.
इस भारी-भरकम राशि के वितरण और उपयोग को लेकर फाउंडेशन के बेहद स्पष्ट नियम स्थापित हैं. जब शांति पुरस्कार या किसी अन्य श्रेणी का सम्मान संयुक्त रूप से दो अथवा तीन व्यक्तियों या संगठनों को दिया जाता है, तो यह पूरी राशि उन सभी विजेताओं के बीच बराबर या पूर्व-निर्धारित अनुपात में विभाजित कर दी जाती है. पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति या संस्थाएं इस वित्तीय सहायता का उपयोग आमतौर पर अपने सामाजिक अभियानों, स्वतंत्र शोध कार्यों, मानवाधिकारों की रक्षा और शिक्षा के प्रसार से जुड़ी पहलों को आगे बढ़ाने में करते हैं.
तमिलनाडु से प्रिटोरिया तक: नावी पिल्लई का संघर्ष और गांधीवादी विरासत
दक्षिण अफ्रीका की मिट्टी से निकलकर वैश्विक कानून और मानवाधिकारों के सर्वोच्च मंचों पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली नावी पिल्लई को यह सम्मान मिलना भारत और दक्षिण अफ्रीका दोनों के लिए गौरव का क्षण है. उनके दादा-परदादा लगभग 136 वर्ष पहले तमिलनाडु से प्रवास कर दक्षिण अफ्रीका पहुंचे थे. दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के क्रूर दौर में जब अश्वेत नागरिकों को बुनियादी इंसानी हकों से वंचित किया जा रहा था, तब नावी पिल्लई ने अदालत के भीतर नेल्सन मंडेला और अन्य संघर्षरत कार्यकर्ताओं के अधिकारों की निर्भीक वकालत की थी.
महात्मा गांधी ने भी दक्षिण अफ्रीका की धरती पर ही रंगभेद और दमन के खिलाफ अपने पहले सत्याग्रह के हथियार को तराशा था. उसी ऐतिहासिक भूमि पर न्याय के सिद्धांतों को मजबूत करते हुए नावी पिल्लई ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पीड़ित वर्गों की कानूनी लड़ाई लड़ी. अल्फ्रेड नोबेल के शांति संदेश से लेकर नावी पिल्लई के आधुनिक मानवाधिकार संघर्ष तक, यह सम्मान निरंतर यह याद दिलाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी शांति और न्याय के लिए अडिग रहने वालों का योगदान अमर रहता है.





















