देश भर में एक साथ चुनाव कराने से जुड़े प्रस्तावित मसौदे पर सुप्रीम कोर्ट के रुख को लेकर चल रहे विवाद पर विराम लग गया है। सर्वोच्च अदालत के प्रशासन ने औपचारिक तौर पर स्पष्ट किया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश या अन्य किसी न्यायाधीश की संयुक्त संसदीय समिति के साथ ऐसी कोई बैठक तय नहीं है। इस स्पष्टीकरण के आने से पहले इस तरह के संवाद को लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ गई थी।
कपिल सिब्बल ने उठाए थे बैठक के औचित्य पर सवाल
इस पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई जब वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए एक दावा पेश किया। उन्होंने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने की रूपरेखा तैयार कर रही संसद की संयुक्त समिति आगामी 6 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से विचार-विमर्श करने की योजना बना रही है। सिब्बल ने प्रस्तावित वार्ता को पूरी तरह अभूतपूर्व बताते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया था।
वरिष्ठ वकील ने इस कदम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान में निहित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ बताया। उन्होंने तर्क दिया कि संसद की समिति जिन विधायी मसौदों की जांच कर रही है, वे भविष्य में कानून का रूप लेने के बाद न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे में कानून बनने से पूर्व ही जजों के साथ इस तरह का संवाद स्थापित करना कानूनी परंपराओं के अनुकूल नहीं है।
जांच के दायरे में आए दोनों प्रमुख विधेयक
संबंधित संसदीय समिति दरअसल संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की बारीकियों का अध्ययन कर रही है। इन दोनों विधेयकों का प्राथमिक उद्देश्य पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित कराने का कानूनी ढांचा तैयार करना है। कपिल सिब्बल का कहना था कि जब समिति ने अभी अपनी अंतिम रिपोर्ट भी तैयार नहीं की है, तब शीर्ष अदालत के जजों को मसौदे की शर्तों की जानकारी देने के नाम पर समय मांगना समझ से परे है।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया था कि क्या अदालत ने ऐसे किसी आमंत्रण को स्वीकार किया था, जबकि यह मसला देश की संवैधानिक व्यवस्था और शासन प्रणाली के बुनियादी ढांचे से गहराई से जुड़ा हुआ है।
प्रशासन के बयान से अटकलों का पटाक्षेप
वरिष्ठ अधिवक्ता की आपत्तियों के सामने आने के फौरन बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने स्थिति को पूरी तरह साफ कर दिया। प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मुख्य न्यायाधीश अथवा सर्वोच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों के साथ संयुक्त संसदीय समिति की कोई बैठक आयोजित नहीं की जा रही है। इस खंडन के बाद उन सभी कयासों पर पूर्ण विराम लग गया है जिनमें न्यायपालिका और संसदीय समिति के बीच औपचारिक विचार-विमर्श होने की बात कही जा रही थी।





















