हवाई सफर के दौरान जब कॉकपिट संभालने वाले पेशेवर ही अप्रत्याशित जोखिम पैदा करने लगें, तो यह पूरी दुनिया को स्तब्ध कर देता है। हालिया दिनों में फ्लाईदुबई के एक विमान में उस समय बेहद गंभीर स्थिति पैदा हो गई जब ओमान के को-पायलट ने 174 यात्रियों की जिंदगी को दांव पर लगाते हुए विमान पर नियंत्रण हासिल करने का खतरनाक प्रयास किया। उस विकट परिस्थिति में भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार ने अदम्य साहस का परिचय दिया और खुद जोखिम उठाकर उस प्रयास को विफल कर दिया। हालांकि, विमानन जगत में अच्छी शिक्षा और वैश्विक अनुभव के बाद भटकाव का यह कोई अकेला मामला नहीं है। लगभग तीन दशक पहले, अमेरिका से वाणिज्यिक पायलट की ट्रेनिंग हासिल कर चुके कश्मीर के नदीम खतीब ने भी अपने शानदार करियर को तिलांजलि देकर अल-बद्र नामक आतंकी संगठन की राह चुन ली थी।
कॉकपिट का सपना और अमेरिका में प्रशिक्षण का सफर
नदीम खतीब की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो उसका जन्म 1967 में श्रीनगर में हुआ था। उसके पिता इनायतुल्लाह खतीब एक सम्मानित सरकारी इंजीनियर थे, जिससे परिवार को एक स्थिर और प्रतिष्ठित सामाजिक परिवेश मिला। नदीम ने अपनी शुरुआती स्कूली शिक्षा श्रीनगर के प्रतिष्ठित टिंडेल बिस्को स्कूल से पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके मन में आसमान नापने की चाह जगी और उसने वैमानिकी के क्षेत्र में अपना भविष्य तलाशना शुरू किया।
साल 1990 के शुरुआती दशक में अपने सपनों को पंख लगाने के लिए नदीम खतीब अमेरिका पहुंचा। वहां जॉर्जिया स्थित एक प्रसिद्ध फ्लाइंग स्कूल में उसने दाखिला लिया और कमर्शियल पायलट बनने का कड़ा प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा किया। उसकी योग्यता केवल एक शिक्षार्थी तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उसी संस्थान में फ्लाइट इंस्ट्रक्टर की जिम्मेदारी भी संभाली। वह अन्य छात्रों को विमान उड़ाने की बारीकियां सिखा रहा था। यह एक ऐसा रुतबा और पेशेवर मुकाम था, जिसकी हसरत दुनिया भर के हजारों युवा रखते हैं।
सपनों की उड़ान छोड़कर उठाया हथियारों का बोझ
अमेरिका में एक सफल पेशेवर जीवन बिताने के बावजूद, धीरे-धीरे नदीम खतीब का वैचारिक रुझान चरमपंथी इस्लामी विचारों की ओर झुकने लगा। हालांकि उसके भीतर इस तरह के मानसिक बदलाव की व्यक्तिगत प्रक्रिया से जुड़े सार्वजनिक दस्तावेज बेहद सीमित हैं, लेकिन इसका परिणाम बेहद चौंकाने वाला रहा। एक दिन उसने अमेरिका की चमक-दमक भरी जिंदगी को अलविदा कह दिया और सीधे पाकिस्तान पहुंच गया।
उपलब्ध विवरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि पाकिस्तान पहुंचकर वह जम्मू-कश्मीर में सशस्त्र उग्रवाद से जुड़े संगठन अल-बद्र का हिस्सा बन गया। वहां उसने नियमित आतंकी शिविरों में अत्याधुनिक हथियार चलाने का कड़ा प्रशिक्षण हासिल किया। हथियार चलाने की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह जम्मू-कश्मीर लौट आया और सक्रिय सशस्त्र गतिविधियों में शामिल हो गया। जिस हाथ में कभी विमान का आधुनिक नियंत्रण तंत्र होता था, वह अब हिंसा की राह पर बढ़ चुका था।
परिवार को भनक तक नहीं लगी और बदल गई दुनिया
खतीब के जीवन का सबसे विचलित करने वाला पहलू यह रहा कि उसके अपने परिजनों को इस भयानक बदलाव की कानों-कान खबर नहीं थी। उसने अपने माता-पिता और रिश्तेदारों को यह भरोसा दिलाया था कि वह अमेरिका लौटकर किसी बड़ी एयरलाइन कंपनी में पायलट की नौकरी तलाशने जा रहा है। परिवार यही मानकर खुश था कि उनका बेटा वैमानिकी में अपने भविष्य को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।
वास्तविकता इसके ठीक उलट थी, क्योंकि जिस समय परिवार उसके एयरलाइन करियर के सपने संजो रहा था, उस समय वह पाकिस्तान में अल-बद्र के ठिकानों पर हथियारों का अभ्यास कर रहा था। यह घटना एक बहुत बड़ा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती है कि क्या माता-पिता, मित्र या समाज किसी व्यक्ति के भीतर चुपचाप पनप रहे वैचारिक बदलाव को समय रहते भांप पाने में हमेशा सक्षम होते हैं।
डिग्री और करियर: क्या ये कट्टरपंथ से बचाव की गारंटी हैं?
नादिम खतीब का यह वाकया उस आम सामाजिक धारणा को सिरे से खारिज करता है कि कट्टरपंथ या आतंकवाद का मूल कारण सिर्फ गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी ही है। खतीब उच्च शिक्षित था, उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता था, पश्चिमी देश में काम कर रहा था और उसके पास एक सुरक्षित तथा प्रतिष्ठित रोजगार था। इसके बावजूद वह हिंसा के रास्ते पर चला गया।
इसका तात्पर्य यह कतई नहीं है कि शिक्षा, रोजगार या पारिवारिक जुड़ाव का कोई महत्व नहीं होता। एक स्वस्थ सामाजिक ताना-बाना, स्थिर पारिवारिक माहौल और सम्मानजनक रोजगार कई मायनों में सुरक्षा घेरा बनते हैं, लेकिन कोई भी एक कारक चरमपंथ के खिलाफ संपूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकता। किसी भी व्यक्ति का भटकाव कई स्तरों पर काम करता है, जिसमें पहचान का संकट, राजनीतिक असंतोष, विचारधारा, व्यक्तिगत असंतोष, मनोवैज्ञानिक प्रभाव और दुष्प्रचार का संजाल एक साथ असर डाल सकते हैं।
कर्तव्य की रक्षा बनाम हिंसा का चयन
फ्लाईदुबई की हालिया घटना और दशकों पुरानी खतीब की कहानी के बीच भले ही कोई सीधा संबंध न हो, लेकिन दोनों घटनाएं एक गहरा विरोधाभास प्रस्तुत करती हैं। जब संकट सामने आया तो कैप्टन स्मित मच्छार ने अपने पेशेवर प्रशिक्षण, अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी को सर्वोपरि रखा। खुद को चोट पहुंचने के बावजूद उन्होंने 174 यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित की और विमान को बचा लिया।
दूसरी ओर, नदीम खतीब ने अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों, नागरिक कर्तव्यों और मानवीय मूल्यों को पूरी तरह त्याग कर हथियारबंद संघर्ष को अपना रास्ता बना लिया। दोनों घटनाओं के समय, व्यक्तिगत हालात और मंशाएं अलग-अलग थीं, इसलिए दोनों को एक तराजू में नहीं तौला जा सकता। फिर भी, यह बुनियादी सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर संपन्नता और बौद्धिक विकास के बावजूद इंसान कब और क्यों हिंसा की अंधेरी गलियों में कदम रख देता है।





















