सादगी, अटूट सत्यनिष्ठा और राष्ट्रभक्ति की जब भी बात छिड़ती है, भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का व्यक्तित्व सबसे आगे नजर आता है। ऐतिहासिक 1965 के युद्ध में राष्ट्र को दिशा देने वाले और ‘जय जवान, जय किसान’ जैसे प्रेरणादायी उद्घोष से जवानों व अन्नदाताओं में नया जोश भरने वाले शास्त्री जी की जीवन यात्रा हर दौर में प्रेरणा देती रही है। सत्ता के शीर्ष पर बैठने के बाद भी उनका जीवन आम नागरिक जैसा ही रहा। जब परिवार के लिए एक कार की जरूरत महसूस हुई, तब भी उन्होंने पद का प्रभाव इस्तेमाल करने के बजाय बैंक से 5,000 रुपये का ऋण लिया। सादगी का आलम यह था कि उनके निधन के बाद उनकी धर्मपत्नी ललिता देवी ने अपनी पारिवारिक पेंशन के जरिए इस कर्ज की पूरी अदायगी की।
पिता के साए के बिना गुजरा बचपन
लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था, जो वाराणसी से लगभग सात मील की दूरी पर बसा एक छोटा सा रेलवे कस्बा है। उनके पिता एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। परिवार पर उस समय गहरा संकट आ गया जब शास्त्री जी की उम्र महज डेढ़ साल थी और उनके पिता का अचानक देहांत हो गया। उस कठिन समय में उनकी माता जी की उम्र लगभग 20 वर्ष थी। पति के निधन के बाद तीनों मासूम संतानों के पालन-पोषण का भार उन पर आ गया, जिसके बाद वह अपने बच्चों को लेकर मायके यानी अपने पिता के घर चली गईं। गंभीर आर्थिक तंगहाली और सीमित साधनों के बीच लाल बहादुर का लालन-पालन हुआ।
तपती दोपहर में नंगे पैर स्कूल का सफर
प्राथमिक स्तर के बाद आगे की औपचारिक शिक्षा जारी रखने के लिए उन्हें वाराणसी में अपने चाचा के आवास पर रहना पड़ा। घर में आर्थिक संसाधन बेहद तंग थे। तेज चिलचिलाती धूप और गर्म सड़कों पर बिना जूतों या चप्पलों के नंगे पांव कई किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय जाना उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। अभावों के बीच बिताए इन वर्षों ने उनके भीतर आत्मसम्मान, संवेदनशीलता और संघर्ष करने की गजब की क्षमता विकसित की। कठिन परिस्थितियों से निकलकर वह देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, मगर अहंकार या तड़क-भड़क उनके आचरण में कभी नहीं आई।
गांधी जी के आह्वान पर स्वाधीनता समर में कदम
अल्पायु से ही उनके दिलो-दिमाग पर भारत की स्वतंत्रता की ललक छाने लगी थी। केवल 11 वर्ष की उम्र से ही वह राष्ट्रीय चेतना और आज़ादी के विमर्श से गहरे जुड़ चुके थे। जब महात्मा गांधी ने देशव्यापी असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका, उस समय लाल बहादुर की आयु केवल 16 साल थी। देश सेवा के संकल्प के आगे उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई को छोड़ दिया और सीधे आंदोलन में कूद पड़े। स्वाभाविक रूप से उनकी मां और नजदीकी परिजन इस फैसले से बेहद चिंतित थे और उन्हें समझा-बुझाकर रोकना चाहते थे। हालांकि लाल बहादुर जो निर्णय एक बार अपने अंतर्मन से ले लेते थे, उस पर अडिग रहने का स्वभाव उनका बचपन से ही था। देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने की इस राह में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत की जेलों में करीब सात वर्ष गुजारे।
सिद्धांतों के लिए पद त्यागने की नजीर
आजादी मिलने के बाद जब देश निर्माण का दौर शुरू हुआ, तब भी उन्होंने ईमानदारी और उच्च नैतिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से कभी समझौता नहीं किया। केंद्रीय रेल मंत्री के दायित्व का निर्वहन करते समय जब एक बड़ा रेल हादसा घटा, तो उन्होंने किसी और पर दोष मढ़ने के बजाय स्वयं नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए अपने पद से तत्काल इस्तीफा दे दिया। लोकतंत्र और जवाबदेही की यह मिसाल आज भी भारतीय राजनीति में अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। 2 अक्टूबर को जब देश उनकी 122वीं जयंती मना रहा है, उनका निष्कलंक जीवन हर नागरिक को कर्तव्यपरायणता और सादगी का संदेश देता है।















