राजस्थान का शेखावाटी इलाका केवल अपनी भव्य हवेलियों और स्थापत्य कला के लिए ही नहीं, बल्कि पारंपरिक जल संरक्षण के अनूठे ढांचों के लिए भी विशेष पहचान रखता है। झुंझुनू जिले के गुढ़ागौड़जी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली भोड़की ग्राम पंचायत की गिला की ढाणी में मौजूद लगभग 250 साल पुराना कुआं इसी समृद्ध अतीत का जीवंत प्रमाण है। किसी दौर में यह कुआं आसपास के तीन गांवों की पेयजल और घरेलू जरूरतों की जीवनरेखा माना जाता था। भले ही वर्तमान समय में इसमें पानी नहीं बचा है, लेकिन इसकी विशिष्ट बनावट, वास्तुकला और तकनीकी सोच आज भी ग्रामीणों और आगंतुकों को अचंभित करती है।
वर्ष 1772 के दौर से जुड़ा गिला की ढाणी का इतिहास
स्थानीय बाशिंदों के अनुसार गिला की ढाणी की बसावट वर्ष 1772 के आसपास हुई थी। बस्ती बसने से पहले ही इस सूखे रेतीले भूभाग पर जल संकट को भांपते हुए स्थानीय लोगों ने मिलकर इस कुएं का निर्माण करवा लिया था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, यह जल स्रोत गिला की ढाणी के साथ-साथ निकटवर्ती बस्तियों के लिए भी पानी का सबसे भरोसेमंद केंद्र बन गया। ग्रामीणों के मुताबिक लगभग 5 से 6 वर्ष पहले तक इस कुएं से नियमित रूप से पानी भरकर घरों की प्यास बुझाई जाती थी, जिसके बाद भूजल स्तर नीचे चले जाने से यह सूख गया।
चार दिशाओं से जल दोहन की नायाब देसी व्यवस्था
इस कुएं की इंजीनियरिंग अपने समय से काफी आगे थी। इसके चारों ओर लकड़ी के गोल पहिए यानी भूण स्थापित किए गए थे, जिनकी सहायता से एक ही समय में चारों दिशाओं से अलग-अलग लोग पानी बाहर खींच सकते थे। इस पूरी व्यवस्था को बहुत व्यावहारिक ढंग से बांटा गया था, जिसमें दो सिरों से निकाला गया पानी मवेशियों और पशुधन की जरूरतों के लिए तय था, जबकि शेष दो सिरों का पानी ग्रामीण अपने पीने और रसोई के कार्यों के लिए ले जाते थे।
जल निकासी के लिए चमड़े से निर्मित पारंपरिक थैले यानी चरस का उपयोग होता था। चरस को मजबूत रस्सियों से बांधकर कुएं की गहराई में उतारा जाता था और बैलों की ताकत से रस्सी खींचकर पानी बाहर लाया जाता था। इस विधि से एक बार में लगभग 60 से 70 लीटर पानी आसानी से बाहर आ जाता था। मवेशियों को व्यवस्थित ढंग से पानी पिलाने के लिए कुएं के ठीक बगल में विशेष पक्के स्थान और खेलियां बनाई गई थीं।
सेठ द्वारा मरम्मत और पंचायत निधि से आधुनिक जीर्णोद्धार
इतिहास के दौरान एक बार मूसलाधार बारिश के चलते कुएं का ऊपरी ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। उस समय गुढ़ागौड़जी के एक दानदाता सेठ ने आगे आकर अपनी निजी लागत से इसका जीर्णोद्धार करवाया था। कुएं की चार कलात्मक घिरनियां और सुंदर नक्काशीदार मीनारें उस काल के राजस्थानी शिल्प का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
हाल के वर्षों में जब यह संरचना काल के थपेड़ों से जर्जर होने लगी, तब स्थानीय स्तर पर इसे बचाने की मजबूत मुहिम शुरू हुई। सरपंच सरोज गिल की पहल पर ग्राम पंचायत कोष से करीब 5 लाख रुपये स्वीकृत कर इसकी मजबूत मरम्मत करवाई गई। इसके साथ ही गांव के भामाशाहों ने अपनी ओर से लगभग 1 लाख रुपये का योगदान देकर इसके रंग-रोगन और सौंदर्य को नया रूप दिया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि भले ही अब यह पानी का जरिया न रहा हो, लेकिन यह उनके पूर्वजों के श्रम, संस्कृति और पहचान का प्रतीक है, जिसे आने वाली पीढ़ियों के लिए धरोहर के रूप में संजोया गया है।





















