पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान को लेकर केंद्र सरकार की मौजूदा कूटनीतिक नीति पर सवाल उठाते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने द्विपक्षीय बातचीत तुरंत बहाल करने की वकालत की है। उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार के रुख की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि जब सीमा पार सैन्य कार्रवाई करने का साहस दिखाया जा सकता है, तो फिर लंबित मामलों के समाधान के लिए आमने-सामने बैठकर चर्चा करने में हिचकिचाहट क्यों है। उनके अनुसार, केवल पुराने विवादों पर बहस करते रहना कूटनीति का हिस्सा नहीं हो सकता।
सीमा पार संवाद की बहाली पर जोर
मणिशंकर अय्यर ने दोनों देशों के रिश्तों में संवादहीनता पर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि भारत के पास सर्जिकल स्ट्राइक करने का हौसला है, लेकिन बातचीत की मेज पर आने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आ रही। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि कूटनीति का असली मकसद दुश्मनी बढ़ाना नहीं, बल्कि मैत्रीपूर्ण रिश्ते कायम करना होना चाहिए।
उन्होंने सांस्कृतिक और ऐतिहासिक निकटता की ओर इशारा करते हुए पूछा कि क्या दुनिया में ऐसा कोई अन्य देश मौजूद है, जिसके साथ भारत के लोग पाकिस्तान से अधिक सहज महसूस कर सकें। इसी तरह उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के लिए भी दुनिया में ऐसा कोई दूसरा मुल्क नहीं है, जिसके साथ वह भारत से अधिक सहजता और स्वाभाविकता के साथ चर्चा कर सके।
अटारी-वाघा सीमा पर वार्ता का अनूठा प्रस्ताव
पूर्व में दोनों देशों के बीच चली विभिन्न वार्ता प्रक्रियाओं को याद दिलाते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे के मुल्क का दौरा करने का साहस दिखाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर किसी प्रतिनिधिमंडल को दूसरे देश की जमीन पर जाने में असहजता महसूस होती है, तो अटारी-वाघा सीमा पर ही बातचीत की व्यवस्था की जा सकती है।
इस प्रस्ताव का ब्योरा देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देशों की सीमा रेखा पर एक मेज लगाई जा सकती है। इस व्यवस्था से पाकिस्तानी दल को पाकिस्तान से बाहर पैर रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी और भारतीय दल को भारत की सीमा लांघने की आवश्यकता नहीं होगी। उनका मुख्य जोर इस बात पर रहा कि किसी भी परिस्थिति में दोनों पक्षों के बीच संवाद का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए।
लंबित विवादों और अमेरिका-रूस का उदाहरण
वार्ता के स्वरूप पर चर्चा करते हुए मणिशंकर अय्यर ने कहा कि लगातार बातचीत के जरिए ही यह साफ हो सकता है कि किन मसलों का हल फौरन मुमकिन है और किन विवादों में वक्त लगेगा। जिन मुद्दों पर सहमति बन जाए, उन पर तत्काल अमल शुरू होना चाहिए। वहीं जिन विषयों पर असहमति बनी रहे, उन्हें यह कहकर कुछ समय के लिए टाला जा सकता है कि अभी इन पर एक राय नहीं बन पा रही है, लेकिन चर्चा जारी रहेगी। जब राजनीतिक और कूटनीतिक माहौल बदलेगा, तब उन बाकी बचे मामलों पर दोबारा बात की जा सकती है।
उन्होंने ऐतिहासिक कूटनीति की मिसाल देते हुए कहा कि किसी भी सार्थक नतीजे तक पहुंचने का इकलौता जरिया बातचीत ही है, भले ही इसमें लंबा समय क्यों न लगे। उन्होंने ध्यान दिलाया कि शीत युद्ध के दौर में भी अमेरिकियों ने रूसियों के साथ कूटनीतिक संबंध कभी पूरी तरह खत्म नहीं किए और न ही आपस में बातचीत बंद की। समझदार मुल्क हमेशा आपस में चर्चा का रास्ता खुला रखते हैं, जबकि संवाद बंद करने का फैसला विवेकपूर्ण नहीं होता।
राष्ट्रीय राजनीति और जम्मू-कश्मीर की स्थिति
देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर बात करते हुए मणिशंकर अय्यर ने दावा किया कि मौजूदा राजनीतिक माहौल की कमियों को दूर करना बेहद आसान है। उन्होंने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती के उस बयान का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कश्मीर के लोगों को एकजुट होने की नसीहत दी थी। महबूबा मुफ्ती ने कहा था कि जब तक कश्मीर के सभी लोग एक स्वर में एकजुट नहीं होंगे, तब तक अलग-अलग नेताओं के दिल्ली जाने का केंद्र पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।
अय्यर ने स्पष्ट किया कि यही सिद्धांत पूरे देश की राजनीति पर भी लागू होता है। उनका मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव तभी मुमकिन है, जब सभी गैर-हिंदुत्व राजनीतिक दल आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आएं। उन्होंने कहा कि अगर उनकी विचारधारा के लोग दिल्ली की सत्ता में होते, तो जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा वापस मिल चुका होता। इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि ऐसी स्थिति में संभवतः थोड़े बदले हुए स्वरूप में अनुच्छेद 370 और 35ए की वापसी भी हो सकती थी। उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा कि आगे बढ़ने के लिए असहमति रखने वाले दलों का एकजुट होना जरूरी है, क्योंकि ऐसी एकता ही पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की नई पहल की नींव रख सकती है।


















