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मक्का रक्षा समझौते का विस्तार कर ईरान को जोड़ने की संभावना पर पाकिस्तानी सेना ने दिया बयानपाकिस्तान
31 अक्तू॰ 2026, 6:44 am (1 घंटे पहले)· 0

मक्का रक्षा समझौते का विस्तार कर ईरान को जोड़ने की संभावना पर पाकिस्तानी सेना ने दिया बयान

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने स्पष्ट किया है कि सऊदी अरब और तुर्की के साथ हुए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते में ईरान समेत अन्य देशों के शामिल होने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।

पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के चलते गहराते तनाव के बीच क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। सऊदी अरब और तुर्की के साथ मिलकर तैयार किए गए मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के दायरे को व्यापक बनाने को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इस बहुपक्षीय सुरक्षा तंत्र को नाटो की कार्यप्रणाली के अनुरूप एक बड़े इस्लामिक रक्षा गठबंधन के रूप में विकसित करने की दिशा में संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। इस व्यवस्था की सबसे अहम बात यह सामने आई है कि समझौते के नियमों में अन्य संप्रभु राष्ट्रों के प्रवेश को लेकर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई गई है, जिसका सीधा अर्थ यह निकाला जा रहा है कि यदि ईरान जैसे देश भी इसके साझा उद्देश्यों से सहमति जताते हैं, तो उनके लिए इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होने के विकल्प खुले रह सकते हैं।

समझौते की रूपरेखा और नए सदस्यों के प्रवेश के नियम

पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने एक साक्षात्कार के दौरान इस बात की पुष्टि की कि मक्का रक्षा दस्तावेज किसी नए देश के प्रवेश को प्रतिबंधित नहीं करता है। जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या मौजूदा भू-राजनीतिक हालात में ईरान को भी इस समझौते में शामिल किया जा सकता है, तो उन्होंने दस्तावेज की मूल भावना का उल्लेख किया। चौधरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा,

"अगर आप मक्का समझौते को ध्यान से पढ़ें, तो इसमें किसी के शामिल होने या न होने पर कोई रोक नहीं है।"
उन्होंने आगे अपनी बात रखते हुए रेखांकित किया कि जो भी राष्ट्र सामूहिक निवारक क्षमता और क्षेत्रीय स्थिरता के साझा विजन पर विश्वास रखता है, उसका इस पहल में स्वागत किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह संवैधानिक स्थिति भी साफ कर दी कि समझौते का भौगोलिक या सामरिक दायरा बढ़ाने का अंतिम फैसला तीनों मूल सदस्य देशों पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व के विवेक और औपचारिक सहमति पर ही निर्भर रहेगा।

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता और इसका सामूहिक सुरक्षा मॉडल

तीनों देशों ने 7 अगस्त को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर औपचारिक रूप से दस्तखत किए थे। इस ऐतिहासिक संधि का केंद्रीय आधार सामूहिक सुरक्षा की वह धारा है, जिसके तहत यदि तीनों सदस्य देशों में से किसी एक पर भी सैन्य हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर संयुक्त हमला माना जाएगा। इस सुरक्षा समझौते का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में किसी भी बाहरी आक्रामकता को रोकना और सामूहिक सैन्य निवारक तैयार करना है। पश्चिम एशिया में जारी ईरान युद्ध के व्यापक होने के बाद इस गठबंधन का रणनीतिक महत्व कई गुना बढ़ गया है। पूरे खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष की आग फैल रही है और यमन के हूती विद्रोही अब सीधे तौर पर सऊदी अरब की सीमाओं और ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। हूतियों की ओर से बढ़ते हमलों के बाद ही यह विमर्श गहराया है कि क्या व्यापक सुरक्षा छतरी तैयार करने के लिए अन्य पड़ोसी मुल्कों को भी इस संधि का साझीदार बनाया जाना चाहिए।

तेहरान में कूटनीतिक सक्रियता और शांति वार्ता की कोशिशें

इस पूरे सुरक्षा मंथन के बीच तेहरान में उच्चस्तरीय कूटनीतिक हलचल भी तेज हुई है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर इसी महीने दूसरी बार ईरान की राजधानी तेहरान पहुंचे। इस अहम मिशन पर उनके साथ सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और तुर्की की राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन भी मौजूद रहे। तीनों देशों के इस संयुक्त उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी दर्शाती है कि पर्दे के पीछे बड़े कूटनीतिक प्रयास चल रहे हैं। पाकिस्तानी सेना ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता की मेज तैयार करने की अपनी मध्यस्थता पहलों को लेकर सतर्कतापूर्वक आशावादी रुख अपना रही है। लेफ्टिनेंट जनरल चौधरी के अनुसार, शीर्ष सैन्य नेतृत्व का इतने कम समय में दो बार ईरान का दौरा करना यह साबित करता है कि इसके पीछे कोई सकारात्मक और ठोस प्रगति चल रही है। इसके साथ ही उन्होंने सचेत किया कि भू-राजनीति में कुछ बेहद प्रभावशाली ताकतें ऐसी भी मौजूद हैं जिनका निजी स्वार्थ खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष के अनवरत जारी रहने में है, और ऐसे तत्व शांति बहाली के प्रयासों को पटरी से उतारने की पूरी कोशिश कर सकते हैं।

सऊदी अरब की संप्रभुता और सैनिकों की तैनाती पर दृष्टिकोण

सऊदी अरब के भूभाग पर अतिरिक्त पाकिस्तानी सैनिकों की संभावित तैनाती के मुद्दे पर सैन्य प्रवक्ता ने बताया कि इस प्रकार के कदम विशुद्ध रूप से तात्कालिक परिस्थितियों की गंभीरता और दोनों सरकारों की आपसी राजनीतिक सहमति के आधार पर तय किए जाते हैं। उन्होंने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और इस्लामी आस्था के सर्वोच्च केंद्रों मक्का और मदीना की सुरक्षा के प्रति अपनी पुरानी प्रतिबद्धता को दोहराया। यमन के संकट पर स्थिति स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि पाकिस्तान यमन के आंतरिक गृहयुद्ध में किसी भी तरह से पक्षकार नहीं है। फिर भी, ईरान समर्थित हूती लड़ाकों की सैन्य गतिविधियों और व्यापक पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्धोन्माद ने समूचे क्षेत्र के रक्षा ढांचे के सामने गंभीर और दीर्घकालिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

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सवाल-जवाब

मक्का संयुक्त रक्षा समझौता किन देशों के बीच हुआ था?
यह रक्षा समझौता 7 अगस्त को पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हस्ताक्षरित किया गया था।
क्या इस रक्षा समझौते में ईरान के शामिल होने पर कोई कानूनी रोक है?
पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता के अनुसार, समझौते के नियमों में किसी भी अन्य देश के शामिल होने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
मक्का समझौते की मुख्य रक्षा शर्त क्या है?
इसकी मुख्य शर्त यह है कि समझौते में शामिल तीनों देशों में से किसी एक पर भी हमला होने की स्थिति में उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
तेहरान दौरे पर पाकिस्तानी सेना प्रमुख के साथ कौन से वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे?
फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ सऊदी अरब के रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान और तुर्की की खुफिया एजेंसी के प्रमुख इब्राहिम कालिन मौजूद थे।
समझौते का दायरा बढ़ाने का अंतिम फैसला कौन करेगा?
समझौते का विस्तार करने का अंतिम निर्णय पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की औपचारिक सहमति से ही लिया जाएगा।
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टिप्पणियाँ 2

Li Wei@li-wei·41 मिनट पहले

पाकिस्तान और तुर्की के साथ सऊदी अरब का यह समझौता वाकई हैरान करने वाला है। अगर ईरान भी इसमें आ गया तो पश्चिम एशिया का पूरा समीकरण ही बदल जाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·41 मिनट पहले

@Li Wei, समीकरण बदलना तो दूर, ईरान का इस समझौते में आना मुझे नामुमकिन सा लगता है। तुर्की और सऊदी के साथ उनका तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा।

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